You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बीबीसी विशेष: 'आधार के चलते' भूखा रह रहा है एक ऑटिस्टिक बच्चा
- Author, अभिमन्यु कुमार साहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उसके हाथ कांपते हैं. वो स्थिर होकर देख नहीं पाता. उसका पेट भर सके, इसके लिए पिछले तीन सालों से उसकी मां आधार केंद्रों के चक्कर लगा रही हैं. अब थक चुकी हैं और हार मान ली है.
यह कहानी है दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में रहने वाले साढ़े आठ साल के नितिन कोली की. नितिन ऑटिस्टिक हैं, जिसकी वजह से वो अपने ऊंगलियों के निशान नहीं दे पा रहे हैं. इसका ख़ामियाज़ा उन्हें भूखे रहकर चुकाना पड़ रहा है. आधार से राशन कार्ड जुड़ा नहीं होने की वजह से उनके नाम से राशन नहीं मिल पा रहा है.
घर में सिर्फ उनकी मां अनीता का आधार है, जिन्हें हर महीने चार किलोग्राम गेहूं और एक किलोग्राम चावल मिलता है. इसी पांच किलो के राशन से नितिन, उसकी मां और उसके पांच साल के छोटे भाई आयूष कोली का पेट भरता है.
आधार का अपडेट
अनीता ने बीबीसी को बताया, "जब मेरा राशन कार्ड बना था, उस समय मेरे दोनों बच्चों का नाम इसमें शामिल नहीं किया गया था क्योंकि उनके पास आधार नहीं थे. कई बार आधार बनाने की कोशिश की पर बन नहीं पाया. मेरे बेटे के उंगलियों के निशान सही नहीं आ पा रहे थे. वो सही तरीके से देख भी नहीं पाता है."
अनीता ने बताया कि जब उनका बेटा नितिन छोटा था, तब उन्होंने उसका आधार बनवाया था पर अब वो उसे अपडेट करवाने के लिए आधार केंद्रों के चक्कर लगाकर थक चुकी हैं.
वो बताती हैं, "जब वो बच्चा था तब 300 रुपये देकर आधार बनवाया था. वो किसी काम का नहीं है, क्योंकि उसे अपडेट नहीं किया गया है. कई केंद्रों पर गई, हर जगह दूसरे केंद्र पर जाने को कह दिया जाता है."
आधार और राशन
नितिन सरकारी सुविधाओं से महरूम अकेले नहीं हैं. मालवीय नगर इलाके में लाल गुंबद कैंप में रहने वाले करीब 40 लोग आधार से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं. यही हाल जगदंबा कैंप का भी है. यहां भी करीब इतनी ही संख्या में लोगों को आधार के कारण राशन नहीं मिल पा रहा है.
ऐसे लोगों के लिए काम कर रही संस्थान दिल्ली रोजी-रोटी अधिकार अभियान ने इन लोगों के शपथ पत्र के साथ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है.
अभियान की सदस्या अमृता जौहरी ने बीबीसी को बताया, "राशन का सीधा संबंध भोजन के अधिकार से जुड़ा है और यह अधिकार जीने के अधिकार से जुड़ा है. सरकार आधार को अनिवार्य बनाकर जीने के अधिकार में बाधाएं डाल रही है."
उन्होंने बताया कि जो लोग राशन कार्ड से छूट गए हैं उनमें से अधिकतर विकलांग और विधवाएं हैं. याचिका में 41 लोगों के शपथ पत्र एक उदाहरण हैं. दरअसल दिल्ली में लाखों लोगों को आधार की वजह से राशन नहीं मिल पा रहा है.
प्रधानमंत्री का बयान
सरकार का दावा है कि राशन कार्ड को आधार से जोड़े जाने से खाद्य आवंटन में भ्रष्टाचार खत्म हो रहा है.
अमृता कहती हैं, "सरकार जिस फर्ज़ी राशन कार्डधारी की बात कर रही हैं, वो करीब तीन से चार फीसदी ही हैं. सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार राशन की गुणवत्ता और आवंटन की मात्रा में हैं. लोगों को कम और ख़राब गुणवत्ता के राशन दिए जा रहे हैं."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल फरवरी में लोकसभा में कहा था कि आधार और तकनीक के जरिए उनकी सरकार ने चार करोड़ फर्जी राशन उपभोक्ताओं का पता लगाया है. इससे सरकारी खजाने को 14 हजार करोड़ रुपये की हानि से बचाया जा सका है.
सरकार का दावा
लेकिन इस पर जब सूचना के अधिकार से तहत आंकड़े मांगे गए तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसके उपलब्ध न होने की बात कही. इस आरटीआई को अंजलि भारद्वाज ने डाला था. वो सूचना के अधिकार का राष्ट्रीय अभियान नाम की संस्था से जुड़ी हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "सरकार यह कहकर आधार को अनिवार्य बना रही है कि इससे भ्रष्टाचार खत्म हो रहा है पर इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं. हमारे आरटीआई को प्रधानमंत्री कार्यालय ने पहले खाद्य मंत्रालय को भेजा, फिर इसे राज्यों को भेजा गया. वहां से मिले आंकड़ें भी मुक्म्मल तस्वीर नहीं पेश कर रहे हैं."
अंजलि भारद्वाज का कहना है, "आधार का न होना सबसे बड़ी समस्या नहीं है. बड़ी समस्या है आधार नंबर अलग-अलग योजनाओं के डेटाबेस में दर्ज कराना और फिर उसे बायोमेट्रिक तकनीक से प्रमाणित कराना. जिनके पास आधार नंबर हैं, वो भी इस चुनौती से जूझ रहे हैं."
बायोमेट्रिक डेटाबेस
अमृता जौहरी बताती हैं कि इस तरह की समस्या आम है. वो कहती हैं, "अगर आपका आधार लिंक भी हो गया है तो सेवा प्राप्त करने के लिए प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) से अंगूठा मैच होना चाहिए. अगर नहीं होता है तो राशन नहीं मिलता."
वो आगे कहती हैं, "इस पूरी प्रक्रिया के लिए जनता ज़िम्मेदार है. सरकार इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेती." भारत का बायोमेट्रिक डेटाबेस, दुनिया का सबसे बड़ा डेटाबेस है. बीते आठ साल में सरकार एक अरब से ज़्यादा लोगों की उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के निशान जुटा चुकी है.
भारत की 90 फ़ीसदी आबादी की पहचान, अति सुरक्षित डेटा सेंटरों में संग्रहित है. इस पहचान के बदले में आम लोगों को एक ख़ास 12 अंकों की पहचान संख्या दी गई है. देश भर में चलाई जा रही 1200 जन कल्याण योजनाओं में 500 से ज़्यादा योजनाओं के लिए अब आधार की ज़रूरत पड़ेगी.
यहां तक कि बैंक और प्राइवेट फर्म भी अपने ग्राहकों के सत्यापन के लिए आधार का इस्तेमाल करने लगे हैं. अनीता को नितिन का विकलांगता सर्टिफिकेट बनाने में भी दिक्कत आ रही है. आधार नहीं होने की वजह से सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में कई लोगों को परेशानी हो रही है.
(बीबीसी हिंदी की आधार पर ख़ास सिरीज़ के तहत दूसरी रिपोर्ट)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)