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नज़रिया: मायावती छिनता हुआ वोट बैंक कैसे बचाएंगी?
- Author, शरद गुप्ता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती अपने जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही हैं.
लोकसभा में उनका एक भी सांसद नहीं है, राज्यसभा में सिर्फ पांच सदस्य हैं और 403 विधायकों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में महज 19 विधायक हैं. वह राज्यसभा से इस्तीफ़ा दे चुकी हैं, लेकिन जिस बात ने उनकी परेशानी सबसे ज़्यादा बढ़ाई है, वह है उनके पूर्व सहयोगियो का इकट्ठा होकर वोट बैंक को छीनने की कोशिश.
रविवार को बसपा के कई पूर्व नेता दिल्ली में इकट्ठा हुए और उन्होंने मायावती से नाराज़ कई उन नेताओं को जोड़ने की कोशिश की जो अभी भी बसपा में है. एक नेशनल बहुजन एलायंस बनाया गया जिसमें दलितों मुसलमानों और पिछड़ों के 16 संगठन एक साथ आए. इन संगठनों के मुखिया कभी न कभी बसपा में रहे और उन्हें मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था.
इस मुहिम के मुखिया बसपा के पूर्व मंत्री और राष्ट्रीय महासचिव रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी थे. उन्होंने बसपा के पूर्व सांसद प्रमोद कुरील को इस एलायंस का मुखिया बनाया और दावा किया जल्द ही इसमें बसपा के कई प्रमुख नेता जुड़ने वाले हैं और ये सब मिलकर मायावती के दलित वोट बैंक को उनसे छीन लेंगे.
लेकिन क्या मायावती इतनी आसानी से यह होने देंगी? क्या मायावती का वोट बैंक छीनना कोई बच्चों का खेल है? क्या मायावती का वोट बैंक उनसे नाराज है? और आखिर राज्यसभा से उनके इस्तीफा देने का क्या राज़ है?
मूल वोट बैंक बचाने में कामयाब रहीं मायावती
दरअसल, मायावती एक राजनीतिक योद्धा हैं. 1984 से राजनीति में हैं. 1989 में लोकसभा का चुनाव जीतीं. 1995 में मुलायम सिंह की सरकार गिराकर भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं. उसके बाद से वे तीन बार और मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 2007 में अपने दम पर उत्तर प्रदेश में बहुमत जुटाकर मुख्यमंत्री बनना था.
लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट जीत नहीं पाई. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 403 में से केवल 19 सीटें जीतने से कयास लगने लगे कि अब मायावती का जादू ख़त्म हो गया है. उनकी राजनीति में आई गिरावट अब एक स्थाई रूप धारण कर चुकी है.
यह समझने वाले राजनीतिक पंडितों ने संभवतः एक महत्वपूर्ण बात नजरअंदाज कर दी. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 80 में से 73 सीटें आकर प्रचंड बहुमत भले ही पाया हो लेकिन बसपा ने अपना आधार वोट बैंक बचा लिया था. उत्तर प्रदेश में लगभग 20 फ़ीसदी दलित 19 फ़ीसदी मुसलमान और 27.5 फीसदी पिछड़ी जातियां हैं. बसपा को भले ही एक भी लोकसभा सीट नहीं मिल पाई हो लेकिन लगभग 20 फ़ीसदी वोट पाने में वह कामयाब रही.
1990-91 के बाद से ही बसपा ने अपने वोट बैंक में धीरे-धीरे इज़ाफ़ा किया और 1993 के बाद से लगातार 65-70 विधानसभा सीटें जीतने में वह कामयाब होती रहीं. 1995, 1996 और 2002 में मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. तभी उनको एहसास हुआ कि उन्हें अपना वोट बैंक दलित और मुसलमानों से इतर भी बढ़ाना पड़ेगा. तब उन्होंने सर्वजन समाज की बात की और सवर्णों को अपनी पार्टी में न सिर्फ शामिल किया बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण स्थान भी दिए.
