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ग्राउंड रिपोर्ट: रोहिंग्या संकट पर क्या कह रही है म्यांमार सरकार?
- Author, जोनॉथन हैड
- पदनाम, बीबीसी दक्षिणपूर्व एशिया संवाददाता
म्यांमार के रखाइन प्रांत से भागकर जो लगभग तीन लाख रोहिंग्या लोग बांग्लादेश पहुंचे हैं वो सब उत्तरी ज़िलों मोंगडॉ, बुथीडोंग और राथेडांग से आते हैं.
ये म्यांमार में रोहिंग्या आबादी वाले वो अंतिम इलाक़े है जहां रोहिंग्या राहत कैंपों में नहीं हैं.
इन इलाक़ों तक पहुंचना बहुत मुश्किल है. सड़कें बेहद ख़राब हैं, यहां जाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती है जो पत्रकारों को बहुत मुश्किल से मिलती है.
सरकार ने 18 स्थानीय और विदेशी पत्रकारों को इन इलाक़ों का दौरा कराया और हमने इस मौक़े का यहां पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया.
इसका मतलब ये भी था कि हमने सिर्फ़ उन ही लोगों और इलाक़ों को देखा जिन्हें वो हमें दिखाना चाहते थे. लेकिन कभी कभी ऐसी बंदिशों के बावजूद आप बहुत कुछ देख लेते हैं.
सरकार के अपने तर्क भी हैं जिन्हें सुना जाना चाहिए. म्यांमार की सरकार अब एक सशस्त्र विद्रोह का सामना कर रही है. बहुत से लोगों का ये भी मानना है कि सरकार ही इसके लिए ज़िम्मेदार है.
रखाइन प्रांत में सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास लंबा है और इससे निबटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल काम है.
जब रखाइन की राजधानी सित्तवे पहुंचे तो हमारे लिए निर्देश स्पष्ट थे. किसी को भी समूह से अलग नहीं होना है और स्वतंत्र रूप से काम नहीं करना है.
शाम 6 बजे ही कर्फ़्यू लग गया था. अंधेरे में इधर-उधर जाना मना था. हम जहां जाना चाहते हों उसकी अनुमति मांग सकते थे लेकिन हर बार सुरक्षा के नाम पर अनुमति नहीं मिलती. ईमानदारी से कहूं तो उन्हें हमारी सुरक्षा की चिंता थी.
जलता हुआ गांव
म्यांमार के इस निचले इलाक़े में अधिकतर यात्राएं नदियों और खाड़ियों के मकड़जाल में क्षमता से अधिक भरी नावों से ही होती हैं. सित्तवे से बुथीडोंग तक पहुंचने में छह घंटे लगते हैं. वहां से हम एक टूटी फूटी सड़क के ज़रिए मायू पर्वत से होते हए करीब एक घंडे में मोंगडॉ पहुंचे.
जब हम शहर की ओर बढ़ रहे थे तब हमने पहला जला हुआ गांव देखा. म्यो थी ग्यी गांव में नारियल के पेड़ तक जला दिए गए थे.
हमें यहां लाने का सरकार का उद्देश्य रोहिंग्या संकट पर अपना पक्ष स्पष्ट करना था. बांग्लादेश पहुंचे हो रोहिंग्या लोगों के ज़रिए जो कहानी आ रही है वो म्यांमार की सरकार के लिए बेहद नकारात्मक है. रोहिंग्या शरणार्थियों का कहना है कि सेना और भीड़ उनके गांव जला रही है और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है.
लेकिन पहली नज़र में ही हमें सरकार की कोशिशें नाकाम होती दिखीं.
सबसे पहले हमें मोंगडॉ के एक प्राइमरी स्कूल में ले जाया गया जहां अब विस्थापित हिंदू परिवार रह रहे थे. इन सबके मुताबिक मुसलमानों ने उन पर हमले किए थे और वो डर कर अपने घरों से भागे थे. लेकिन म्यांमार से भागकर बांग्लादेश पहुंचे सभी हिंदुओं का कहना है कि उन पर बौद्धों ने हमले किए थे क्योंकि वो रोहिंग्या जैसे दिखते हैं.
