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किस तरह की मानसिकता के लोग बनाते हैं बच्चों को शिकार?
- Author, गुरप्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रायन इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के बच्चे की हत्या और टैगोर पब्लिक स्कूल में बच्ची के साथ रेप की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है.
दिल्ली और आसपास के इलाक़े में ही नहीं बल्कि पूरे देश में बच्चों के साथ होने वाले अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं.
इन राज्यों के बच्चे ज्यादा शिकार
मासूम बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों का आंकड़ा परेशान करने वाला है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में भारत में बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के 94,172 मामले दर्ज किए गए. इनमें अपहरण के 41,893 मामले, यौन शोषण के 14,913 मामले, रेप के 10,854 और हत्या के 1,758 मामले थे.
इनमें महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली से सबसे ज़्यादा मामले सामने आए, जबकि सिक्किम और नगालैंड में सबसे कम अपराध देखने को मिले.
एक तरफ लोगों में ग़ुस्सा है तो दूसरी तरफ़ हैरानी भी है. सवाल उठता है कि आख़िर वो किस तरह की मानसिकता के लोग होते हैं, जो मासूमों को निशाना बनाते हैं?
बीबीसी हिंदी ने इसी सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की.
सामान्य लोगों से अलग होते हैं
मनोचिकित्सक अरुणा ब्रूटा बताती हैं, " बच्चों के साथ यौन शोषण करने वाले लोग सेक्शुअल डिसऑर्डर का शिकार होते हैं. उन्हें बच्चों के यौन शोषण से मज़ा मिलता है और अपनी इन हरकतों का सबूत मिटाने के लिए वो बच्चों की हत्या तक कर देते हैं."
हालांकि इस तरह का हर मानसिक रोगी बच्चों की जान नहीं लेता.
मनोचिकित्सक संदीप वोहरा बताते हैं, "बच्चों को टारगेट करने वाले लोगों को पीडोफाइल कहा जाता है. इनका रुझान शुरू से बच्चों की तरफ़ होता है. वो वयस्कों के बजाय बच्चों को देखकर उत्तेजित होते हैं."
डॉक्टर संदीप वोहरा बताते हैं कि ऐसे लोग असामाजिक हरकतें करते हैं. ये यौन शोषण के अलावा कई बार चोरी या हत्या जैसे अपराधों में भी शामिल होते हैं.
कौन लोग हैं ये?
ऐसी मानसिकता वाले लोग किस पृष्ठभूमि से आते होंगे? जवाब में डॉ. वोहरा बताते हैं कि बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों को अंजाम देने वाले लोग कई बार निचले तबके के होते हैं. या फिर ये ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने बचपन में बहुत नकारात्मकता देखी हो, अपने आस-पास घरेलू हिंसा, नशाखोरी या अपराध होते हुए देखे हों.
डॉ. ब्रूटा बताती हैं, "बचपन में घर और आस-पास का माहौल किसी भी इंसान के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है. अपने आस-पास हिंसा और अपराध होता देख बच्चा भी आगे चलकर अपराधी प्रवृति का बन सकता है."
डॉ. ब्रूटा के मुताबिक़ दूसरी बीमारियों की तरह ही पर्सनालिटी डिसऑर्डर का भी अगली पीढ़ी में जाने का ख़तरा रहता है. कई बार पीडोफाइल खुद बचपन में यौन शौषण का शिकार हुए होते हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी इंटरनेट पर ओपन सेक्स मार्केट को मानसिकता में विकृति का एक कारण बताती हैं.
कैसे बच्चों को बनाते हैं निशाना?
डॉ. वोहरा बताते हैं कि पीडोफाइल ख़ास योजना के तहत अपराध को अंजाम देते हैं. पहले तो वो ऐसी जगह ढूंढते हैं जहां बच्चा अकेला हो और उनके पकड़े जाने की संभावना कम हो. वो बच्चों को लुभाने के लिए टॉफ़ी-चॉकलेट रखते हैं. बच्चों से दोस्ती करने की कोशिश करते हैं.
वो ऐसे बच्चों को निशाना बनाते हैं, जो विरोध ना कर सकें या किसी को इस बारे में नहीं बताएं. अगर बच्चा शोर मचाने की कोशिश करता है तो वे कई बार क्रूर तरीके से बदला लेते हैं. ऐसे लोग पकड़े जाने से पहले कई बच्चों के साथ शोषण की कोशिशें कर चुके होते हैं.
