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नज़रिया: अनलिमिटेड नहीं है आपकी निजता का अधिकार
- Author, प्रशांत भूषण
- पदनाम, सुप्रीम कोर्ट के वकील
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने स्पष्ट किया है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और संविधान के तहत दिए गए राइट टु लाइफ़ ऐंड लिबर्टी में निहित है.
जीने के अधिकार का मतलब यह है कि सम्मान के साथ जिएं. यह तभी हो सकता है जब निजता हो. इसलिए किसी को भी आपकी निजता का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है.
इसी तरह से सरकार के लिए आपकी जिन जानकारियों का पता होना ज़रूरी न हो, वह उन जानकारियों को नहीं ले सकती. उदाहरण के लिए उसे इससे कोई मतलब नहीं है आप क्या खाते हैं, कहां जाते हैं, क्या खरीददते हैं या आपका सेक्शुअल ओरियंटेशन क्या है.
निजता का अधिकार ज़रूरी है क्योंकि कई बार लोग बहुत से ऐसे काम करते हैं, जो कानूनी तो होते है मगर एक तरह का भय होता है. बहुत से लोग यह नहीं बताना चाहते कि वे क्या खाते हैं या किसके साथ रहते हैं. कई बार ये काम बहुमत की राय में सही नहीं होते. इसलिए निजता ज़रूरी होती है ताकि वे आज़ादी से रह सकें.
'आज निजता खतरे में है'
जॉर्ज ऑर्वल ने एक उपन्यास लिखा था जिसमें सर्विलांस स्टेट का ज़िक्र था. इसमें एक पोस्टर पर लिखा था- बिग ब्रदर इज़ वॉचिंग यू. आज वैसी ही स्थिति होती जा रही है. अमरीकी नागरिक स्नोडन ने भी दावा किया था कि अमरीका अपने और दुनिया भर के लोगों की जानकारियां जुटा रहा है.
यह सही है कि आपके पास मोबाइल है तो कंपनी को पता है कि आप कहां हैं. ऐप यूज़ करने पर भी आपकी कई जानकारियां चली जाती हैं. किसी भी ऐप को इस्तेमाल करने से पहले वह पूछता है कि आप इसे तभी इस्तेमाल कर सकते हैं जब आप कुछ जानकारियों का ऐक्सेस उसे दें.
ज़्यादातर लोग इसके लिए हां कह देते हैं. इनमें कुछ ऐसी जानकारियां ऐसी भी होती हैं जिनका ऐप से संबंध नहीं होता. मगर आपको वे क्या बेचें, इसके लिए उन्हें यह डाटा चाहिए होता है.
'सरकार नहीं कर सकती कोई बदलाव'
निजता संवैधानिक अधिकार है तो इसमें सरकार कोई कानून लाकर बदलाव नहीं कर सकती. मगर कोई भी मौलिक अधिकार अनलिमिटेड नहीं होता. जैसे कि आपको स्वतंत्रता का अधिकार है. मगर अपराध करेंगे तो पीनल कोड के तहत आपका वह अधिकार प्रतिबंधित हो जाता है.
आपको बोलने की आज़ादी है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप भड़काऊ भाषण दें. आप किसी का चरित्र हनन भी नहीं कर सकते. इसी तरह से कानून के ज़रिये उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं मगर यह देखा जाएगा कि पाबंदियां तर्कसंगत हैं या नहीं.
सरकार के लिए कुछ जानकारियां बेहद जरूरी होती हैं. जैसे कि इनकम टैक्स रिटर्न या फिर सोशल वेलफेयर योजनाओं के बारे में उसे पता होना चाहिए.
'पहचान स्थापित करना ज़रूरी है'
आप यह नहीं कह सकते कि आप अपन उंगलियों के निशान नहीं दे सकते. जिस तरह के आपके पहचान पत्र में, लाइसेंस में या अन्य चीज़ों में आपकी तस्वीर होती है, उसी तरह से आपका फ़िंगरप्रिंट लेने से आपके निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता.
अगर आपको इससे आपत्ति है तो फिर तो आप चेहरा भी मत दिखाओ, फोटो भी न लो. यह निजता का अधिकार नहीं है कि आपकी पहचान भी स्थापित न की जा सके.
कौन कितना टैक्स दे रहा है, सोशल वेलफेयर स्कीम का फायदा कौन उठा रहा है, इसमें पारदर्शिता होना चाहिए. मगर हमारे बैंक में क्या है, हम कहां पैसा खर्च कर रहे हैं, इस पर पारदर्शिता की ज़रूरत नहीं है. मगर हां, कोई लोन लेकर डिफॉल्ट करता है या अन्य तरह का डिफॉल्टर है तो उसके लिए प्रिवेसी का मतलब नहीं है.
आधार पर किस तरह पड़ेगा असर?
आधार कार्ड की बात करें तो आज की स्थिति में आधार कार्ड बनवाना जरूरी नहीं है अगर आप टैक्स नहीं देते या सोशल वेलफेयर स्कीम्स का फायदा नहीं उठाते. अभी टेक्नॉलजी ऐसी नहीं है कि 100 करोड़ लोगों के डेटा बेस से किसी की पहचान बायोमीट्रिक के ज़रिए की जा सके. कई उदाहरण ऐसे हैं जिनमें ऐसी दिक्कत नहीं है. इसीलिए इसे ज़रूरी नहीं बनाया गया है.
आधार को सोशल वेलफ़ेयर स्कीम्स और इनकम टैक्स में ही जरूरी किया गया है. मगर अब सुना गया है कि बैंक और मोबाइल कंपनियां तक आधार मांग रही हैं. यह कानूनी नहीं है. आपकी पहचान को वे अन्य पहचान-पत्रों से स्थापित कर सकती हैं. इसे चैलेंज किया जा सकता है और हो सकता है कि कोर्ट इसे स्ट्राइक डाउन कर दे.
'अब 377 का कोई प्रभाव नहीं रहा'
अदालत के इस फ़ैसले से बहुत कुछ चीज़ें साफ़ हुई हैं. जैसे कि यह लिखा गया है कि आपका सेक्शुअल ओरियंटेशन आपके निजता के अधिकार में निहित है यानी किससे आपके शारीरिक संबंध हैं.
इस फ़ैसले से सेक्शन 377 अब ग़ैरकानूनी नहीं रहा. एलजीबीटी समुदाय के लिए यह फ़ैसला अच्छा है. सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया था कि यह कानून असंवैधानिक नहीं है, उसे इस फ़ैसले ने रद कर दिया है.
(सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण से बीबीसी हिंदी रेडियो के संपादक राजेश जोशी की बातचीत पर आधारित.)
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