'मुख्य समस्या आधार नहीं, योजनाओं को इससे जोड़ना है'

    • Author, ज्यां द्रेज़
    • पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

केंद्र सरकार यह बात मानने को तैयार नहीं दिखती कि तमाम सरकारी योजनाओं का फ़ायदा उठाने के लिए आधार को ज़रूरी बनाने से लोगों को बहुत परेशानी हो रही है.

जब भी यह मुद्दा उठता है, सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि 'किसी को भी आधार न होने की वजह से फ़ायदों से महरूम नहीं किया जाएगा'.

उनके कहने का मतलब होता है कि अगर किसी के पास आधार नहीं है, तो भी उसे सरकारी योजनाओं का फ़ायदा मिलेगा. हां, इसके बदले में उस नागरिक को आधार में पंजीकरण कराना होगा.

हालांकि आधार का न होना सबसे बड़ी समस्या नहीं है. बड़ी समस्या है आधार नंबर अलग-अलग योजनाओं के डेटाबेस में दर्ज कराना और फिर उसे बायोमेट्रिक तकनीक लेकर प्रमाणित कराना. जिनके पास आधार नंबर हैं, वो भी इस चुनौती से जूझ रहे हैं.

लोगों के आधार नंबर को मौजूदा डेटाबेस में दर्ज कराने को सीडिंग (Seeding) कहा जाता है. मिसाल के तौर पर पेंशन की सूची में पेंशनरों के नाम के साथ उनके आधार नंबर दर्ज कराए जाने हैं. या फिर राशन कार्ड के साथ लोगों के आधार नंबर दर्ज होने हैं. ये बेहद मुश्किल और लंबी प्रक्रिया है.

बहुत लंबी है प्रक्रिया

अब जैसे राशन कार्ड और आधार को जोड़ने का मसला ही लीजिए. यह काम कई साल पहले शुरू हुआ था और अब तक पूरा नहीं हो सका है.

इसमें तीन स्तर पर काम होता है. पहले तो राशन कार्ड के मालिकों से उनके आधार नंबर लिए जाते हैं.

कई बार सरकारी कर्मचारी लोगों के घर-घर जाकर ये काम करते हैं. या फिर वे राशन के दुकानदार से लोगों के नाम और जानकारी लेते हैं. इसके बाद पीडीएस के डेटाबेस में आधार नंबर दर्ज किए जाते हैं. फिर इनका वेरिफ़िकेशन भी ज़रूरी होता है ताकि किसी भी गड़बड़ी को दूर किया जा सके.

पूरी प्रक्रिया में बहुत वक़्त लगता है और ये बहुत पेचीदा भी है. जब भी सरकार किसी नई योजना के लिए आधार को ज़रूरी बनाती है, तो हर बार यही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है.

यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से लाखों सरकारी कर्मचारी, जैसे पंचायत सेवक, रोज़गार सेवक, अध्यापक और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आधार को दूसरे सरकारी दस्तावेज़ों से जोड़ने का काम कर रहे हैं.

आधार वेरिफ़िकेशन भी चुनौती

आधार के वेरिफ़िकेशन की प्रक्रिया पूरी करना बहुत बड़ी चुनौती है. इसमें कई बार आंकड़े दर्ज करने में गड़बड़ी होने का अंदेशा रहता है.

कई बार ग़लत जानकारी दर्ज हो जाती है. कई बार आधार की जानकारी, उस डेटाबेस से अलग होती है, जिसके साथ आधार नंबर जोड़ा जा रहा होता है.

मसलन, किसी का नाम राशन कार्ड में अलग और आधार कार्ड में अलग होता है. या फिर कोई पेंशनर जिसकी उम्र साठ साल से ज़्यादा है, आधार कार्ड में उसकी उम्र साठ साल से कम दर्ज होती है.

ये गड़बड़ियां दूर करना बहुत बड़ी चुनौती है. पैन कार्ड और आधार को जोड़ने के दौरान यह बात बार-बार सामने आई है. यहां ये याद रखने वाली बात है कि पैन कार्ड रखने वाले लोग आमतौर पर ज़्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. ऐसे बहुत से लोगों के पास यह काम ऑनलाइन करने की सुविधा भी होती है. वहीं ग्रामीण इलाक़ों में या फिर मनरेगा के तहत काम करने वाले नरेगा मज़दूरों के पास ऐसी सुविधाओं की भारी कमी होती है.

