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ग्राउंड रिपोर्ट: गुजरात में बीजेपी के ख़िलाफ़ गुस्सा कांग्रेस को जीत दिला पाएगा?
- Author, शिवम विज
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
राजस्थान की सीमा पार कर गुजरात में जिस पहले गुजराती से मेरी मुलाक़ात हुई, उस पर जीएसटी का असर नहीं पड़ा था. शामलाजी मंदिर के बाहर मोबाइल फ़ोन की दुकान चलाने वाले युवा ब्राह्मण ने कहा कि "पर्यटकों की वजह से उसकी दुकान चल रही है."
साल 2012 के विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस को ही वोट दिया था. उसने कहा कि "इस बार वो बीजेपी को वोट देगा."
चूंकि कहा जा रहा है कि बीजेपी को मिलने वाले मतों में कुछ कमी आने जा रही है, इस लिहाज से ये थोड़ा हैरान करने वाले था.
उस युवा ने कहा, "बीजेपी हमेशा गुजरात में जीतती आई है. कांग्रेस को वोट देने का क्या मतलब है? उसे कुछ सीटें ही तो मिलती हैं."
जीतने वाले को मिलेगा वोट
तो उसने 2012 में कांग्रेस को क्यों वोट क्यों दिया था? उसका जवाब था, "मेरे घर के सभी लोग कांग्रेस को वोट दे रहे थे, तो मैंने भी यही किया."
जब उससे मैंने पूछा कि क्या वो विजय रूपानी के सरकार से खुश है? उसका जवाब था बिल्कुल नहीं, "वो कुछ भी नहीं कर रहे हैं."
क्या आनंदीबेन पटेल बेहतर थीं? तो जवाब मिला, "नहीं वो भी ऐसी ही थीं."
मुख्यमंत्री के रूप में मोदी कैसे थे? जवाब था, "शानदार."
और प्रधानमंत्री के रूप में मोदी कैसे हैं? तो उसका जवाब था, "गुजरात की तरह उन्हें सफलता नहीं मिल पाई."
ये नौजवान उन मतदाताओं में से एक है, जो अपना वोट बर्बाद करना नहीं चाहते. वो इस बार जीतने वाले को वोट देना चाहते हैं.
हालांकि जीएसटी से उसके व्यवसाय पर कोई असर नहीं पड़ा, वो गुजरात में बीजेपी के प्रदर्शन से खुश नहीं है.
अगर कांग्रेस भी खुद को जीतने वाली पार्टी के रूप में दिखा सके और ये बता सके कि माहौल उसके पक्ष में है तो उसे इस व्यक्ति का वोट ज़रूर मिल जाता.
बीजेपी के ख़िलाफ़ नाराज़गी
हाईवे पर अहमदाबाद की ओर बढ़ते हुए एक पान की दुकान पर सिगरेट ख़रीद रहा एक व्यक्ति मिलता है, जो मिलते ही बीजेपी के प्रति ऐसे अपशब्द इस्तेमाल करना शुरू कर देता है, जिसे बयां नहीं किया जा सकता. हैरानी की बात ये है कि वो पटेल समुदाय से है.
बीजेपी से वो इतना गुस्सा क्यों है? उसने बताया कि वो एक किसान है जिसकी आलू की फसल बर्बाद हो रही है और उसकी फसल को कोई पूछ नहीं रहा.
वो कहता है कि मुद्दा आरक्षण का नहीं, बल्कि ये है कि बीजेपी ने किसानों को छोड़ दिया है. और जाते जाते वो कहता है, "दस में से नौ पटेल इस बार कांग्रेस को वोट देंगे."
इसी दुकान के पास तीन अन्य लोग सिगरेट के कश के बीच पर बातचीत कर रहे हैं. सभी कांग्रेस के बारे में बातें कर रहे हैं. इनमें से एक ब्राह्मण है, दूसरा क्षत्रिय और तीसरा पटेल है.
लेकिन यहां भी जो सबसे मुखर है, वो पटेल है. वो एक इंजीनियर है और बीजेपी को लेकर उस किसान की तरह ही अपशब्द बोलना शुरू कर देता है. लेकिन उसकी चिंता आलुओं की नहीं है. तो उसका मुद्दा क्या है?
