क्या प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री न बन पाने का मलाल है?

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि प्रधानमंत्री न बनाए जाने पर प्रणब मुखर्जी के पास 'अपसेट' होने का जायज़ कारण था, क्योंकि प्रणब इस पद के लिए अधिक योग्य थे.

मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी की किताब 'द कोलिएशन ईयर्स: 1996-2012' के विमोचन के मौके पर यह बात कही. इसी किताब में प्रणब ने लिखा है कि सोनिया गांधी के पद ठुकराने के बाद सबको यही लगा था कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाएगा.

पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति के इन बयानों के क्या अर्थ हैं? क्या यह कोई मलाल था जिसे पूर्व राष्ट्रपति ने साफ़ कर दिया? क्या बतौर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल इस कथित मलाल की छाया से पूरी तरह मुक्त रह पाया?

इन्हीं सवालों पर बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा से बात की.

विनोद शर्मा का नज़रिया:

मैं समझता हूं कि प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह दोनों की ही बातों में यथार्थ और सच्चाई है. इतने बड़े पदों पर रहे लोग अपने जीवनकाल में ही ऐसे स्पष्टीकरण दे दें तो आने वाली पीढ़ियां अटकलें नहीं लगातीं और इतिहास का सही ज्ञान रखतीं.

यह बात सच है कि प्रणब मुखर्जी सार्वजनिक जीवन में मनमोहन सिंह से आगे थे. यह भी सच है कि शायद मनमोहन सिंह प्रणब मुखर्जी से बेहतर अर्थशास्त्री रहे.

लेकिन प्रधानमंत्री होने के लिए सार्वजनिक जीवन में एक लंबी पारी बहुत ज़रूरी होती है और उस लिहाज़ से मनमोहन सिंह ने यह कहा कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनने के हक़दार थे, लेकिन वह खुद प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन इस फ़ैसले में उनके सामने कोई विकल्प नहीं था क्योंकि यह पार्टी का आदेश था.

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति

जहां तक कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति कार्यकाल में उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत अच्छे संबंध रहे और उनके भीतर कोई पूर्व कांग्रेसी नहीं दिखा. मेरा यह मानना है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच रस्साकशी संवैधानिक संकट में तब्दील हो सकती है.

दोनों के बीच तालमेल बहुत ज़रूरी है ताकि निज़ाम चलता रहे. हमारे इतिहास में एक दो मौकों को छोड़कर राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की पसंद का होना पड़ेगा. हां, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का रबर स्टैंप भी न हो और हर बात में जिरह करने वाला भी न हो, यह हमें सुनिश्चित करना पड़ेगा.

मेरा यह मानना है कि प्रणब मुखर्जी ने उत्तराखंड सरकार को बर्ख़ास्त करने वाले एक फैसले को छोड़कर, संवैधानिक राष्ट्रपति के तौर पर अपनी भूमिका निभाई.

मोदी की तारीफ़

प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की और प्रधानमंत्री ने भी उनकी प्रशंसा की. सरकार और सरकार समर्थकों की ओर से भी प्रणब मुखर्जी को सम्मान मिला. लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता कि इस तालमेल के पीछे प्रणब मुखर्जी का प्रधानमंत्री न बन पाने का कोई मलाल था.

प्रत्यक्ष तौर पर प्रणब मुखर्जी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि वह सरकार की गोद में बैठे राष्ट्रपति हैं. हां, तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जब योग दिवस के कार्यक्रम में शरीक नहीं हुए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक ओहदेदार ने उनके ख़िलाफ़ ट्वीट किया था और आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री ने उन्हें निर्देश दिया था कि उपराष्ट्रपति से जाकर माफ़ी मांगें.

यह बात सच है कि उपराष्ट्रपति के अंतिम भाषण जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों के बारे में बातें कही थीं, के बाद उन पर काफी कटाक्ष किए गए. वह भी उचित नहीं था.

इसलिए हामिद अंसारी और प्रणब मुखर्जी (को मिले सम्मान) की तुलना भाजपा और संघ के नज़रिए से करना उचित नहीं होगा. भाजपा और संघ के लोग बहुत बार ऐसी बातें कर जाते हैं जो उचित नहीं होतीं.

राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम की घोषणा होने के बाद वो हम जैसे कुछ पत्रकारों से मिले थे और उन्होंने साफ कहा था कि 'मैं एक संवैधानिक राष्ट्रपति की भूमिका निभाऊंगा.'

बाद में एक ख़ास घटना हुई. एक टीवी शो में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री मौजूद थे. वहां उन्होंने कुछ बातें कहीं.

उसके बाद मैं उनसे मिला था. मैंने उनसे कहा कि 'यह तो कोई संवैधानिक राष्ट्रपति जैसी बात नहीं हुई महामहिम राष्ट्रपति जी'. तो उन्होंने कहा कि 'हां यह मुझसे ग़लती हुई थी.'

प्रणब मुखर्जी उन नेताओं में से रहे हैं कि उनसे ग़लती हो जाए तो वो उसे मानने में हिचकिचाते नहीं हैं.

एक ताज़ा इंटरव्यू में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के बारे में कहा कि यह 132 साल पुरानी पार्टी है और वह ज़रूर वापसी करेगी.

इस बात को सब जानते हैं कि इतनी पीढ़ियों से जो पार्टी चल रही हो और जिसने भारत के आज़ादी के आंदोलन में शिरकत की हो, वो पार्टी एकदम से ग़ायब नहीं होने वाली है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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