एक दूसरे पर जान छिड़कने वाले ये भारत-पाकिस्तान

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- Author, दलीप सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
70 साल पहले आधी रात को हिन्दुस्तान को अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी तो मिली, मगर बंटवारे की कलम ने इसके दो हिस्से भी कर दिए. अगली सुबह सूरज दो मुल्कों में उदय हुआ- भारत और पाकिस्तान.
आज इन दोनों देशों के रिश्ते कैसे हैं, पूरी दुनिया जानती है. मगर हम आपको ऐसे भारत और पाकिस्तान से मिलाने जा रहे हैं जो एक दूसरे पर जान छिड़कते हैं. हालात ख़राब हों तो पाकिस्तान आगे बढ़कर भारत की रक्षा भी करता है.
पंजाब के ज़िला मुक्तसर के मलोट में रहते हैं भारत और पाकिस्तान नाम के दो भाई. भारत सिंह की उम्र 12 साल है और पाकिस्तान सिंह की 11 साल. दोनों बच्चों का यह नाम उनके पिता गुरमीत सिंह ने रखा है.
भारत सिंह उम्र में बड़ा है और उसके नाम को लेकर कभी किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ. मगर साल 2007 में जब गुरमीत के घर दूसरा बेटा पैदा हुआ तो उन्होंने उसका नाम पाकिस्तान रख दिया.
नए मेहमान के आने की ख़ुशी तो थी, मगर नाम पाकिस्तान रखे जाने से घर वाले मायूस थे.

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गुरमीत सिंह कहते है कि छोटे बेटे के नाम को लेकर रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने आपत्ति जताई थी पर मेरा इरादा नहीं बदला.
गुरमीत स्कूल में भी छोटे बेटे का नाम पाकिस्तान सिंह लिखवाना चाहते थे लेकिन स्कूल प्रशासन ने नाम बदलने की शर्त पर ही दाखिला दिया. दस्तावेज़ों में पाकिस्तान सिंह का नाम करनदीप सिंह लिखवाया गया है.
दुकान का नाम भी 'भारत-पाकिस्तान' पर
कुछ साल पहले ही नेशनल हाइवे-10 पर गुरमीत सिंह ने दुकान खोली. दुकान का भी नाम बेटों के नाम पर रखा- 'भारत-पाकिस्तान वुड वर्क्स.'
गुरमीत के मुताबिक ऐसा नाम पढ़कर लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं और डराते भी हैं. नाम बदलने के लिए कहा जाता है पर वह नहीं मानते हैं.

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गुरमीत कहते हैं कि कुछ स्थानीय नेताओं ने उनके ऊपर बोर्ड उतारने के लिए दबाव भी बनाया. उनसे कहा गया कि भारत सिंह तो ठीक है पर पाकिस्तान सिंह बदलो.
हालांकि उनके इस कदम की तारीफ़ करने वालों की भी कमी नहीं है. गुरमीत का कहना है कि हाइवे पर दुकान होने की वजह से कई लोग उत्सुकता में गाड़ियां रोककर दुकान का नाम ऐसा रखे जाने का कारण पूछने भी आते हैं.
भारत को बचाता है पाकिस्तान
बीबीसी ने दोनों भाइयों से भी बात की. पाकिस्तान सिंह ने बताया कि स्कूल में तो मेरा नाम करनदीप सिंह है मगर मेरे कई सहपाठी मुझे पाकिस्तान सिंह कहकर बुलाते हैं.
वह कहते हैं कि कोई पाकिस्तान सिंह कहकर बुलाता है तो बुरा भी नहीं लगता है. यह नाम किसने रखा, यह पूछने पर पाकिस्तान सिंह ने कहा कि मेरे पापा ने.

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बातचीत में पाकिस्तान ने बताया कि जब मां भारत सिंह की पिटाई करती है या बाहर कोई उसे मारता है तो मैं ही बचाता हूं.
भारत सिंह और पाकिस्तान सिंह मिलकर ख़ूब शरारत करते हैं. दोनों कभी-कभी लड़ाई भी करते हैं पर जल्दी ही सुलह भी हो जाती है. दोनों को अंग्रेज़ी पढ़ना पसंद हैं.
'हमें तो 70 साल हो गए भटकते हुए'
गुरमीत सिंह बताते कि उनके बुज़ुर्ग बंटवारे के वक़्त पाकिस्तान से भारत आए थे. कुछ हरियाणा के करनाल में रहने के बाद हरियाणा के ही हांसी में बस गए मगर उनके परिवार को हांसी से भी पलायन करना पड़ा.
साल 1984 में सिख विरोधी दंगों के बाद रातों-रात पूरा परिवार पंजाब के मलोट भाग आया. तब गुरमीत तकरीबन 11-12 साल के थे.
गुरमीत ने याद करते हुए कहा, '1984 में जब मैं बच्चा था तो मुझे सिख आतंकवादी कहकर पुकारा गया. तब मुझे उसका मतलब समझ में नहीं आया था.'
गुरमीत के बुज़ुर्ग पाकिस्तान के शेखुपुरा में रत्ती टिब्बी गांव में रहते थे. पाकिस्तान से पलायन करके भारत आए लोगों को पंजाब में अब भी लोग रिफ़्यूजी कहते हैं.
गुरमीत कहते हैं, 'सच कहूं तो लोगों ने पूरी तरह से नहीं अपनाया. हमारे बुज़ुर्ग पाकिस्तान में सबकुछ छोड़कर भारत आए. फिर हम हरियाणा में सबकुछ छोड़कर पंजाब आ गए. हमें 70 साल हो गए भटकते हुए.'
गांव देखने की इच्छा दिल में लिए ही मर गए
गुरमीत ने पिछले साल अपने दोस्तों के साथ पाकिस्तान जाने का मन बनाया था. वह ऐतिहासिक गुरुद्वारों को देखने जाना चाहते थे मगर उनका कहना है कि नोटबंदी की वजह से सारा प्लान चौपट हो गया.

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बंटवारे की कहानियां सुनकर गुरमीत विचलित हो जाया करते थे. उनका कहना है कि हमारे बुज़ुर्ग पाकिस्तान में अपना गांव देखने को भी तरस गए. वे यह इच्छा दिल में लिए ही दुनिया से चले गए.
दोनों मुल्कों में तनाव को लेकर किए गए सवाल पर वह कहते हैं, 'नेताओं के हिसाब से जंग सही है, मरता तो आम नागरिक है जी. दोनों तरफ़. सरहद पर तैनात फ़ौजी भी ग़रीब परिवारों से आते हैं.'
गुरमीत कहते हैं कि दोनों देश प्यार से रहें, इसलिए शांति का संदेश देने के लिए उन्होनें बेटों का नाम भारत सिंह और पाकिस्तान सिंह रखा है.
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