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क्या म्यांमार-बांग्लादेश के बीच मुश्किल में है भारत?
क्या म्यांमार में जारी रोहिंग्या संकट पर भारत ने अपना रुख अचानक से नरम कर लिया है?
डर के कारण म्यांमार से अपना घर-बार छोड़कर बांग्लादेश आ रहे रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए गुरुवार को भारत ने मदद भेजना शुरू किया है. भारत ने इस क़दम को 'ऑपरेशन इंसानियत' नाम दिया है.
इससे पहले पांच सितबंर को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि रोहिंग्या यहां अवैध तरीके से रह रहे हैं और उन्हें वापस भेजा जाएगा. उन्होंने यहां तक कहा था कि इस मामले में किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए क्योंकि भारत उन देशों से एक है जहां सबसे ज़्यादा शरणार्थी रह रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबितक क़रीब 40 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान भारत में रह रहे हैं जिनमें से 16 हज़ार लोगों के पास शरणार्थी के दस्तावेज हैं. भारत रोहिंग्या मुसलमानों के लिए राहत सामग्री बांग्लादेश में कई स्थानों पर भेजेगा. पहली खेप गुरुवार को चिटगांव पहुंचेगी.
भारत बांग्लादेश को चावल, दाल, चीनी, नमक, खाद्य तेल, चाय, नूडल्स, बिस्कुट, मच्छरदानी और अन्य ज़रूरत के सामान मुहैया कराएगा. भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है, ''बांग्लादेश में हर संकट के लिए भारत मदद करने को तैयार रहता है. भारत और बांग्लादेश के लोगों के बीच गहरी दोस्ती है. बांग्लादेश सरकार को जब मदद की ज़रूरत है तो भारत इसके लिए पूरी तरह से तैयार है.''
बांग्लादेश-भारत के संबंध अच्छे
इससे पहले रोहिंग्या मुसलमानों पर भारत के रुख की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ज़ेड रॉड ने कड़ी आलोचना की थी. ज़ेड ने कहा था कि जब रोहिंग्या अपने देश में ख़तरा महसूस कर रहे हैं, ऐसे में भारत का कहना कि उन्हें वापस भेजा जाएगा, ये काफ़ी निंदनीय है.
बांग्लादेश और भारत के संबंध अभी अच्छे हैं. बांग्लादेश में क़रीब सात लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों में गई थीं. उन्होंने कैंपों से लौटने के बाद कहा था कि अगर बांग्लादेश एक करोड़ 60 लाख लोगों को भोजन दे सकता है तो सात लाख रोहिंग्या को भी खिला सकता है.''
क्या बांग्लादेश के इस रुख़ का दबाव भारत पर है? म्यांमार में भारत के राजदूत रहे जी पार्थसारथी कहते हैं, ''रोहिंग्या का संबंध बांग्लादेश और म्यांमार से है, भारत से नहीं है. इन्हीं दोनों देशों को मिलकर इस समस्या को सुलझाना है. भारत से बांग्लादेश के अच्छे संबंध हैं. ऐसे में भारत का मदद करना स्वाभाविक-सी बात है.''
क्या भारत ने रोहिंग्या के मसले पर अपना रुख़ बदला है? इस पर पार्थसारथी कहते हैं, ''ऐसा नहीं है. किरण रिजिजू का बयान सुरक्षा कारणों की वजह से था. भारत की हमेशा से नीति रही है कि शरणार्थियों को वापस भेजना है. किरण रिजिजू ने ये नहीं कहा कि आप बोरिया-बिस्तर बांध लीजिए और निकल जाइए. उन्होंने कहा कि हम वापस भेजेंगे. हमने ऐसा ही बांग्लादेश के सवा करोड़ शरणार्थियों के साथ किया था.''
एकता और अखंडता की उपेक्षा नहीं
जी पार्थसारथी का कहना है कि म्यांमार ने पूर्वोत्तर के राज्यों में चरमपंथ पर काबू पाने के लिए भारत की काफ़ी मदद की है. उन्होंने कहा कि 'हम अपने देश की एकता और अखंडता की उपेक्षा नहीं कर सकते.' जी पार्थसारथी के मुताबिक कुछ रोहिंग्या को बांग्लादेश और पाकिस्तान में कट्टर बनाकर अतिवादी संगठनों से भी जोड़ा गया है और ऐसे में भारत का सतर्क रहना लाजिमी है.
क्या भारत को बांग्लादेश और म्यांमार से संबंधों लेकर संतुलन बनाने में दिक़्क़त हो रही है?
अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में म्यांमार के ख़िलाफ़ कोई प्रस्ताव लाता है तो चीन उसे बचा सकता है. ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों को और ऊर्जा मिलेगी. भारत भी चाहता है कि म्यांमार और चीन के रिश्ते ऐसे न हो जाएं कि उसे दिक्कत होने लगे.
अगर भारत रोहिंग्या के ख़िलाफ़ कोई कड़ा क़दम उठाता है तो बांग्लादेश को अच्छा नहीं लगेगा. ऐसे में भारत के लिए क्या मुश्किल स्थिति बन जाएगी? पूर्व राजनयिक राकेश सूद का कहना है कि ऐसी कोई मुश्किल स्थिति नहीं बनेगी..
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