नतीजा 2007 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब बसपा को 40.43 प्रतिशत वोट मिले. उसने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत पाया. मायावती सरकार ने अपना 5 साल का कार्यकाल भले ही पूरा कर लिया हो, लेकिन उपलब्धियों के नाम पर पूरे प्रदेश में सिर्फ आंबेडकर पार्क बनवाए गए और कांशीराम और मायावती की मूर्तियां लगाई गईं. मायावती पर भ्रष्टाचार के भी बहुत से आरोप लगे हालांकि उनमें से एक भी आज तक सिद्ध नहीं हो पाया है.
लेकिन इस बीच 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को उत्तर प्रदेश की 80 में से 20 सीटें मिलीं. वोट प्रतिशत लगभग 13 फ़ीसदी गिरा और 28.1 फ़ीसदी पर आ गया. 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी. मायावती का मत प्रतिशत 26 प्रतिशत रह गया. माना गया कि सवर्ण धीरे-धीरे मायावती का साथ छोड़ रहे थे.
'बसपा को ख़त्म समझना अभी जल्दबाज़ी'
समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों ने भी बसपा का साथ छोड़कर सपा का दामन थाम लिया. नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा जब एक भी सीट न जीत पाई और उसका मत प्रतिशत 19.77 तक गिर गया. लेकिन इस साल मई में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा को भले ही 19 सीटें मिली हो उसका वोट बैंक लगभग ढाई फ़ीसदी बढ़ गया.
ऐसे में कोई भी अगर बसपा का मर्सिया पढ़ने की बात करता है, तो निश्चित ही वह ग़लतफ़हमी का शिकार है. देखा जाना चाहिए कि पिछले 30 साल में बसपा से कितने नेता निकाले गए और उनमें से कितने अपना राजनीतिक करियर बचाने में सफल हुए. जवाब होगा- सिर्फ स्वामी प्रसाद मौर्य जिन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा छोड़ी और चुनाव के बाद भाजपा की सरकार में शामिल हो गए.
स्वामी प्रसाद मौर्य के अलावा राजबहादुर, जंग बहादुर पटेल, डॉक्टर मसूद अहमद, आर के चौधरी, बाबू सिंह कुशवाहा जैसे दर्जनों नेताओं को मायावती ने समय-समय पर पार्टी से निकाला और वे सभी राजनीति की अंधेरी गलियों में खो गए.
ऐसे में यह मानना कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा से निकाले गए नेताओं को एक करके मायावती के लिए चुनौती पेश कर पाएंगे, आशावाद ही करार दिया जा सकता है. नसीमुद्दीन सिद्दीकी के एक करीबी सहयोगी ने हाल ही में उनकी भाजपा से बढ़ती नज़दीकियों के संकेत दिए थे. यह पूछने पर सिद्दीकी भाजपा से कैसे हाथ मिला सकते हैं, उसका कहना था नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा के नेता कभी नहीं थे. वह तो महज मायावती के कर्मचारी थे. और कर्मचारी तो एक नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी कभी भी पकड़ सकता है.
मायावती ने क्यों दिया इस्तीफ़ा?
अब बात मायावती के राज्यसभा से इस्तीफ़ा देने की. दलितों के सम्मान के सवाल पर उनका इस्तीफ़ा देना महज सांकेतिक राजनीति है. सहारनपुर दंगों में भाजपा समर्थित भीम आर्मी की सक्रियता और राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने जैसे फ़ैसलों से उन्हें दलित वोटबैंक में भी सेंध लगती दिखाई दे रही है. उसी को अपने साथ लामबंद करने के लिए ही उन्होंने इस्तीफ़ा दिया.
वैसे भी उनके कार्यकाल में सिर्फ़ 6 महीने ही रह गए थे. लालू यादव ने उन्हें बिहार से राज्यसभा दोबारा भेजने का आश्वासन दे दिया था, ऐसे में यह भी इस्तीफ़े की एक वजह हो सकता है.
मायावती सपा और राजद जैसे दलों को छोड़कर एक ग़ैर विपक्षी एकता बनाने की कोशिश कर रही हैं जिससे कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मज़बूत टक्कर दी जा सके. नीतीश कुमार के भाजपा से हाथ मिलाने से इन कोशिशों को पहला झटका तो लग ही गया है. मायावती अपनी ज़मीन कितनी बचा पाएंगी, यह देखना भी दिलचस्प होगा.
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