डेटाबेस बढ़ते ही दिक्कत बढ़ जाती है

यह प्रक्रिया तब और पेचीदा हो जाती है, जब आपको दो के बजाय तीन डेटाबेस से जूझना पड़ता है. जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को ही लीजिए. इसके तहत अब मज़दूरों को पैसे पाने के लिए आधार नंबर बताना ज़रूरी है.

आधार को जॉब कार्ड से जोड़ा जाता है. फिर इसे लोगों के बैंक खातों से जोड़ा जाता है. अब अगर किसी का नाम तीनों जगह एक नहीं है, तो भुगतान में बहुत दिक़्क़तें हो सकती हैं.

लब्बो-लुबाब ये कि आधार को दूसरे दस्तावेज़ों से जोड़ना बहुत बड़ा सिरदर्द बन गया है. जिनका ये काम सही तरीके से पूरा नहीं हुआ है, उन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित रहना पड़ सकता है.

जबकि भारत का नागरिक होने के चलते वो ये सरकारी फ़ायदे लेने के हक़दार हैं. उदाहरण के तौर पर, इसकी वजह ये बहुत लोग वृद्धावस्था पेंशन के फ़ायदों से महरूम हो गए हैं.

बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन में भी दिक्कत

आधार से जुड़ी दूसरी चुनौती है आधार पर आधारित बायोमेट्रिक ऑथेंटिफ़िकेशन या प्रमाणन (ABBA). फिलहाल तो इसे सभी मामलों से नहीं जोड़ा गया है, लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने इस वेरिफ़िकेशन को सरकारी राशन हासिल करने से जोड़ दिया है.

या फिर कई सरकारी दफ़्तरों में इसकी बुनियाद पर हाज़िरी लगाई जाती है. हालांकि आधार की तरफ़दारी करने वाले ये चाहते हैं कि ABBA को हर चीज़ से जोड़ दिया जाए.

इस मामले में आधार के सही आंकड़ों को दूसरे दस्तावेज़ों से जोड़ना तो महज़ पहली चुनौती है. सबसे ज़रूरी है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल हो रही है, वह सही तरीक़े से काम करे. यानी नेटवर्क अच्छा हो, मोबाइल ढंग से काम करें. सर्वर और पीओएस (Point Of Sale) मशीनें ठीक से काम करें.

फिंगरप्रिट के पहचान की गारंटी नहीं

अब तकनीक भी ठीक से काम कर रही है तो यह ज़रूरी नहीं कि मशीन आपके फिंगरप्रिंट पहचान ही ले. अक्सर बुजुर्गों को और मज़दूरी करने वालों को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है. उनके फिंगरप्रिंट वेरिफ़िकेशन कई बार काम नहीं करते.

अगर आपके पास मोबाइल फ़ोन है और वो सही-सही डेटाबेस में दर्ज किया गया है, तब तो आप बिना बायोमेट्रिक वेरिफ़िकेशन के अपना काम चला सकते हैं. इसके बावजूद, अक्सर सिस्टम फ़ेल हो जाता है.

यही वजह है कि राजस्थान और झारखंड में लाखों लोग सरकारी राशन से वंचित हो गए हैं. क्योंकि इन राज्यों में राशन हासिल करने के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक वेरिफ़िकेशन ज़रूरी है.

इस क्षेत्र में काम करने वालों को इन दिक़्क़तों का बख़ूबी एहसास है. तमाम रिसर्चर और पत्रकार ही नहीं, सरकारी अफ़सर भी इन परेशानियों से वाक़िफ़ हैं. लेकिन सरकार इन चुनौतियों को मानने से ही इंकार करती आई है. वो प्रचार का सहारा लेकर आधार से जुड़ी परेशानियां छुपाती रहती है.

सामाजिक योजनाओं के ज़रूरतमंद आधार की वजह से बेहद परेशान हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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