स्कूल के बाहर सशस्त्र सेना और पुलिस का घेरा है. ऐसे हालात में क्या वो खुलकर सच बोल सकते हैं ? एक व्यक्ति मुझे बता ही रहा था कि कैसे सैनिकों ने उनके गांव पर गोलियां चलाईं की तभी एक पड़ोसी ने उसे बीच में रोककर 'सही बात' बताई.
मुसलमानों पर सवाल
नारंगी ब्लाउज़ और भूरे रंग की लुंगी पहने एक महिला मुसलमानों के दुर्व्यवहार को लेकर कुछ ज़्यादा ही गुस्सा लग रही थी.
हमें एक बौद्ध मंदिर ले जाया गया जहां एक बौद्ध भिक्षु ने हमें बताया कि मुसलमानों ने अपने घर अपने आप जलाए हैं. सबूत के तौर पर हमें तस्वीरें दी गईं. ये अजीब लग हीं थीं.
हाजी टोपी पहने आदमी छप्पर जलाते दिख रहे थे. महिलाएं नाटकीय अंदाज़ में तलवार चला रहीं थीं. बाद में मैंने पता लगाया कि तस्वीरों में मुसलमान बनकर दिख रही एक महिला वही थी जो स्कूल के कैंप में मुसलमानों के व्यवहार को लेकर कुछ ज़्यादा ही गुस्से में थी. तस्वीरों में जो आदमी दिख रहे थे वो भी हमें हिंदुओं के कैंप में दिखे थे.
हमें ये फ़र्ज़ी तस्वीरें ये साबित करने के लिए दिखाई गईं थी कि मुसलमान ही अपने गांवों को आग लगा रहे हैं.
हमने सीमा सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार स्थानीय मंत्री कर्नल फोन टिंट से भी बात की. उन्होंने बताया कि किस तरह 'बंगाली आंतकवादियों' ने रोहिंग्या गांवों को अपने कब्ज़े में ले लिया है.
वे अराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी (एआरएसए) के सदस्यों को 'बंगाली आतंकवादी' ही कहते हैं.
कर्लन फोन टिंट ने दावा किया कि एआरएसए ने रोहिंग्या गांवों में लोगों से हर परिवार को एक सदस्य देने के लिए मजबूर किया और जिन्होंने मना किया उनके घर जला दिए गए.
सेना का अत्याचार?
उन्होंने एआरएसए पर बारूदी सुरंगे बिछाने और तीन पुलों को उड़ा देने के आरोप भी लगाए.
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या सभी गांवों को एआरएसए ने आग लगाई है तो उन्होंने कहा कि सरकार का ऐसा ही मानना है. जब उनसे सेना की ओर से किए जा रहे अत्याचार पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि क्या इसका कोई सबूत है?
उन्होंने कहा, "उन रोहिंग्या औरतों को देखो, जो शोषण का दावा कर रही हैं, क्या कोई भी उनका बलात्कार करना चाहेगा?"
हमने जिन गिनेचुने मुसलमानों को मोंगडॉ में देखा वो इतने डरे हुए थे कि कैमरा के सामने उन्होंने बात नहीं की.
हम पर जो नज़र रख रहे थे किसी तरह उनसे बचकर हमने कुछ मुसलमानों से बात की. उन्होंने बताया कि उन्हें इलाक़ा नहीं छोड़ने दिया जा रहा है और यहां खाने की किल्लत है और बेहद डर का माहौल है.
एक युवा ने बताया कि वो भागकर बांग्लादेश जाना चाहते हैं लेकिन उनके नेताओं ने अधिकारियों के साथ समझौता किया है कि वो यहीं रहेंगे. एक ख़ामोश बाज़ार में मैंने एक युवा से पूछा कि उन्हें किसका डर है तो उसने बताया सरकार का.
मोंगडॉ के बाहर जहां हमें जाना था उसमें सबसे मुख्य था तटीय क़स्बा अलेल थान क्याव. ये वो जगह है जहां एआरएस के लड़ाकों ने 25 अगस्त को हमला किया था.