डॉ. वोहरा बताते हैं कि पीडोफाइल अक्सर बच्चों के आस-पास रहने कोशिश करते हैं. वो ज्यादातर स्कूलों या ऐसी जगहों को चुनते हैं, जहां बच्चों का आना-जाना ज्यादा हो. वो ऐसे घरों में आना-जाना रखते हैं, जहां बच्चे ज्यादा हों. वो ऐसा काम भी ढूंढ लेते हैं, जहां बच्चों के बीच रह कर हो सकें.
ज्यादातर मामलों में बच्चों को शिकार बनाने वाले उनके करीबी ही होते हैं. ये स्कूल बस का ड्राइवर, कंडक्टर, शिक्षक या स्कूल का कोई कर्मचारी हो सकता है.
दूसरी तरह ये लोग घर के भी हो सकते हैं. वो चाचा, मामा, पड़ोसी भी हो सकता है. दूसरी तरह के ये लोग ज्यादा ख़तरनाक होते हैं. ऐसे लोग आसानी से शक के दायरे में नहीं आते. कई बार बच्चों के शिकायत करने पर भी अभिभावक बच्चों का यकीन नहीं करते.
बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराध, ख़ासतौर पर यौन अपराध के ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते, क्योंकि बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है.
अगर वो समझते भी हैं तो डांट के डर से अभिभावकों से इस बारे में बात नहीं करते हैं. महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय के अध्ययन में भी यही बात सामने आई है.
कैसे समझाएं बच्चों को?
- बच्चों से खुलकर बात करें. उनकी बात सुने और समझें. अगर बच्चा कुछ ऐसा बताता है तो उसे गंभीरता से लें. इस समस्या को हल करने की कोशिश करें. पुलिस में बेझिझक शिकायत करें.
- बच्चों को 'गुड टच-बैड टच' के बारे में बताएं- बच्चों को बताएं कि किस तरह किसी का उनको छूना ग़लत है. उन्हें समझाएं कि अगर कोई उन्हें ग़लत तरह से छूता है तो वो तुरंत इसका विरोध करें और माता-पिता को इस बारे में बताएं.
- अभिभावक बच्चों के साथ हर वक्त नहीं रह सकते इसलिए बच्चों को जागरूक करना जरूरी है. बच्चों को घरों में परिवार और स्कूल में टीचर इस बारे में जागरूक करें.
मनोवैज्ञानिक डॉ. संदीप वोहरा कहते हैं, "बच्चों के आस-पास काम करने वाले लोगों की पुलिस वेरिफिकेशन होनी चाहिए. जब कोई अपराध करता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के ज़रिए जल्द से जल्द सज़ा मिलनी चाहिए. अपराधियों को जल्द सज़ा समाज में सख्त संदेश देती है कि ऐसा अपराध करने वाले बच नहीं सकते."
बच्चों की सुरक्षा के लिए पॉक्सो क़ानून
बाल यौन अपराधियों को सज़ा देने के लिए खास कानून है. पॉक्सो यानि प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस. इस कानून का मकसद बच्चों को के साथ यौन अपराध करने वालों को जल्द से जल्द सजा दिलाना है.
इस कानून के मुताबिक अगर बाल यौन शोषण का कोई मामला सामने आता है तो पुलिस को जल्द से जल्द कार्रवाई करनी होगी.
इसमें बच्चे की पहचान को सुरक्षित रखना अनिवार्य है. कानूनी कार्रवाई के कारण बच्चे को मानसिक तौर पर परेशानी ना हो, इसका खास ध्यान रखा जाना चाहिए.
जागरूकता ज़रूरी
बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ रहे उत्पीड़न के मामलों पर जागरूकता के ज़रिए रोक लगाई जा सकती है. इसकी दो स्तरों पर ज़रूरत होती है. बच्चों के साथ ही अभिभावकों को भी जागरूक किया जाना ज़रूरी है.
यौन अपराधों पर लगाम लगने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जा सकता है. अभिभावकों और शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल से बच्चों को समझाना आसान होगा.
बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के ज्यादा मामले बाल सुरक्षा अधिनियम 2012 आने के बाद सामने आए हैं. पहले अपराधों को दर्ज नहीं कराया जाता था लेकिन अब लोगों में जागरूकता आने के कारण बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के दर्ज मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है.
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