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सिंहासन चाहनेवाली शशिकला का सियासी पटाक्षेप?
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की बैठक में मंगलवार को वीके शशिकला को पार्टी के महासचिव पद से हटा दिया गया.
पार्टी सुप्रीमो जे. जयललिता के निधन के बाद दिसंबर 2016 में उन्हें पार्टी महासचिव बनाया गया था.
पार्टी के आईटी विंग के संयुक्त सचिव हरि प्रभाकरन ने ट्वीट किया है, "शशिकला और दिनाकरन को पार्टी के सभी पदों से हटा दिया गया है."
पार्टी की आम परिषद की बैठक में यह फ़ैसला लिया गया. बैठक में दिवंगत जयललिता को ही पार्टी के प्रमुख पद पर बनाए रखने का फ़ैसला लिया गया. उपमहासचिव के पद से शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन को भी पद से हटा दिया गया है.
अब पार्टी की कमान वे पदाधिकारी संभालेंगे जिन्हें जयललिता ने बहाल किया था. मुख्यमंत्री के. पलानीसामी और उपमुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम सहित पार्टी के अन्य लोग बैठक में मौजूद थे.
फ़ैसले से नाराज़ दिनाकरन
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार टीटीवी दिनाकरन ने कहा है कि पार्टी को मद्रास हाई कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए था.
उन्होंने कहा, ''मद्रास हाई कोर्ट के एक आदेश के अनुसार बैठक में लिए गए फ़ैसले इस विषय पर दायर की गई एक अपील के नतीजे पर निर्भर करेंगे और उसके बाद ही पता चलेगा कि शशिकला को पद से हटाया जाना 'सही' है या नहीं.''
इससे पहले इस विषय पर एक जज ने पार्टी की आम परिषद की बैठक पर रोक लगाने की गुज़ारिश को ख़ारिज करने के आदेश दिए थे. इसके ख़िलाफ़ दिनाकरन का समर्थन करने वाले एक विधायक की अपील की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सोमवार रात बैठक करने की अनुमति दी और सुनवाई की अगली तारीख, 23 अक्तूबर को तय कर दी.
दिनाकरन ने बैठक के फ़ैसले के बारे में कहा, "हमें इस मामले को बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए."
उन्होंने कहा कि यही वो आम परिषद थी जिसने बीते साल शशिकला को अंतरिम महासचिव बनाया था.
कैसा रहा शशिकला का सफ़र
राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी शशिकला के नज़दीक आती दिख रही थी. लेकिन पनीरसेल्वम की बग़ावत और अदालत के फ़ैसले से मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर हो गई.
शशिकला 25 साल पहले एक साधारण-सा वीडियो पार्लर चलाती थीं.
वीडियो पार्लर चलाने वाली एक आम महिला कैसे तमिलनाडु की राजनीति में सबसे विवादित शख़्सियत के तौर पर उभरीं- इसके तह में जाना अपने आप में एक दिलचस्प विषय है.
पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के साथ उनकी 25 साल की 'गहरी दोस्ती' एकमात्र वो वजह है जो उन्हें राज्य के सत्तारूढ़ दल में एक मज़बूत हैसियत के साथ खड़ा करती है.
जयललिता के निधन के बाद पैदा हुई अनिश्चितता की स्थिति में ओ पनीरसेल्वम राज्य के मुख्यमंत्री ज़रूर बन गए थे, लेकिन पनीरसेल्वम के नाम को लेकर पार्टी में पूरी तरह से सहमति नहीं थी.
जयललिता से नज़दीकी
ऐसी ही परिस्थितियों में शशिकला के नाम में पार्टी सदस्यों को वे संभावनाएं नज़र आईं कि वो पनीरसेल्वम की जगह ले सकती हैं.
जयललिता के घर-परिवार और उनके राजनीतिक विरासत को संभालने वाली शशिकला ने अपने भाषण में ख़ुद को 'पार्टी की उद्धारक' और अम्मा के सपनों को पूरा करने वाली बताया.