जब हम वहां जा रहे थे तब रास्ते में कई गांव पड़े जो पूरी तरह वीरान थे. हमें खाली खड़ी नांवों देखी. बकरियां और भैंसे देखीं, बस इंसान नहीं दिखे.
अलेल थान क्याव पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है. यहां एक भी इमारत सलामत नहीं दिखी. यहां तक कि एमएसएफ़ का संचालित क्लिनिक भी ज़मींदोज़ था.
धुंए का गुबार
उत्तर की दिशा में हमें धुएं के चार बड़े गुबार उठते हुए दिखे और स्वचलित हथियारों की गोलियों की आवाज़ें सुनाईं दी. हमें अंदाज़ा लग रहा था कि कुछ और गांवों को आग लगाई जा रही थी.
पुलिस लेफ़्टिनेंट आंग क्याव मोए ने बताया कि उन्हें पहले ही हमले के बारे में चेता दिया गया था. उन्होंने गैर मुसलमान आबादी को सुरक्षा देने के लिए अपनी बैरकों में बुला लिया था.
उन्होंने बताया कि उनके जवानों ने हथियारों, स्वनिर्मित विस्फोटकों और तलवारों से लैस हमलावरों का हमला नाकाम किया. उनके मुताबिक ये हमला तीन घंटों तक चला था.
उनके मुताबिक 17 हमलावर मारे गए थे और एक प्रवासन अधिकारी की मौत हो गई थी.
इस घटना के बाद से ही मुसलमानों ने यहां से पलायन करना शुरू कर दिया था.
लेकिन वो ये नहीं बता सके कि हमले के दो सप्ताह बाद भी यहां के कुछ इलाक़ों से धुआं क्यों उठ रहा है. उन्होंने बेमन से जवाब दिया, हो सकता है कि कुछ मुसलमान रह गए हों और जाने से पहले उन्होंने अपने घरों को आग लगा दी हो. और जब हम अलेल थान क्याव से लौट रहे थे तो कुछ अप्रत्याशित हुआ.
हमने कुछ पेड़ों के पीछे से घना काला धुआं उठते हुए देखा. ये सड़क से दूर कोई और गांव था. आग बस अभी शुरू ही हुई थी. हम सबने चिल्लाकर अपने साथ चल रही पुलिस गाड़ी से रुकने के लिए कहा. जब उन्होंने गाड़ी रोकी तो हम सभी भागे, हम पर नज़र रख रहे सरकारी अधिकारी चकित रह गए. पुलिस हमारे पीछे आई और कहा कि गांव में जाना सुरक्षित नहीं होगा. हम पुलिस से आगे आगे चले.
अत्याचार में पुलिस शामिल?
चारों से आग लगाए जाने की आवाज़ आ रही थी. मिट्टी भरे रास्ते पर मुसलमान महिलाओं के कपड़े बिखरे पड़े थे. युवा गठीले नौजवान थे, जिनके हाथों में तलवारें थीं. वो अपनी और दौड़ रहे 18 पत्रकारों को देखकर चकित थे और कैमरे के सामने नहीं आना चाहते थे. उनमें से दो गांव के भीतर गए और अपने बाक़ी साथियों को बाहर लाए और तेज़ी से वहां से भागे.
उन्होंने बताया कि वो रखाइन बौद्ध हैं. मेरे एक साथी ने किसी तरह जल्दी से उनसे बात की. उन्होंने बताया कि पुलिस की मदद से उन्होंने ही घरों को आग लगाई है.
जब हम गांव में गए तो हमने देखा कि मदरसे की छत को कुछ देर पहले ही आग लगाई गई है. अरबी में लिखी पुस्तकें बाहर बिखरी पड़ी थीं. रास्ते में एक खाली जग पड़ा था जिसमें से पेट्रोल टपक रहा था.
ये मुसलमानों का गांव गावडू थार या था. यहां रहने वालों को कोई निशान बाकी नहीं थे. रखाइन के जिन लोगों ने गांव को आग लगाई थी वो बाहर जा रहे थे, पुलिस के सामने से, उनके हाथों में लूट का सामान था.
ये गांव बड़ी पुलिस बैरकों के पास था. लेकिन किसी ने इसे जलाए जाने से रोकने की कोई कोशिश नहीं की.