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बच्चे पैदा करने की पारसियों की 'जियो योजना'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई से
पारुल तुरेल गर्भवती हैं. वो 45 साल की उम्र में पहली बार माँ बनने की अपनी ख़ुशी छिपा नहीं सकतीं. उनकी ख़ुशी उस समय दोगुनी हो गई जब उन्हें पता चला कि वो जुड़वा बच्चों की माँ बनने वाली हैं.
सात महीने पहले हुई डॉक्टर से उनकी मुलाक़ात वो खिलखिलाकर याद करती हैं, "जब डॉक्टर ने सोनोग्राफी की और कहा कि आपको जुड़वा बच्चे हैं तो मैंने डॉक्टर को इतना कस के पकड़ लिया कि डॉक्टर बोलने लगे कि उनका दम घुट रहा है. तब मुझे एहसास हुआ कि मैंने उन्हें बहुत ज़ोर से पकड़ा हुआ है. मैंने उन्हें सॉरी कहा."
ज़ाहिर है पारुल की ख़ुशी की इंतिहा नहीं थी. वो कहती हैं, "यह एक नेचुरल प्रतिक्रिया थी क्योंकि ये उस तरह से था कि अँधा एक आँख मांगता है और उसे दो आँखें मिल जाती हैं."
वो और उनके पति अस्पी तुरेल मायूस हो चुके थे. उनकी ख़ुशी में 'जियो पारसी' मुहिम का बड़ा हाथ है. अस्पी कहते हैं, "हमारे पास आईवीएफ के लिहाज़ के लिए पैसे नहीं थे. जियो पारसी प्रोग्राम ने इलाज के सारे पैसे दिए और चौथी कोशिश के बाद हमें सफलता मिली"
योजना का फ़ायदा
फेरीदे दोतीवाला अपने आठ वर्षीय बेटे के साथ खुश थीं. दूसरे बेटे के लिए कोशिश की, लेकिन इस बार मायूसी हुई. ऐसे में जियो पारसी ने 2015 में उनकी मदद की. अब तो उनका दूसरा बीटा मेहरज़ाद ढाई साल का हो चुका है.
वो कहती हैं, "मैं पारसी टाइम्स पढ़ रही थी जहाँ मुझे जियो पारसी के बारे में जानकारी हासिल हुई. तब मैंने सोचा कि जब ये योजना सब को फायदा पहुंचा रही है तो मुझे भी अपनी क़िस्मत को आज़माना चाहिए. ऊपर वाले की मेहरबानी से और जियो पारसी की मदद से मैं दो बच्चों की माँ हूँ."
जियो पारसी मुहिम पारसियों की तेज़ी से घटती आबादी को देखते हुए तीन साल पहले शुरू की गई थी जिसका मक़सद पारसियों को बच्चे पैदा करने के लिए मानसिक और शारीरिक तौर पर तैयार करना था.
जियो पारसी योजना क्या है?
सदियों पहले ईरान से आए ज़रथुस्त्र धर्म के मानने वाले पारसी शरणार्थी गुजरात में आकर बस गए और बाद में इनकी अधिकतर संख्या मुंबई में आकर रहने लगी.
साल 2011 की जनगणना के अनुसार इस समुदाय की संख्या 57,000 से थोड़ी अधिक है.
समुदाय में हर साल 800 मौतें होती हैं जबकि बच्चे हर साल केवल 200 पैदा होते हैं.
केंद्र सरकार ने इस योजना को 10 करोड़ रुपये दिए हैं. जियो पारसी योजना के तहत पिछले तीन सालों में 110 बच्चे पैदा हो चुके हैं
पारसी समुदाय का योगदान
भारत की एक अरब की आबादी में 57,000 पारसियों की आबादी दाल में नमक के बराबर है. लेकिन इनका योगदान हर क्षेत्र में है और ये काफी महत्वपूर्ण है.
पारसी समुदाय के टाटा ग्रुप, वाडिया ग्रुप और गोदरेज जैसी कंपनियों ने भारत के आर्थिक और औद्योगिक विकास में भरपूर हिस्सा लिया है.