जयललिता और शशिकला की दोस्ती की शुरुआत 1984 में हुई थी. उस वक्त शशिकला एक वीडियो पार्लर चलाती थीं और जयललिता तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामाचंद्रन की प्रोपेगैंडा स्क्रेटरी थीं.
शशिकला के पति नटराजन उस वक्त राज्य के सूचना विभाग में काम कर रहे थे. उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर जयललिता की सभी जनसभाओं के वीडियो शूट का ठेका शशिकला को दिलवाया.
जयललिता को शशिकला का काम पसंद आया और दोनों के बीच रिश्ते गहरे होने शुरू हो गए.
1987 में एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद जब जयललिता मुश्किल दौर से गुजर रही थीं तब शशिकला ने उन्हें सहारा दिया था.
उस वक्त पार्टी में जानकी रामचंद्रन के समर्थकों की ओर से जयललिता का विरोध हो रहा था और उन्हें पार्टी से बाहर निकालने की मांग हो रही थी.
इसके बाद ही शशिकला अपने पति नटराजन के साथ जया के घर उनकी 'मदद' करने के लिए रहने लगीं.
रिश्तों में उतार-चढ़ाव
हालांकि जयललिता और शशिकला के रिश्तों में कई बार उतार-चढ़ाव भी आए. 1991 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शशिकला के रिश्तेदारों पर जयललिता से नज़दीकी का ग़लत फ़ायदा उठाने के भी आरोप लगे, लेकिन शशिकला पर इससे ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ा.
विपक्षी दल शशिकला पर अक्सर यह इल्ज़ाम लगाते रहे हैं कि उनका परिवार ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझता रहा है.
उन्हें और उनके परिवार को राजनीतिक हलकों में 'मन्नारगुडी माफ़िया' कहा जाता रहा है. ऐसा उन्हें उनके जन्मस्थान से जोड़ कर कहा जाता है. उनका जन्म थेवर समुदाय के एक परिवार में हुआ था.
नाराज़ होकर जयललिता ने नटराजन को अपने घर से बाहर निकाल दिया था, लेकिन शशिकला ने तब भी समझदारी दिखाते हुए इस फ़ैसले में जयललिता का साथ दिया था और उनके साथ ही रही थीं.
दोनों के बीच रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि जयललिता ने शशिकला के भतीजे वीएन सुधाकरन को गोद ले रखा था और उनकी भव्य शादी भी करवाई थी. फ़िज़ूलखर्ची को लेकर इस शादी की चर्चा देशभर में हुई थी.
1996 में चुनाव हारने और सत्ता से बाहर होने के बाद भी जयललिता ने शशिकला को पार्टी से हटाने की कैडरों की मांग नहीं मानी थी
पार्टी के कैडरों का कहना था कि शशिकला पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और सत्ता के दुरुपयोग की वजह से पार्टी की छवि ख़राब हो रही है.
इसी साल शशिकला को प्रवर्तन निदेशालय ने फ़ॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया था. लेकिन फिर भी जयललिता ने उनसे दूरी नहीं बनाई.
शशिकला की भूमिका
बाद में उन्होंने शशिकला के गोद लिए भतीजे सुधाकरन और परिवार के कुछ दूसरे सदस्यों को ज़रूर छोड़ दिया.
दो दफ़ा ज़रूर शशिकला को बाहर का रास्ता देखने के नौबत आई, लेकिन दोनों ही बार वो जयललिता के घर में एक विजेता के तौर पर लौटीं. यह दिखाता है कि जयललिता शशिकला पर कितना भरोसा करती थीं.
पार्टी के अंदर के लोगों का कहना है कि टिकट बांटने में शशिकला की अहम भूमिका होती थी. इसलिए पार्टी के वरिष्ठ नेता, मंत्री और विधायक उनके वफ़ादार बने रहते थे.
एआईएडीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने एकबार कहा था, "यहां तक कि पनीरसेल्वम भी जयललिता के नज़दीक शशिकला की मदद से ही पहुंचे थे. इसलिए उन्हें जयललिता और शशिकला दोनों का ही विश्वास हासिल था."
शशिकला इस समय आय से अधिक संपत्ति के मामले में बेंगलुरु की केंद्रीय जेल में सज़ा काट रही हैं.
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