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गुजरात में दलितों को क्यों तोड़नी पड़ी मरी गायें न उठाने की कसम?
- Author, रॉक्सी गागेदकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
आपको गुजरात के ऊना की घटना याद है?
पिछले साल ऊना तालुका के मोटा समधियाला गांव में चार लोगों की गोरक्षकों के एक समूह ने पिटाई की थी.
यह घटना गुजरात में दलित चेतना का उत्प्रेरक बनकर उभरी. एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ और दलित समुदाय के कई लोगों ने शपथ ली कि वे मरी हुई गायों की खाल निकालने का अपना पारंपरिक काम नहीं करेंगे.
ऊना की घटना के बाद वढवाण तालुका के सुरेंद्रनगर में सबसे आक्रामक विरोध प्रदर्शन हुए थे. यहां बड़ी संख्या में जमा हुए दलित समाज के लोगों ने मरी हुई गायों को न उठाने की कसम ली थी.
लेकिन बीबीसी गुजराती की टीम सुरेंद्रनगर पहुंची तो स्थिति बदली हुई दिखी.
कई लोग अपनी कसम को बरक़रार नहीं रख सके. कई दलितों ने दोबारा गायों के शव उठाने का काम शुरू कर दिया है. वहीं, अपनी कसम पर कायम कुछ लोगों को इससे पीछा छुड़ाने के लिए अपना पैतृक गांव भी छोड़ना पड़ा है.
'न काम मिल रहा, न सरकार से मदद'
30 साल के मुन्ना राठौड़ वढवाण तालुका के देडादरा गांव के रहने वाले हैं. ऊना की घटना के बाद 45 दिनों तक वह गायों के शव उठाने के काम से दूर रहे. नौवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले मुन्ना ने कई निजी कंपनियों में नौकरी पाने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं अहमदाबाद और साणंद के कई कारखानों में काम मांगने गया. मैंने अपनी जानकारी उन्हें दी, जिसमें मेरी जाति का भी ज़िक्र था. अंतत: महीने भर से कुछ दिनों के बाद मुझे उसी काम पर लौटना पड़ा, जो मैंने छोड़ा था. मरी हुई गायों को उठाने का काम."
मुन्ना राठौड़ का कहना है कि न ही उन्हें निजी सेक्टर में नौकरी मिली और न ही किसी सरकारी संस्थान से उन्हें मदद मिली. उनके जैसे कई नौजवान हैं, जो नई शुरुआत करना चाहते थे पर नाकाम रहे.
हालांकि लेखक और राजनीतिक विश्लेषक विद्युत ठाकर कहते हैं कि यह कहना नाजायज़ होगा कि सरकार उनकी मदद नहीं कर रही. उनके मुताबिक, "सरकार जो कर सकती है, कर रही है. लेकिन सिर्फ़ सरकार इस स्थिति को नहीं बदल सकती."
दलितों की हालत सुधारने को वह इसे सरकार, समाज और धार्मिक संस्थानों की साझा ज़िम्मेदारी मानते हैं.
छोड़ना पड़ा गांव
वे दलित जो विपरीत हालात के सामने झुके नहीं और गायों के शव न उठाने पर अड़े रहे, उन्हें मजबूरी में अपना पैतृक गांव छोड़कर जाना पड़ा.
55 साल के कनु चावड़ा वढवाण तालुका के बलोलभल गांव में रहते थे. अब वह अपने 20 साल के बेटे और पत्नी के साथ अहमदाबाद आ गए हैं.
वह कहते हैं, "मुझे कहा गया कि अगर मैं गांव में गायों के शव नहीं उठाऊंगा तो मेरा बहिष्कार कर दिया जाएगा. तो मैंने अपने गांव का बहिष्कार कर दिया और अहमदाबाद आ गया."
कनु चावड़ा पेशे से जूते बनाने का काम करते हैं और जानवरों के शव उठाकर कुछ अतिरिक्त पैसा कमा लिया करते थे. लेकिन अब वह पुराने काम के लिए आने वाले बुलावों पर ध्यान नहीं देते.
कनु अब बडोदरा-अहमदाबाद हाइवे पर जूते पॉलिश करके जीविका चला रहे हैं. उनका बेटा कॉलेज में पढ़ता है और अहमदाबाद की ही एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करता है.
उनकी पत्नी एक बर्तन बनाने वाले के यहां काम करती हैं और रोज़ाना सौ रुपये कमाती हैं. कनु कहते हैं, "हम उस गंदे काम से पीछा छुड़ाने के लिए सब कमा रहे हैं, जिसने हम पर 'गंदे लोग' होने का धब्बा लगा दिया."
क्या हुआ था ऊना में?
जुलाई 2016 की बात है. दलित समाज के चार लोग एक गाय के शव को ले जा रहे थे. गोरक्षकों ने उन्हें रोका और पिटाई की.
इस घटना का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया और इसकी पूरे देश में आलोचना की गई. जिन्हें पीटा गया, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, एफआईआर दर्ज की गई और गिरफ़्तारियां भी हुई.
मामला राजनीतिक भी हो गया जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दलित नेता मायावती भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे. गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल भी पहुंचीं. इस घटना के बाद दलितों पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ जगह-जगह प्रदर्शन हुए.
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