मुंबई: एल्फ़िंस्टन रोड और परेल स्टेशन कैसे बन गए मौत का जाल?

    • Author, जाह्नवी मूले और रवींद्र मांजरेकर
    • पदनाम, बीबीसी मराठी, मुंबई

पिछले एक दशक में मुंबई के परेल इलाके में कॉर्पोरेट दफ़्तरों की संख्या काफी बढ़ गई है.

ज़ाहिर तौर पर इससे एल्फ़िंस्टन रोड और परेल रेलवे स्टेशन का सफ़र करने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ गई है.

अगर इन रेलवे स्टेशनों के आधारभूत ढांचे की बात करें तो उसका हाल लगभग एक दशक पहले जैसा ही है.

कई बार यात्रियों की शिकायत के बावजूद स्थिति में सुधार के लिए कुछ ज़्यादा नहीं किया गया और हर दिन 'भयानक' रेल यात्रा के बाद यात्री अपने दफ़्तर पहुंचते हैं.

यात्रियों के लिए बुरा सपना

इससे पहले, दक्षिण-मध्य मुंबई इलाका कपड़ा मिलों का केंद्र था लेकिन मिलों के बंद होने के बाद दक्षिण मुंबई से यहां व्यवसाय केंद्र स्थापित हो गए.

खाली पड़ी मिल की ज़मीनों पर गगनचुंबी इमारतें बनाई गईं और अब बहुत से यात्री हर दिन यहां ट्रेन से उतरते हैं.

जिससे एल्फ़िंस्टन रोड और परेल स्टेशनों पर खासा दबाव रहता है. परेल पर एक नए फुटओवर ब्रिज के अलावा कुछ नई तब्दीली नहीं हुई है.

इन स्टेशनों से बाहर निकलने का रास्ता अब भी बहुत संकरा है. भीड़भाड़ वाले घंटों में इन पुलों को पार करना एक बुरे सपने जैसा है और दोनों रास्ते मौत का जाल बन चुके हैं.

परेल की भीड़

इस स्टेशन के लिए रोज़ाना ट्रेन में सफ़र करने वाले यात्री समीर कर्वे बताते हैं कि वह यहां हुई भगदड़ से एक दिन पहले इसी मुद्दे पर बात कर रहे थे.

समीर कहते हैं, "यह एक दुर्घटना को आमंत्रित करने जैसा है. परेल पर हमेशा भीड़ रहती है क्योंकि स्टेशन के एक तरफ़ दफ़्तर और दूसरी ओर अस्पताल हैं."

समीर कर्वे ने कहा कि यहां कोई भी भीड़ को नियंत्रित करने वाला नज़र नहीं आता. शुक्रवार को हुई भगदड़ ने कुछ बुनियादी मुद्दों को वापस ध्यान में लाया है.

रेल महकमा परेल रेलवे स्टेशन को टर्मिनल बनाना चाहता है. नई योजना के तहत बन रहे प्लेटफॉर्म का काम अभी बहुत धीमी गति से चल रहा है.

एल्फ़िंस्टन रोड का जब नाम बदला

एल्फ़िंस्टन रोड स्टेशन 1867 में शुरू हुआ था. इसका नाम मुंबई के गवर्नर रहे लॉर्ड एल्फ़िंस्टन के नाम पर रखा गया था जो 1853 से 1860 के बीच गवर्नर थे.

दिसंबर 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने इस स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी रखने का प्रस्ताव पास किया जिसको रेलवे ने अनुमति दे दी थी, लेकिन इसकी प्रक्रिया अभी चल ही रही है.

रेलवे पैसेंजर एसोसिएशन के सुभाष गुप्ता कहते हैं कि एल्फ़िंस्टन रोड एक छोटा स्टेशन है लेकिन यह महत्वपूर्ण है.

वह कहते हैं कि यह उन दो केंद्रों में से एक है जहां पश्चिमी और मध्य रेलवे मिलते हैं, दादर दूसरा स्टेशन है जहां बेहतर आधारभूत ढांचा है लेकिन एल्फ़िंस्टन रोड बेहद छोटा स्टेशन है और इस पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया.

आधारभूत ढांचे की मांग

गुप्ता ने बताया, "15 सालों में यात्रियों की संख्या काफ़ी बढ़ी है. पैसेंजर एसोसिएशन बेहतर आधारभूत ढांचे की मांग कर रही है. फुटओवर ब्रिज और सीढ़ियां तंग हैं जिसके कारण कभी भी भगदड़ हो सकती है. हम अकसर इस बात को कहा करते थे लेकिन रेलवे ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया."

वह आगे बताते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि अगले 10 सालों में यह तस्वीर बदल जाएगी और यह लोगों की ज़िंदगी के साथ खेलने की तरह है.

गुप्ता कहते हैं, "नए रेल मंत्री पीयूष गोयल भी मुंबई से हैं. हमें लगता है कि वह इसे गंभीरता से लेंगे. हम उनसे अनुरोध करने जा रहे हैं कि जो इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार हैं उन्हें सज़ा मिले. हम कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं."

पुराने पुलों पर सवाल

सुभाष गुप्ता कहते हैं कि पुल और सीढ़ियां चौड़ी होनी चाहिए और यात्री आराम से गुज़र सकें इसके लिए ध्यान दिया जाना चाहिए.

हर रेलवे स्टेशन को तीन फुटओवर ब्रिज की ज़रूरत है और कई स्टेशनों पर दो ब्रिज हैं लेकिन लोग उस ब्रिज का अधिक इस्तेमाल करते हैं जो मेन रोड के करीब है. लोग कम समय में कैसे स्टेशन के बाहर निकल सकें इस पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए.

गुप्ता बताते हैं कि 20 साल पहले परेल एल्फ़िंस्टन रोड रिहायशी इलाका था लेकिन अब यहां बड़े दफ़्तर हैं, यहां पर केईएम और टाटा जैसे बड़े अस्पताल हैं जिस कारण यहां अधिक ट्रैफ़िक रहता है.

वह कहते हैं, "मुंबई में ज़मीनी हक़ीक़त को ध्यान में रखते हुए पुल, सीढ़ियां और एस्केलेटर्स बनाने चाहिए. इसके लिए दो-तीन पुल बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है."

'मुंबई आईसीयू में है'

परेल में गगनचुंबी इमारतें बनाने के लिए रिहायशी इमारतें जैसे चॉल को ढहा दिया गया. नरीमन पॉइंट को खाली किया जा रहा है और आप सीएसटी और चर्चगेट रेलवे स्टेशन से आराम से बाहर निकल सकते हैं. लेकिन परेल और एलफ़िंस्टन रोड स्टेशन के पास अधिक जगह नहीं है.

शहरों का प्लान तैयार करने वालीं सुलक्षणा महाजन कहती हैं, "सार्वजनिक आधारभूत संरचना के बारे में सोचे बिना उन्होंने नए निर्माण की अनुमति दी है. सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है."

परेल स्टेशन एक सीमित क्षेत्र है यदि आप एक व्यक्ति प्रति वर्ग फुट पर विचार करते हैं, तो यह अनुपात 18 गुना अधिक है.

सुलक्षणा कहती हैं, "इसको प्लान करने की आवश्यकता है लेकिन इस पर कोई विचार-विमर्श नहीं है. विशेषज्ञों की जगह यदि राजनीतिक आधार पर निर्णय लिया जाता है, तो चीज़ें खराब हो जाती हैं."

वह कहती हैं कि मुंबई आईसीयू में है और आपातकाल घोषित करके शहर की प्लानिंग का अधिकार विशेषज्ञों को दिया जाना चाहिए.

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