वो कहता है, "मेरी समस्या ये है कि पहले तो उन्होंने आनंदीबेन पटेल का अपमान किया, इसके बाद उन्होंने नितिन पटेल को मुख्यमंत्री नहीं बनाया और इसकी जगह उन्होंने इस पद पर एक बनिये को बैठा दिया."
टिकट वितरण पर शंका
मैंने तर्क किया, लेकिन कांग्रेस भी तो आप लोगों को आरक्षण नहीं देने जा रही?
उसका कहना था, "वो तो कोई नहीं दे रहा है. असल मुद्दा आरक्षण नहीं है. इस चुनाव में बीजेपी को सबक सिखाना ही मुद्दा है. इसका मतलब ये नहीं कि मुझे कांग्रेस से प्यार है. वो मुसलमानों की संरक्षक है. कांग्रेस को वोट देने का मतलब है कि आप एक आंख बंद कर रहे हैं. लेकिन इस बार मैं यही करूंगा क्योंकि मैं बीजेपी की दोनों आंखें बंद करना चाहता हूं."
इतने मुखर व्यक्ति से आप यही उम्मीद करेंगे कि वो कहेगा कि इस चुनाव में कांग्रेस जीतने जा रही है. लेकिन इस व्यक्ति का कहना है, "फिर भी बीजेपी जीत जाएगी." मैंने पूछा, ऐसा क्यों?
जवाब आता है, "बीजेपी पटेलों को काफ़ी टिकट देगी, इससे आनंदीबेन पटेल को कुछ हद तक तवज्जो मिलेगी. हम पटेल भेड़ों जैसे हैं, इसलिए, इसके बावजूद हम बीजेपी को वोट देंगे..."
इस व्यक्ति को लगता है कि टिकट वितरण में कांग्रेस बहुत चतुराई नहीं दिखा पाएगी. और ऐसा लगता है कि यहां ये आम धारणा है.
बीजेपी के बारे में 'गुस्सा' तो बहुत है, लेकिन जब भी कांग्रेस की बात आती है, ये 'टिकट वितरण' पर केंद्रित हो जाती है.
हम मुख्य मार्ग से अलग हटकर एक गांव की ओर बढ़ जाते हैं. वहां तीन लोग बैठकर बातचीत करते हुए मिल जाते हैं.
चुनाव का माहौल क्या है? इस सवाल पर, इनमें से दो लोगों का कहना था कि बीजेपी जीतेगी. क्यों पूछने पर वो कहते हैं, "उन्होंने विकास किया है."
माहौल अभी बनना शुरू हुआ है
उनकी जाति क्या है? "हम दोनों मुसलमान हैं." क्या वो बिना डर के, बीजेपी के लिए ऐसा कह रहे थे?
लेकिन तीसरे व्यक्ति का कहना था कि स्थिति अभी साफ़ नहीं है क्योंकि माहौल अभी बनना शुरू ही हुआ है. वो पटेल जाति से आते हैं.
उनके मुताबिक, "अभी बहुत कुछ होने वाला है. मोदी साब आएंगे और प्रचार करेंगे. देखते हैं कि वो क्या कहते हैं, खासकर पटेलों के बारे में. इसके बाद हम अपना मन बनाएंगे."
हालांकि पटेल सबसे अधिक गुस्से में हैं और बीजेपी से एक ऐसी उग्र प्रेमिका की तरह नाराज़ हैं, जो मान मनौव्वल चाहती है. बावजूद वो कांग्रेस की ओर से भी तवज्जो चाहते हैं, लेकिन इस मामले में कांग्रेस कोई मुद्दा नहीं है.
मुद्दा तो बीजेपी, नरेंद्र मोदी, अमित शाह, विजय रुपानी, आनंदीबेन पटेल, जीएसटी, हार्दिक पटेल आदि हैं. इस माहौल का कांग्रेस का फ़ायदा तो हो सकता है लेकिन इसे बनाने में उसका कोई योगदान नहीं है.
राज्य के उत्तरी हिस्से के पटेलों की तरह ही, अहमदाबाद में कारोबारी भी बीजेपी के ख़िलाफ़ गुस्सा ज़ाहिर करते हैं लेकिन निराशाजनक तरीके से वो भी स्वीकार करते हैं कि 'फिर भी बीजेपी जीत जाएगी' क्योंकि वो हमेशा ही जीतती रही है.
उनका कहना है कि चुनाव की कला और इसके गणित के बारे में बीजेपी को सब पता है, जबकि कांग्रेस को नहीं.
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