ऐसे जान पर खेलकर होता है कीटनाशकों का इस्तेमाल!

- Author, मयूरेश कोण्णूर
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी
महाराष्ट्र के विदर्भ का यवतमाल ज़िला अकसर किसानों की आत्महत्या के लिए पहचाना गया. कई किसान फ़सल में इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक पीकर आत्महत्याएं करते रहें.
पहले के मुकाबले आत्महत्याएं तो अब कम हुई हैं लेकिन कीटनाशक रसायन अब भी किसानों की जानें ले रहा है. पिछले कुछ दिनों में विदर्भ कीटनाशक रसायन के छिड़काव के कारण हुई 24 में से 19 किसानों की मौत अकेले यवतमाल ज़िले मे हुई है.
लेकिन अब सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या यह दुर्घटना रोकी जा सकती थी?
महाराष्ट्र सरकार ने इस दुर्घटना का कारण ढूंढने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है. साथ ही कीटनाशक के छिड़काव के वक्त इस्तेमाल होने वाले सुरक्षा साधन अनिवार्य कर दिए गए हैं लेकिन यह सुरक्षा के इंतज़ाम पहले ही क्यों नहीं किए गए?

इमेज स्रोत, PRASAD NAIGAONKAR
कीटनाशकों के लिए सलाह नहीं
सभी किसान कीटनाशक चुनने के लिए और उसकी मात्रा तय करने में निजी कृषि सेवा केंद्र पर निर्भर होते हैं. हालांकि, कौन-सा कीटनाशक कौन-सी फ़सल के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, कितनी मात्रा में उसका इस्तेमाल हो, सुरक्षा के क्या इंतज़ाम करने चाहिए यह सलाह देना कृषि विभाग का काम है.
इसीलिए तालुका स्तर पर कृषि सहायक अधिकारी की भी नियुक्ति की जाती है. सवाल अब यह उठता है कि किसान और मज़दूर कौन-सा कीटनाशक और कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं, इस पर ध्यान रखा गया की नहीं? क्या सलाह दी गई?
डॉ. चेतन दारणे ख़ुद एक डेंटिस्ट हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से यवतमाल मे किसानों के सुरक्षा के मुद्दे पर काम कर रहे हैं. उनका अनुभव यह है की यहां हानिकारक तरीके से कीटनाशकों इस्तेमाल होता है.
वह कहते हैं, "यह किसान इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि जो पैकेटों पर लिखी गई सब सूचनाएं समझ सकें. यह तो पूरे सरकारी स्तर पर नाकामी है. कृषि सहायक का काम है कि वह हर गांव मे जाए, इन रासायनों के बारे मे जानकारी दे. लेकिन यहां हफ़्ते या दो हफ़्ते मे एकाध बार यह अधिकारी गांव मे आता है. दूसरी बात यह है की गांव के स्वास्थ्य केंद्र में जो इमरजेंसी सुविधाएं होनी चाहिए, वह यहां नहीं हैं. हर बात पर यवतमाल शहर में जाना पड़ता है."

इमेज स्रोत, Reuters
खुले बदन से स्प्रे
डॉ. चेतन दारणे की बात हमें अगले ही कुछ मिनटों मे सच दिखाई देती है जब सावरगांव से कलंब की ओर जाते समय हमें खेत मे कीटनाशक का छिड़काव करने वाले कुछ मज़दूर दिखाई देते हैं. हम बात करने के लिए रुक जाते हैं.
पीठ पर पंपिंग स्प्रे लगाकर खुले बदन से वह काम कर रहे हैं. बात करते ही पता चला कि उनको मालूम है की इस रसायन के कारण ज़िले में 19 लोगों की मौत हुई है. फ़िर भी उन्हें डर नहीं लग रहा?
उनमें से एक निनंता बोंद्रे हमे बताते हैं, "हम तो वही करते हैं जो मालिक कहता है. अब तक तो हमें किसी अफ़सर ने आकर कुछ नहीं बताया. हम तो पेट के लिए यह काम करते हैं. अब जान को कुछ हुआ तो हुआ? दूसरा चारा क्या है?" वह 35 सालों से यह काम करते आए हैं.
लेकिन क्या उन्हें कभी किसी सरकारी अफ़सर ने या फ़िर वह जहां काम करते हैं वहां के मालिक किसान ने कभी सुरक्षा के कुछ उपायों के बारे मे कुछ बताया?

सरकार नहीं देती सुरक्षा साधन
तो एक मज़दूर अवधूत दुनगुणे अपनी व्यथा बताते है, "हमें सिर्फ़ इतना बताया जाता है कि सुरक्षा पर ध्यान दो. फ़िर हम हमारे तरीके से जो भी कर सकते हैं, करते हैं. खाने से पहले मिट्टी का इस्तेमाल कर हाथ धोते हैं. छिड़काव के वक्त मुंह पर कपड़ा बांध लेते हैं. बाकी सब खुला होता है. वह आंख में जाता है, शरीर पर रहता है. दस्ताने, चश्मा यह सब तो हमारे पास नहीं हैं. हम लाएं कहां से? अब तक तो कोई परेशानी नहीं हुई है लेकिन हमें मालूम है कि यह जान से खेलना है. मगर करें क्या? सवाल रोटी का है."
यवतमाल में 19 में से 9 मौतें मज़दूरों की हुई हैं. यह सब रोज़ की मज़दूरी अलग-अलग खेतों में काम कर कमाते हैं. उन्हीं में से एक देविदास मडावी थे. 19 अगस्त को सबसे पहले उनकी मौत हुई और इस त्रासदी का पता सब को चला.
जब हम उनके 25 वर्षीय बेटे संदीप को कलंब गांव में मिलते हैं तो उसकी आखों में यही सवाल नज़र आता है कि इन रसायनों का संयोजन, सुरक्षा के साधन ये सब सामान्य मज़दूर को बिना बताए कैसे समझ मे आएंगे?

किसी और बेटे का पिता न मरे
पिता को अंतिम सांस तक तड़पते हुए देखने वाले संदीप बताते हैं, "किसान या मज़दूर ये सब सुरक्षा साधन ख़ुद अगर नहीं ले पाते तो फ़िर इन कंपनियों को उन्हें देने चाहिए. किसान के शरीर पर ड्रेस, मुंह पर मास्क होना ज़रूरी है. अब तो सरकार को जाग जाना चाहिए. मैंने तो अपने पिता को खो दिया, मगर बाकी बेटों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए. यह कंपनियां उनके प्रोडक्ट्स बेचने के लिए कुछ भी करेंगी. मगर यह मज़दूर को कैसे समझ में आएगा की यह केमिकल अच्छा है या बुरा?"
यह पहला साल नहीं है कि कीटनाशकों की वजह से इतने लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. प्रशासन की मानें तो ज़िले में पिछले साल डेढ़ सौ से भी अधिक ऐसे केस दर्ज किए गए थे. लेकिन फ़िर भी उससे कोई सीख क्यों नहीं ली गई?
इस सवाल पर महाराष्ट्र के कृषि मंत्री पांडुरंग फुंडकर ने कहा, "हमने तो बताया था. कृषि विभाग ने ज्ञापन निकाले थे. इतना सब करके भी किसान अब मानते नहीं तो क्या करें? हमारा विभाग रेडियो पर यह बताता है. हर रोज़ पच्चीस हज़ार संदेश देता है, ग्रामसभा करता है. हम अब कृषि सहायक अधिकारियों की संख्या अगले 15 दिनों में और बढ़ाने जा रहे हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












