नज़रिया: अपने ही जाल में फंस गए हैं योगी आदित्यनाथ?

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- Author, शरत प्रधान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
एनकाउंटर भारत में एक जाना-पहचानी चीज़ है जिसमें पुलिस अपराधियों पर सीधे गोली चलाती है. माना जाता है कि अधिकांश एनकाउंटर तयशुदा होते हैं.
उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराध से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नतीज़ा निकाला कि ग़ैरक़ानूनी हत्याओं से क़ानून व्यवस्था में सुधार आ सकता है.
ये बात राज्य के अधिकारियों ने बीबीसी से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कही.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2017 में जबसे आदित्यनाथ भारी बहुमत के साथ राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं, छह महीने में इस तरह की 433 'हत्याएं' की गईं.

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यूपी की अहमियत
एक सरकारी प्रेस बयान में इन मुठभेड़ों को अपनी सफलता के रूप में और क़ानून व्यवस्था में सुधार के सबूत के रूप में गिनाया है.
अधिकारी स्वीकार करते हैं कि इस अविश्वसनीय आंकड़े से कई लोगों की त्योरी भी चढ़ गई है. उत्तर प्रदेश की आबादी लगभग 22 करोड़ है.
यह भारत के सबसे घनी आबादी वाले राज्यों में से एक है और राजनीतिक रूप से खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये संसद में 80 सांसद भेजता है.
हालांकि ये राज्य अक्सर बर्बर हिंसा, दंगे और बलात्कार के लिए सुर्खियों में रहता है. चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने राज्य में अपराध पर लगाम लगाने का वादा किया था.

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क्रिमिनल रिकॉर्ड
कई लोगों का मानना है यूपी में ये एक बड़ी समस्या है. लेकिन बीजेपी के सत्ता में आने के बाद, इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है.
राज्य के अपराध रिकॉर्ड के अनुसार, इस साल जनवरी से अगस्त के बीच 3,000 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं.
जबकि पिछले साल इन्हीं महीनों में ये आंकड़ा 2,376 था. हत्याओं में बहुत मामूली कमी आई है, लेकिन दंगे और लूट की घटनाओं में अच्छा ख़ासा इज़ाफ़ा हुआ है.
दलितों और महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों और अन्य बड़े अपराधों की संख्या बढ़ी है.
योगी आदित्यनाथ के एंटी रोमियो स्क्वॉड के तहत सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ और उत्पीड़न की घटना से निबटने के लिए पुलिस अधिकारियों की तैनाती के बावजूद महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़े हैं.

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योगी के दिमाग की उपज
अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि इस समस्या ने आदित्यानाथ को इतना परेशान किया कि वो इसका हल निकालने की कोशिश में लग गए. लेकिन जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि बयानबाज़ी से राज्य की क़ानून व्यवस्था नहीं सुधरने वाली है.
अभी शीर्ष अधिकारी इस बारे में रणनीति बनाने पर माथापच्ची कर ही रहे थे कि आदित्यनाथ ने खुद ही 'एनकाउंटर' का हल निकाल लिया.
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें ये विश्वास दिलाया गया कि इससे उनकी सरकार के इक़बाल में बड़ी बढ़ोत्तरी होगी, जिसकी बहुत ज़रूरत है.
अस्सी के दशक में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी कथित रूप से डाकुओं को निशाना बनकर की गई कई पुलिस हत्याओं को नज़रअंदाज़ किया था.
लेकिन कई डाकुओं के मारे जाने के बावजूद, चौतरफ़ा आलोचनाओं के कारण आख़िरकार उन्हें बीच में ही इस्तीफ़ा देना पड़ गया था.

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एनकाउंटर पर खुद ही घिर गए
45 साल के योगी आदित्यनाथ, इस विवाद से अनजान नहीं हैं. पांच बार के सांसद और महंत के रूप में उन्हें भारत का सबसे विभाजनकारी राजनेता माना जाता है.
ख़ासकर चुनावी रैलियों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ दिए गए भड़काऊ भाषणों के लिए उनकी काफ़ी आलोचना होती रही है.
लेकिन उत्तर प्रदेश में हाल के समय में अपराध के बढ़ते ग्राफ़ की ख़बर नई दिल्ली तक पहुंच चुकी है.
वहां बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार सत्तारूढ़ है और इस ख़बर ने ये चिंता पैदा की है कि 2019 के आम चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर कहीं इसका असर न पड़े.
शीर्ष नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों से बीबीसी ने बात की तो वो इस बात से हैरान थे कि ये 'हत्याएं' सरकार की साख़ बनाने में क्यों नाकाम रहीं.

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क़ानून व्यवस्था
एक नौजवान पुलिस अधिकारी ने बताया, "इन मुठभेड़ों ने पुलिस को अपने नंबर बढ़ाने में कुछ मदद की, लेकिन सरकार की साख़ बढ़ाने में ये नाकाम रहीं. एनकाउंटर से क़ानून व्यवस्था को नज़रअंदाज़ किए जाने का संदेश गया."
अधिकारी कहते हैं कि जब योगी आदित्यनाथ को इस बात का अहसास हुआ कि उनकी सरकार के दौरान 433 लोग मारे गए, तो 'एनकाउंटर' की परिभाषा बदलने की कोशिश हुई.
उन्होंने दावा किया कि एनकाउंटर की हर घटना का मतलब ये नहीं है कि उसमें कोई मारा ही गया हो.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "ये आंकड़े बताते हैं कि पुलिस ने अपराधियों पर कितनी कार्रवाई की. केवल उन्हीं को मारा गया जिन्होंने पुलिस को चुनौती दी या फ़ायर करने के बाद भागने की कोशिश की."
अंत में सरकार ने कहा कि पूरे प्रदेश में हुए कुल '433 एनकाउंटर' में केवल 19 अपराधी मारे गए, जबकि 89 घायल हुए.
आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि इन मुठभेड़ों में 98 पुलिसकर्मी घायल हुए और एक की मौत हुई.
ये तो समय ही बताएगा कि ये आधिकारिक आंकड़े, राज्य में क़ानून व्यवस्था को लेकर चली आ रही धारणा को बदलने की उत्तर प्रदेश की सरकार की चाहत में कितना मददगार होंगे.
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