दिवाली मनाने अयोध्या में होंगे योगी आदित्यनाथ

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

ऐसा कहा जाता है कि पिता से वनवास पाने के बाद भगवान राम ने पूरे चौदह साल अयोध्या से बाहर बिताए.

इसी कथानक के बाद 'वनवास' और 'चौदह साल' एक दूसरे के पूरक से बन गए और 'चौदह साल के वनवास' का मुहावरा ही चल निकला.

ये संयोग ही है कि नब्बे के दशक में अयोध्या मुद्दे की राजनीतिक गर्माहट के बाद उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने वाली भारतीय जनता पार्टी राज्य में सत्ता से जब बेदख़ल हुई तो उसे भी सत्ता में वापसी करने में चौदह साल लग गए.

राज्य की बीजेपी सरकार भगवान राम की वापसी और सरकार की वापसी, दोनों का जश्न एक साथ मनाने की तैयारी कर रही है.

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने सत्ता सँभालने के बाद विजयदशमी का पर्व भले ही गोरखपुर में मनाया लेकिन दिवाली मनाने वो गोरखपुर से अयोध्या पहुंच रहे हैं.

ये कहते हैं कि लंका के राक्षसों का वध करके भगवान राम जब अयोध्या लौटे थे तो पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया था और फिर उनके राज्याभिषेक के पर्व से ही इस त्योहार की शुरुआत हुई.

पूरा शहर होगा जगमग

उत्तर प्रदेश सरकार पूरे अयोध्या को न सिर्फ़ दीपों से सजाने जा रही है बल्कि बिजली की झालरों, रंगोलियों, बल्बों, लेज़र शो आदि के माध्यम से भी पूरे शहर को जगमग किया जाएगा.

यही नहीं, इस दीपोत्सव में 'पुष्पक विमान' भी होगा, रथ होगा, घुड़सवार होंगे, सैनिक होंगे और भालू-बंदर भी होंगे.

ये कहने का मतलब ये कि पुरातन और नूतन का ऐसा सुखद संगम तैयार किया गया है कि देखने वाले दाँतों तले उंगलियां दबा लेंगे.

छोटी दिवाली पर होने वाले दीपोत्सव कार्यक्रम में एक लाख इकहत्तर हज़ार मिट्टी के दिये जहां सरयू नदी के तट को रोशन करेंगे.

वहीं, दिन में निकलने वाली भगवान राम की शोभा यात्रा की अगवानी ख़ुद मुख्यमंत्री करेंगे.

उनकी कैबिनेट के ढेरों मंत्री तो होंगे ही महेश शर्मा, केजे अल्फ़ोंस जैसे कई केंद्रीय मंत्री भी उनका साथ देंगे.

दिये जलाने की ज़िम्मेदारी अवध विश्वविद्यालय के क़रीब दो हज़ार छात्रों को सौंपी गई है, या यों कहिए कि ज़िम्मेदारी उन्होंने ली है.

मेहमान और वीआईपी काफी ज़्यादा हैं इसलिए भगवान राम की अगवानी के लिए कितने अयोध्यावासी शामिल होंगे, ये देखने वाली बात होगी.

लेकिन व्यवस्था ऐसी रखी गई है कि शोभायात्रा को 'त्रेतायुगीन फ़ील' देने में कोई क़सर न रह जाए और इसीलिए असली भालू-बंदरों को यात्रा में शामिल किया जा रहा है.

त्रेता युग का एहसास

शोभायात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा की जाएगी ताकि लोगों को पुष्पक विमान का भी अहसास कराया जा सके.

जब से इस ऐतिहासिक दिवाली को मनाने की घोषणा हुई है तब से उसकी तैयारियों का जायज़ा लेने के लिए मंत्रियों और अधिकारियों के अयोध्या जाने का क्रम बना हुआ है.

उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्थी बताते हैं, "सारा इंतज़ाम पर्यटन मंत्रालय, सूचना विभाग, अवध विश्वविद्यालय और फ़ैज़ाबाद प्रशासन की ओर से किया जा रहा है और इसका ख़र्च राज्य सरकार उठा रही है. हां, कुछ स्थानीय लोग भी अपनी तरह से इसमें सहयोग कर रहे हैं."

दिवाली के मौक़े पर चूंकि बड़ी संख्या में सरकार के लोग रहेंगे तो अयोध्या के लिए कई परियोजनाओं की भी घोषणा होगी. केंद्र सरकार ने इसके लिए 130 करोड़ रुपये भी स्वीकृत कर दिए हैं.

एनजीटी ने कोई अड़ंगा न लगाया तो राज्य सरकार अयोध्या में सरयू नदी के तट पर भगवान राम की 108 फीट ऊंची ऐसी प्रतिमा स्थापित करने जा रही है, जैसी पूरी दुनिया में नहीं है.

राज्य सरकार का कहना है कि अयोध्या को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए ये सारी क़वायद हो रही है लेकिन अयोध्या में इतनी दिलचस्पी को लेकर सरकार की नीयत पर सवाल भी उठ रहे हैं.

असदुद्दीन ओवैसी के अलावा अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में प्रमुख पैरवीकार और हाईकोर्ट के वकील ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि ये सब न सिर्फ़ करदाताओं के पैसों का दुरुपयोग है बल्कि संविधान भी इसकी इजाज़त नहीं देता.

ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक, "अयोध्या में न तो भगवान राम की प्रतिमा लगवाने में कोई बुराई है और न ही दिवाली मनाने में. लेकिन करदाताओं के पैसे से ये सब काम करना ग़ैर संवैधानिक है. सरकार को किसी ख़ास धर्म का प्रचार नहीं करना चाहिए."

संदेश देने की कोशिश

वहीं जानकारों का कहना है कि इतने भव्य आयोजन के माध्यम से बीजेपी एक ख़ास संदेश देना चाहती है. अयोध्या में राम मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट में भले ही हो लेकिन वो ये बताने से कभी नहीं चूकती कि ये उसके एजेंडे में है और पार्टी इसे भूली नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, "जहां तक पर्यटन की बात है तो उसके लिए सिर्फ़ अयोध्या पर ही इतना ज़ोर देने का मक़सद साफ़ है. हालांकि और धार्मिक स्थलों पर भी आयोजन होते रहे हैं और वहां भी सरकार या प्रशासन का सहयोग रहता रहा है लेकिन अयोध्या को लेकर जो इतना सब किया जा रहा है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया और ज़ाहिर है, यदि इतना दिखाया जा रहा है तो निश्चित तौर पर उसके पीछे कोई मक़सद है."

सुनीता ऐरन कहती हैं कि धार्मिक स्थल मथुरा भी है, दूसरे और भी हैं, अन्य धर्मों के भी हैं लेकिन यदि एक ही जगह पर इतना धूम-धड़ाका किया जाएगा, वो भी उस जगह के लिए जो बीजेपी के लिए कितनी महत्वपूर्ण है, ये सबको पता है तो सवाल उठना लाजिमी है.

बहरहाल, आयोजन के पीछे राजनीतिक मक़सद हो या न हो, अभी तक राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से ये बचा हुआ है.

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