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ब्लॉग: कैसे मिली औरतों को जंग लड़ने की इजाज़त?
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"भारतीय औरतों को देश की तरफ़ से युद्ध में कब लड़ने दिया जाएगा?"
निर्मला सीतारमण को भारत का रक्षा मंत्री बनाए जाने पर सवालों की बौछार हुई तो यह सवाल मीडिया की सुर्ख़ियों में छाया रहा.
मुझे हैरानी नहीं हुई. जब धारणा ये हो कि औरतों का उत्थान हर औरत की ही ज़िम्मेदारी है, तो ये हंगामा तो लाज़िमी था.
पर यहां ये जानना ज़रूरी है कि दुनिया के जिन दर्जन भर देशों में औरतों को योद्धा बनने की इजाज़त है, वहां उन्हें ये मौका दिलाने के लिए कोई औरत ही ज़िम्मेदार हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है.
पूरी दुनिया में रही है झिझक
इतिहास में झांकें तो औरतों को युद्ध में हिस्सा देने को लेकर दुनियाभर में झिझक रही है.
दूसरे विश्व युद्ध में योद्धाओं की कमी की वजह से कई देशों ने औरतों को सेनाओं में शामिल तो किया पर सिर्फ़ सोवियत संघ ने उन्हें युद्ध करने भेजा.
हालांकि विघटन के बाद के रूस में औरतों को युद्ध में लड़ने की इजाज़त नहीं है.
कैसे आया बदलाव?
दुनियाभर में 1980 के दशक तक औरतें प्रशासनिक और सहायक भूमिकाओं में रहीं.
बड़ा बदलाव 21सवीं सदी की शुरुआत में आया जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति में औरतों की समान भूमिका पर प्रस्ताव पारित किया.
ये वही व़क्त था जब अमरीका के न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 को आतंकी हमला हुआ जिसके बाद अमरीका और ब्रिटेन ने अफ़गानिस्तान और इराक़ में सेना भेजी.
इन सेनाओं में औरतों की ख़ास टुकड़ियां थीं जिन्हें 'फ़ीमेल एंगेजमेंट टीम' कहा जाता था.
अमरीका और ब्रिटेन में औपचारिक रूप से औरतों को युद्ध में शामिल होने की इजाज़त नहीं थी. पर जंग की ज़रूरतें ऐसी थीं कि उनकी टीमें शामिल भी हुईं और क़रीब 150 औरतों की युद्ध में जान भी गई.
अमरीका में ये औपचारिक इजाज़त 2013 में दी गई.
इसकी घोषणा करते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री लिऑन पनेटा ने इसे लागू करने के लिए औरतों के लिए ख़ास प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाने की बात कही.
पर ब्रिटेन में औरतों को युद्ध में लड़ने की इजाज़त के लिए अभी तीन साल और इंतज़ार करना था.
आखिर पिछले साल प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक कर ये कहा कि ये रोक अब हटा दी जाएगी.
इस फ़ैसले तक पहुंचने के लिए ब्रिटेन ने उन देशों का सर्वे किया जहां औरतों को 'क्लोज़ कॉम्बैट' यानी 'ज़मीनी युद्ध' में शामिल होने की इजाज़त है.
सर्वे मुश्किल था क्योंकि अलग-अलग देशों ने औरतों को अलग तरीकों से शामिल किया है. कहीं उनकी अलग टुकड़ियां है और कहीं वो मर्दों के साथ एक ही बटालियन में हैं.
सर्वे में पाया गया कि अफ़गानिस्तान की जंग ने सिर्फ़ अमरीका और ब्रिटेन की औरतों के लिए ही दरवाज़े नहीं खोले, बल्कि गठबंधन देशों, कनाडा, जर्मनी, पोलैंड, स्वीडन और ऑस्ट्रेलिया ने भी तब पहली बार औरतों को युद्ध में भेजा.
इनमें से कई देशों में औरतों को युद्ध में शामिल होने की औपचारिक इजाज़त उनके युद्ध में हिस्सा लेने के बाद ही दी गई.
मसलन ऑस्ट्रेलिया में ये रक्षा मंत्री स्टीफ़न स्मिथ ने सेना में कुछ 'यौन शोषण के मामले' सामने आने के बाद साल 2011 में किया.
उदारवादी सोच ज़रूरी
जंग के अलावा जंग की नीयत रखनेवाले देशों का रवैया भी सेना में औरतों को शामिल करने को लेकर उदारवादी रहा है.
छोटे देश होने के बावजूद बड़ी सेनाएं रखने वाले इसराइल और उत्तर कोरिया में भी औरतों को युद्ध में शामिल होने की इजाज़त है.
फिर कुछ से देश हैं, जहां युद्ध में औरतों को हिस्सेदारी देने की असल वजह उदारवादी सोच है. दुनिया में मर्द और औरतों की बराबरी के मामले में सबसे आगे आनेवाले स्कैनडिनेवियन देश, नॉर्वे, फ़िनलैंड और स्वीडन में ये इजाज़त है.
हालांकि दुनिया की सबसे बड़ी सेना रखनेवाले चीन ने अब तक औरतों पर ये रोक बरक़रार रखी है.
भारत में कब मिलेगा मौका?
दूसरे नंबर पर अमरीका के बाद दुनिया की तीसरी बड़ी सेना रखने वाले भारत में औरतों की सेना में नियुक्ति अब तक स्वास्थ्य संबंधी कामों तक सीमित रही है.
जून में सेना प्रमुख बिपिन रावत ने औरतों को योद्धा के काम में मौका देने की नीयत जताई थी.
समाचार में उन्होंने कहा था कि इसके लिए महिलाओं को हिम्मत और ताकत दिखानी होगी.
पर विश्व का अनुभव तो यही सुझाता है कि इस हक़ के लिए रास्ते का रोड़ा औरतों की 'हिम्मत और ताकत' नहीं बल्कि देश की नीति, ज़रूरत और नीयत है.
इतिहास ये भी बताता है कि ज़्यादातर देशों के लिए ये नीयत सिर्फ़ तब नहीं बदली जब औरत सिपहसालार थी.
तो निर्मला सीतारामण से उम्मीद कितनी लाज़िमी है इस पर सोचना होगा. और वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफा के मुताबिक अगर ये उम्मीद पूरी भी होती है तो इसके पीछे मर्दों का हाथ होने की पूरी गुंजाइश है.
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