एक पुल, जो बन चुका है 'डेथ प्वॉइंट'

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, इलाहाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
इलाहाबाद में यमुना नदी पर अत्याधुनिक तकनीक से बना नया नैनी पुल शहर को मध्य प्रदेश से जोड़ने का एक बेहतरीन साधन है. इसके अलावा ये पुल एक और वजह से चर्चा में रहता है.
पुल को बने हुए क़रीब 13 साल हो गए हैं और इस दौरान यहां से यमुना नदी में कूदकर सैकड़ों लोग आत्महत्या कर चुके हैं. यही वजह है कि पुल पर एक ख़ास जगह को 'सुसाइड प्वाइंट' या 'डेथ प्वाइंट' कहा जाने लगा है.
ये देश का दूसरा ऐसा पुल है जिसे केबल स्टेड तकनीक से बनाया गया है. डेढ़ किलोमीटर लंबा और 365 मीटर ऊंचा ये पुल चार साल में बनकर तैयार हुआ था. पुल के निर्माण में उस वक़्त क़रीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे. केबल पर टिके दो खंभों के बीच के हिस्से से ही कई लोग आत्महत्या कर चुके हैं.
पुलिस का कहना है कि औसतन हर महीने आठ से दस लोग यहां से छलांग लगाते हैं, कुछ को बचा लिया जाता है लेकिन बहुत से लोग नहीं बच पाते हैं.

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पुल से लगाते हैं छलांग
कीडगंज के पुलिस क्षेत्राधिकारी विनीत जायसवाल बताते हैं, "हमारी जानकारी में अब तक क़रीब 11 सौ लोग यहां से छलांग लगा चुके हैं. दिन में कूदने वाले लोगों को तो पुलिस के गोताखोर या फिर यहां के मल्लाह अक़्सर बचा लेते हैं लेकिन रात में या देर शाम कोई कूदता है तो उसे बचाना संभव नहीं हो पाता."
पुल न सिर्फ़ अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है बल्कि बेहद ख़ूबसूरत भी है. शाम के वक़्त ये जगह स्थानीय लोगों के सैर-सपाटे की होती है. पुल के ऊपर से रोशनी में नहाए शहर की छटा देखते ही बनती है और यमुना नदी में उसकी छाया ख़ूबसूरती में चार चांद लगा देती है.

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यही वजह है कि शाम के वक़्त यहां ऐसा लगता है जैसे मेला लगा हो. ऐसे उत्सवधर्मी माहौल में कोई अपनी जान भी दे सकता है, ये कोई सोच भी नहीं सकता. लेकिन पिछले एक दशक के आँकड़े यही बताते हैं. पुलिस के मुताबिक अब तक कम से कम 550 लोगों की मौत हो चुकी है.

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ऐसा लोग क्यों करते हैं? ज़ाहिर है इसका जवाब शायद ही कोई दे पाए, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक पुल काफी ऊंचा है और इसके नीचे यमुना नदी काफी गहरी भी हैं. पुल के किनारे टहल रहे राम स्वरूप कहते हैं, "जो व्यक्ति ये सोच कर आता है कि उसे मरना ही है तो उसके लिए यह जगह बहुत मुफ़ीद लगती है. कूदने के बाद बचने की उम्मीद न के बराबर रहती है."
इस पुल के निर्माण की जब शुरुआत हुई तब केंद्र में एनडीए की सरकार थी और उस वक़्त बीजेपी के कद्दावर नेता रहे मुरली मनोहर जोशी यहां से सांसद थे. लेकिन पुल जब बनकर तैयार हुआ तब केंद्र में यूपीए की सरकार आ गई.

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औपचारिक उद्घाटन नहीं, जनता के लिए खोला
स्थानीय लोग बताते हैं कि इस पुल का कभी औपचारिक उद्घाटन तक नहीं हुआ और इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया. स्थानीय लोगों के मुताबिक, आत्महत्या की बढ़ती ख़बरों से चिंतित प्रशासन ने पुल पर एक बार हवन-पूजन भी कराया.
प्रशासनिक अधिकारी तो इस बारे में कुछ नहीं बताते हैं लेकिन इलाहाबाद के एक पत्रकार जितेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, "हवन-पूजन कराया तो गया था, अब प्रशासन ने कराया था या फिर स्वयंसेवी संस्थाओं ने, या फिर किसने, ये पता नहीं."
जितेंद्र त्रिपाठी की बात की पुष्टि कई स्थानीय नागरिक भी करते हैं.
हालांकि इलाहाबाद में गंगा और यमुना नदियों में कई बार 'जल समाधि' के मक़सद से भी लोगों को कूदते देखा गया है. सीओ विनीत जायसवाल बताते हैं, "धार्मिक मान्यता के चलते कई बार बाहर से आए लोग यहां कूदकर जान देते हैं. लेकिन ये ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोग होते हैं. पुल से नीचे कूदने वालों का इससे कोई लेना-देना नहीं लगता. क्योंकि यहां से ज़्यादातर उन लोगों ने छलांग लगाई है जो युवा थे और किन्हीं वजहों से परेशान थे."
छलांग लगाने की घटनाओं के चलते स्थानीय लोग लंबे समय से पुल के दोनों ओर लोहे की जाली लगवाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें अपनी इस मांग के पूरी होने का इंतज़ार है.
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