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नज़रिया: 2019 में कांग्रेस के संग चलेगी वामपंथी सीपीएम?
- Author, रंजीत भूषण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत में कांग्रेस पार्टी और स्थापित वामपंथी दलों के बीच रिश्ते ऐतिहासिक रूप से विवादित रहे हैं.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का थोड़ा बहुत झुकाव वामपंथियों की ओर था, बिना किसी ठोस सिद्धांत के, वो मानते थे कि भारतीय वामपंथियों के लिए इतिहास की शुरुआत रूस की क्रांति से हुई है.
ये व्यंग्यात्मक टिप्पणी दोनों दलों के बीच की उस व्यापक वैचारिक एकजुटता पर हावी रही, जो कम से कम भारत में दक्षिणपंथ के उभार से उठे सवालों पर बनी थी.
वामपंथियों के लिए, कांग्रेस पारंपरिक रूप से उन हिंदू दक्षिणपंथियों के मुक़ाबले कम बुरी थी जो नेहरू के समय में बैकफ़ुट पर थे, क्योंकि भारत के पहले प्रधानमंत्री हर अवैज्ञानिक चीज़ के ख़िलाफ़ थे.
उनकी लोकप्रियता चरम पर थी और हिंदू महासभा को गांधी के हत्यारों के रूप में देखा जा रहा था. बहरहाल, 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में भारत की पहली वामपंथी सरकार को नेहरू ने ही भंग किया था.
सैफ़ुद्दीन चौधरी को मिली थी सज़ा
हालांकि 1990 के दशक में बीजेपी के उभार से वामपंथियों की ये दुविधा और ज़्यादा बढ़ गई. दोनों वामपंथी पार्टियों में से बड़ी सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) धर्मनिरपेक्ष पार्टियों (कांग्रेस और सहयोगियों) को समर्थन देने के मुद्दे पर विभाजित दिखी, भले ही वो वास्तव में न बंटी हों.
इस असमंजस का सबसे ज़्यादा नुक़सान पश्चिम बंगाल की कटवा सीट से चार बार के सीपीएम सांसद सैफ़ुद्दीन चौधरी को उठाना पड़ा था जिन्हें 1995 में न सिर्फ़ पार्टी की केंद्रीय समिति से हटा दिया गया था बल्कि 1996 के चुनाव में उनका टिकट भी काट दिया गया था.
सैफ़ुद्दीन चौधरी का ग़ुनाह ये था कि उन्होंने बीजेपी और 'फ़ासीवादी पार्टियों' को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन का सुझाव दे दिया था.
वामपंथ के कुछ प्रभावशाली धड़ों में इस विचार को लेकर इतना ज़्यादा आक्रोश था कि चौधरी की पार्टी से प्राथमिक सदस्यता तक ख़त्म कर दी गई थी.
लेकिन 1990 का दौर था जब भारतीय जनता पार्टी आज की तरह देश की राजनीति पर हावी नहीं थी. उस समय कांग्रेस ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी थी.
कांग्रेस को लेकर अब भी दो-फाड़
ये समझा जा सकता है कि आज सीपीएम का अस्तित्व ही ख़तरे में हैं. 2014 के आम चुनावों में जब भारतीय राजनीति पर नरेंद्र मोदी की लहर चली तब सीपीएम को भारी नुक़सान हुआ.
महत्वपूर्ण ये भी है कि 1990 के दशक में कांग्रेस के साथ सहयोग करने का जो सवाल पार्टी में उठ रहा था वो अब भी बरक़रार है. 2004-2009 तक वामपंथी दलों ने कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार का बाहर से समर्थन किया था.
हालांकि कई मुद्दों पर मतभेद बरक़रार रहे. इनमें सबसे महत्पूर्ण था भारत-अमरीका की परमाणु संधि को लेकर हुआ विवाद.
आज एक बार फिर 2019 चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करने के मुद्दे पर सीपीएम की केंद्रीय समिति में दो फाड़ है. जहां तक केंद्रीय समिति में संख्याबल का सवाल है तो दोनों पक्ष बराबरी पर हैं. वरिष्ठ नेता प्रकाश करात को जहां 32 सदस्यों का समर्थन है, वहीं महासचिव सीताराम येचुरी के साथ 31 सदस्य हैं.
हालांकि प्रकाश करात और सीताराम येचुरी दोनों मानते हैं कि पार्टी का मूल उद्देश्य नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करना है. दोनों ये भी मानते हैं कि कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन नहीं हो सकता है.
मतदान की जगह समझौते का फॉर्मूला
हालांकि, येचुरी का मानना है कि पार्टी को सभी ग़ैरवामपंथी धर्मनिरपेक्ष दलों, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, का सहयोग करना चाहिए.
इससे कांग्रेस को लेकर पार्टी के लिए गठबंधन की एक खिड़की खुल जाएगी. वहीं करात का मानना है कि पार्टी को सभी ग़ैरकांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष दलों का सहयोग करना चाहिए.
पार्टी की केंद्रीय समिति में येचुरी की ओर से पेश अल्पमत प्रस्ताव पर चर्चा हुई और उसके जवाब में करात की ओर से दिए गए दस्तावेज़, पोलित ब्यूरो के आधिकारिक मसौदे पर चर्चा हुई.
हालांकि इसमें भी सहमति नहीं बन पाई. हालांकि मतदान नहीं किया गया क्योंकि इससे संकेत जाता कि पार्टी में दो फाड़ है. मतदान की जगह समझौते का फॉर्मूला निकाला गया.
येचुरी और करात दोनों कुछ प्रस्तावों के साथ आए और आख़िरकार यह सहमति हुई कि केंद्रीय समिति में हुई चर्चा और पोलित ब्यूरो की ओर से रेखांकित किए गए मुद्दों के आधार पर पोलित ब्यूरो अगले साल होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पेश करने के लिए प्रस्ताव का मसौदा तैयार करे.
सीपीएम का 22वां पार्टी सम्मेलन हैदराबाद में 18-22 अप्रैल 2018 को होगा.
जैसा कि उम्मीद थी, येचुरी ने पत्रकारों से कहा कि उनकी पार्टी आरएसएस के हमलों के आगे झुकेगी नहीं.
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