आरुषि केस: कब-कब क्या हुआ

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देश के सबसे चर्चित आरुषि हत्याकांड पर इलाहाबाद हाईकोर्ट गुरुवार को अपना फैसला सुना दिया है.
सीबीआई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ तलवार दंपत्ति की याचिका मंजूर करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें आरुषि हत्याकांड से बरी कर दिया है.
फ़ैसले को मुकाम तक पहुंचने में क़रीब नौ साल लग गए. तमाम सबूत इकट्ठे किए गए और दर्जनों गवाहों से पूछताछ हुई.
उस घटनाक्रम की एक-एक कड़ी को जोड़ने पर इस बात का अंदाज़ा सहज ही लग सकता है कि मामला कितना उलझा हुआ है. आइए घटनाक्रम पर एक नजर डालते हैं.
16 मई 2008
राजधानी दिल्ली के पास नोएडा में रहने वाले दंत चिकित्सक राजेश तलवार की 14 साल की बेटी आरुषि तलवार और नौकर हेमराज की हत्या 15-16 मई 2008 की दरमियानी रात नोएडा में तलवार के घर पर हुई.
16 मई की सुबह आरुषि अपने कमरे में मृत पाई गई. धारदार हथियार से उसका गला रेत दिया गया था. एक दिन बाद नौकर हेमराज का शव राजेश तलवार के पड़ोसी की छत से बरामद हुआ.
मामले में 23 मई 2008 को राजेश तलवार को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया. एक दिन बाद 24 मई को यूपी पुलिस ने राजेश तलवार को मुख्य अभियुक्त बताया.
सीबीआई जांच

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भारी दबाव के बीच 29 मई को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने सीबीआई जांच की सिफारिश की.
सीबीआई ने जून 2008 में एफ़आईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी. सीबीआई ने राजेश तलवार को हिरासत में लेकर पूछताछ की.
सुबूतों के अभाव में विशेष अदालत ने 12 जुलाई 2008 को राजेश तलवार को रिहा कर दिया.
राजेश तलवार के कंपाउंडर और दो नौकरों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था, लेकिन उनके ख़िलाफ़ भी कोई सबूत नहीं मिले और उन्हें सितंबर 2008 में रिहा कर दिया गया.
क्लोज़र रिपोर्ट

मामले में पहला मोड़ तब आया, जब 9 फरवरी 2009 में तलवार दंपति पर हत्या का मामला दर्ज किया गया
पुलिस ने तलवार दंपति द्वारा जांच में सहयोग न किए जाने की बात कही, तो जनवरी 2010 में कोर्ट से नार्को टेस्ट की इजाज़त मिली.
30 महीने की जांच के बाद सीबीआई ने दिसंबर 2010 में अदालत में क्लोज़र रिपोर्ट पेश की.
तलवार दंपति ने इसके ख़िलाफ़ कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और नए सिरे से जांच की मांग की.
इसी सिलसिले में कोर्ट गए राजेश तलवार पर 25 जनवरी 2011 में परिसर में ही चाकू से हमला हो गया.
सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2012 को तलवार दंपति पर मुक़दमा चलाने का आदेश दिया.
हत्या का आरोप
नुपुर तलवार को 30 अप्रैल 2012 को ग़िरफ़्तार कर लिया गया. इससे पहले उनकी ज़मानत याचिका को अदालत ने ख़ारिज कर दिया था.
शीर्ष अदालत के निर्देश पर जून 2012 में फिर से मामले की सुनवाई शुरू हुई. इस बीच नुपुर तलवार 25 सितंबर 2012 को ज़मानत पर बाहर आ गईं.
इस मामले में 12 नवंबर 2013 को बचाव पक्ष के गवाहों के अंतिम बयान दर्ज किए गए. कोर्ट ने 25 नवंबर 2013 को फ़ैसला सुनाने का निर्णय दिया.
25 नवंबर 2013 को सीबीआई कोर्ट ने तलवार दंपती को उम्रकैद की सज़ा सुनाई. दोनों फिलहाल गाज़ियाबाद की डासना जेल में सज़ा काट रहे हैं.
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