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नज़रिया: गुजरात की 'ख़ामोशी' का मोदी के लिए संदेश क्या?
- Author, डॉ. गौरांग जानी
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी गुजराती के लिए
गुजरात विधानसभा चुनाव से डेढ़ महीने पहले राज्य में सरकार और सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी के लिए आम लोगों का विरोध सामने आया.
हालांकि इससे ठीक पहले उत्तर प्रदेश में बीजेपी को भारी बहुमत मिला था, लेकिन कुछ ही महीनों के अंदर गुजरात में बीजेपी को काफी आलोचना झेलनी पड़ रही है.
बीजेपी एक ओर 150 से ज़्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही है, दूसरी तरफ़ राज्य की सोशल मीडिया में 'विकास पागल हो गया है' काफ़ी ट्रेंड करने लगा.
बीजेपी के ख़िलाफ़ गुजरात के आम लोगों की नाराज़गी सोशल मीडिया पर मुखर रूप से दिख रही है.
लोगों की इस नाराज़गी का असर गुजरात सरकार पर भी हुआ. देश भर के अख़बार और टीवी चैनलों के पत्रकारों की दिलचस्पी भी इस मुद्दे पर जगी.
मौन गुजरात अचानक से ग़ुस्से में क्यों उबलने लगा?
ऐसा क्यों हुआ, उसे समझने की ज़रूरत है. अब तक मौन रहा गुजरात अचानक क्यों उबलने लगा?
गुजराती समाज शताब्दियों से कारोबार के लिए जाना जाता है और इस समुदाय से जुड़े लोग वैश्विक स्तर पर कारोबार करते हैं.
सौ साल पहले जो गुजराती विदेश गए वो भी मोदी के विकास मॉडल (मोदीनॉमिक्स) के मुरीद बन गए थे. अभी भी ये आकर्षण बना हुआ है.
इतना ही नहीं, 2002 में गोधरा कांड के बाद हिंदुत्व के मुख्य चेहरे के तौर उभरे नरेंद्र मोदी को भी गुजरातियों ने हाथों हाथ लिया.
इन सबका असर ये हुआ कि गुजरात मॉडल की वाहवाही पूरे देश में देखने को मिली.
गुजरातियों की स्मार्ट ख़ामोशी
इस दौरान गुजरातियों ने इस बात की परवाह नहीं की कि पुरुष साक्षरता में गुजरात 15वें पायदान और महिला साक्षरता में 20वें पायदान (2011 की जनगणना) पर पहुंच गया.
राज्य लैंगिक अनुपात की दर में चौबीसवें पायदान पर पहुंच गया. लेकिन गुजरात का एलीट समाज जो अपने बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेज चुका है, उनकी नौकरियों का इंतजाम कर चुका है, वह इस मसले पर चुप ही रहा.
दो दशकों की ये चुप्पी पाटीदार आंदोलन और उना दलित अत्याचार संघर्ष के बाद अब बीते दिनों की बात हो चुकी है.
जो सवर्ण गुजराती बेरोजगार थे, वे कभी बेरोजगारी के ख़िलाफ़ सड़कों पर नहीं उतरे. कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में भी इसको लेकर पहले चुप्पी का आलम था, लेकिन अब सवर्ण ख़ुद को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा बताते हुए आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं.
सरकार पर कटाक्ष
शिक्षित गुजरातियों के विरोध प्रदर्शन का हल नहीं निकाल पाने की वजह से आनंदी बेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. दलितों पर हुए अत्याचार को युवा दलित नेतृत्व ने देशव्यापी मुद्दा बना दिया.
आम गुजरातियों में जो ग़ुस्सा है उसे ना तो बुलेट ट्रेन की सौगात कम कर पाई है और ना ही मोदी-शिंजो आबे की मुलाकात.
बारिश के पानी में बह गए विकास के रास्ते, पुल और अंडरब्रिज ने सरकार को हास्यास्पद स्थिति में ला दिया. गुजराती लोगों के व्यंग्य करने का रचनात्मक अंदाज़ इसके बाद सोशल मीडिया पर जमकर दिखा.
सरकार की मंशा पर सवाल
राज्य में 43 हज़ार आशा वर्कर्स वेतन और अन्य सुविधाओं की मांग के साथ सड़कों पर उतर आई हैं. ये आशा वर्कर्स, गुजरात के आम लोगों का ही प्रतिनिधित्व कर रही हैं.
आशा वर्कर्स के विरोध प्रदर्शन को 43 हज़ार परिवारों में सरकार के प्रति नाराज़गी के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि गुजरात में शादीशुदा महिलाएं ही आशा वर्कर्स बन सकती हैं.
राज्य भर में जगह-जगह हो रहे धरना प्रदर्शन सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
गुजरात में विकास की तलाश
पिछले 22 सालों से हिंदुत्व की कथित भगवा चादर के नीचे जातिगत भेदभाव छिपा हुआ था, लेकिन अब ये भेदभाव चादर से बाहर निकल आया है. भगवे का रंग फीका पड़ रहा है.
एक समय में आरक्षण का विरोध करने वाला तबका आरक्षण मांग रहा है. किसानों की आर्थिक मुश्किलों ने ग्रामीण इलाके में विकराल रूप ले लिया है.
आदिवासी इलाक़े में, विकास का गुजरात मॉडल कैसा है, इसे तलाशा जा रहा है. जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर एक तरह से गुजरात में बदलते सामाजिक राजनीतिक मंच का नया नेतृत्व बनकर उभरे हैं.
इन तीनों ने मिलकर बीजेपी के 22 साल के शासन को सवालों के घेरे में ला दिया है, जनता भी इन सवालों के हिसाब पूछ रहे हैं.
आम गुजराती सोशल मीडिया पर इस तरह से सवाल पूछ रहे हैं कि जैसे गुजरात में सरकार के ख़िलाफ़ अहिंसक युद्ध लड़ा जा रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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