छत्तीसगढ़: 'बायोफ़्यूल फ़्लॉप रहा, अब हमारी ज़मीनें वापस करे सरकार'

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिये
रायपुर ज़िले के सुंदरकेरा गांव के रहने वाले आदिवासी लक्ष्मण ध्रुव से अगर आप जेट्रोफ़ा यानी रतनजोत का नाम लें तो वो भड़क जाते हैं. उनका मानना है कि रतनजोत के कारण उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई.
असल में मामला बायोफ़्यूल से जुड़ा है. छत्तीसगढ़ सरकार ने 12 साल पहले कम क़ीमत का हवाला देकर बायो डीजल बनाने के लिए अमरीकी मूल के जेट्रोफा यानी रतनजोत पौधे को अपना हथियार बनाया और राज्य भर में रतनजोत लगाने की शुरुआत की.
लक्ष्मण कहते हैं, "पुरखों की थोड़ी-सी ज़मीन थी. मेरे बाबा, परबाबा उसी ज़मीन पर खेती कर अपना गुजारा करते थे. लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने कहा कि यह वन विभाग की ज़मीन है. रातों-रात हमारी खड़ी फ़सल उजाड़ दी गई और वहां रतनजोत लगा दिया गया. न हमारी खेती बची, न सरकार का रतनजोत. अब हम मज़दूरी कर के गुजारा करते हैं."
पढ़ेंइस रिपोर्ट की पहली किस्त:एक लीटर डीज़ल की कीमत 54 हज़ार रुपये

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"डीजल नहीं अब खाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से"
सुंदरकेरा में लक्ष्मण अकेले ऐसे नहीं हैं, जिन्हें खेती-बाड़ी की ज़मीन से बेदखल कर दिया गया.
छत्तीसगढ़ सरकार ने जब बायोडीजल बनाने के नाम पर पूरे छत्तीसगढ़ में रतनजोत के पौधे लगाने की शुरुआत की तो सुंदरकेरा गांव भी उसकी जद में आया.
राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नारा दिया था- "डीजल नहीं अब खाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से."

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रमन सिंह ने दावा किया था कि 2014 तक छत्तीसगढ़ डीजल के मामले में आत्मनिर्भर हो जायेगा. पूरे राज्य में 1.65 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर रतनजोत लगाये गये.
सुंदरकेरा पंचायत की 105 एकड़ ज़मीन पर भी रतनजोत लगाया गया. 7 नवंबर 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को इस गांव में बुला कर एक भव्य आयोजन किया गया और उनके हाथों रतनजोत लगवाया गया.

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"रतनजोत पूरा फेल हो गया"
गांव के तत्कालीन सरपंच नत्थू साहु का दावा है कि तब से अब तक उस 105 एकड़ की ज़मीन पर तीन बार पौधारोपण किया जा चुका है. बीज विकास निगम और रोजगार गारंटी योजना में भी पौधे लगाये गये.
नत्थू साहु कहते हैं, "अब एक भी पौधा नहीं बचा. रख रखाव किया ही नहीं गया. राष्ट्रपति जी ने रतनजोत का जो पौधा लगाया था, वह भी सूख गया. रतनजोत पूरा फेल हो गया. अब वहां पर दूसरे पौधे लगाये गये हैं लेकिन उसे भी उखाड़ कर वहां जलाशय बनाने की योजना है."
नत्थू मानते हैं कि जिस ज़मीन पर रतनजोत लगाया गया था, उस ज़मीन पर गांव के पिछड़े और आदिवासी पुश्त दर पुश्त खेती करते रहे हैं. लेकिन उनकी पत्नी सुशीला साहु अब गांव की नई सरपंच हैं और उनकी चिंता में अब केवल जलाशय शामिल है.

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गड़बड़ी की जांच की जाएगी
गांव के बिट्ठल तारक कहते हैं, "हमारे जैसे 70 लोगों को उनकी ज़मीन से हटा कर रतनजोत लगाया गया था. हमने विरोध किया तो 70 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. बड़ी मुश्किल से जमानत मिली. अब जबकि रतनजोत नहीं है तो गांव के लोगों को उनकी ज़मीन वापस मिलनी चाहिए."
राज्य के वन मंत्री महेश गागड़ा पूरे मामले से अनभिज्ञता जताते हुए कहते हैं कि सुंदरकेरा में कहां गड़बड़ी हुई है, उसकी पूरी जांच की जाएगी.
लेकिन सवाल केवल सुंदरकेरा का नहीं है.

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तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही
छत्तीसगढ़ के अधिकांश ज़िलों में सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने रतनजोत लगाने के लिये आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी ज़मीनों से बेदखल कर दिया. कांकेर से लेकर बिलासपुर तक सैकड़ों ऐसे मामले सामने आए, जहां रतनजोत के लिये पुश्तैनी ज़मीनें छीन ली गईं.
हालांकि छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण के परियोजना अधिकारी सुमित सरकार ऐसी किसी जानकारी से इंकार करते हैं.
सरकार कहते हैं, "अलग-अलग विभागों ने पौधे लगाए. उन्होंने क्या किया, क्या नहीं किया, इस बारे में प्राधिकरण के पास कोई जानकारी नहीं है. यह हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला है."

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बिलासपुर के अचानकमार इलाके के पंचराम अपने परती पड़े खेतों की ओर इशारा करते हुए दावा करते हैं कि इन खेतों में अच्छी-खासी धान की फसल उगती थी लेकिन सरकार ने रतनजोत के नाम पर ज़मीन छीन ली.
पंचराम कहते हैं, "तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही. कुछ नहीं हुआ. हमारे खेत गए सो अलग. लेकिन इसकी परवाह किसी को नहीं है. उन्हें भी नहीं, जो बाड़ी से तेल निकालने का दावा करते थे."
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