बॉलीवुड में अभिनेता बोमन ईरानी और कोरियोग्राफर श्यामक डावर पारसी हैं. भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल सैम मानिकशॉ भी पारसी थे.
पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी भी पारसी हैं. पारसियों को इस बात पर फ़ख़्र है कि पारसी समाज का योगदान हर क्षेत्र में है.
जियो पारसी योजना कितनी कामयाब?
केंद्र सरकार ने पांच साल की इस योजना के लिए 200 बच्चों की पैदाइश का लक्ष्य रखा था. अब तक 110 बच्चों का जन्म हुआ है और 15 महिलाएं गर्भवती हैं.
केटी गंडेविया मुंबई में जियो पारसी योजना चलाती हैं.
वो कहती हैं, "हमारी योजना असल में 2014 में शुरू हुई. सरकार ने 200 का जो लक्ष्य रखा है उसे हम आधे से ज़्यादा पूरा कर सके हैं. इसके दो-तीन कारण हैं. एक तो बच्चे पैदा करने वाली लड़कियां भी होनी चाहिए. जिनके बच्चे हैं, उन्हें दूसरा बच्चा पैदा करने की इच्छा भी होनी चाहिए. हमारे समाज में आईवीएफ को परखनली शिशु बोलते हैं जो कलंकित समझा जाता है."
योजना की आलोचना
इस योजना से जुड़ी पर्ल मिस्त्री के अनुसार लोगों की मानसिकता बदलने की कोशिश की जा रही है.
लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये योजना केवल समय की बर्बादी है. इससे अब तक कोई ख़ास आबादी बढ़ने वाली नहीं.
इंटरनेट ब्लॉगर सिमिन पटेल इस योजना से बेहद नाराज़ हैं.
वह कहती हैं, "मेरे विचार में बच्चों को इस तरह से पैदा कराने के बजाए इस मसले को हल करने के कई तरीके हो सकते हैं. पारसी माँ और ग़ैर-पारसी पिता के हज़ारों ऐसे बच्चे हैं जो क़ानूनी तौर से पारसी नहीं स्वीकार किए जाते और जिन्हें पारसी समुदाय पारसी नहीं मानता. तो अगर हम इन बच्चों को क़ानूनी और सामाजिक तौर पर पारसी समुदाय में शामिल करना शुरू कर दें तो पारसियों की आबादी हज़ारों की संख्या में बढ़ जाएगी."
ये प्रोग्राम दिल्ली स्थित पारसी सामाजिक कार्यकर्ता शर्नाज कामा के दिमाग की उपज माना जाता है. वो कहती हैं जियो पारसी एक कामयाब योजना है, "जियो पारसी के शुरू होने के बाद से पारसियों की आबादी 18 प्रतिशत बढ़ी है. ये वृद्धि कुछ कम नहीं है."
सिमिन को जियो पारसी के विज्ञापन पर भी ऐतराज़ है. इन विज्ञापनों को मुंबई की मेडिसन कंपनी ने बनाया है जिसके कर्ताधर्ता इश्तिहार की दुनिया की जानी-मानी हस्ती सैम बलसारा हैं जो खुद भी एक पारसी हैं.
वे कहते हैं, "अगर ये विज्ञापन विवादास्पद और उत्तेजक हैं तो हमारा उद्देश्य पूरा हो गया. हम चाहते थे कि पारसियों की तेज़ी से घटती आबादी जैसे गंभीर मुद्दे को पारसी गंभीरता से लें."
ये सही है कि जियो पारसी जैसी योजनाओं से पारसियों की आबादी तेज़ी से नहीं बढ़ सकेगी लेकिन कम से कम पारसी समुदाय को विलुप्त होने से बचाने की ये एक गंभीर कोशिश ज़रूर है. शायद इसीलिए जल्द ही ये योजना दूसरे मरहले में प्रवेश करने वाली है.
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