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नज़रिया: उंगली काटकर शहीद बनना चाहती हैं मायावती
- Author, कँवल भारती
- पदनाम, दलित चिंतक
राज्यसभा में शोरशराबे के बीच मायावती की बात सुनाई नहीं दी कि वो कह क्या रही थीं. केवल "मैं आज ही इस्तीफा देती हूँ, और ऐसी राज्यसभा में रहने से क्या फायदा", शब्द ही सुनाई पड़े.
हमारे समुदाय में एक कहावत है, "रोने को तो बैठी ही थी, इतने में भैया आ गए". यह कहावत मायावती पर पूरी तरह चरितार्थ होती है.
उनकी राजनीति पूरी तरह विफल हो चुकी थी. लोकसभा में उनकी पार्टी का प्रतिनिधित्व शून्य था, और राज्यसभा में एकमात्र प्रतिनिधि वे स्वयं थीं.
कुछ महीने बाद उनका कार्यकाल समाप्त हो ही रहा था और लालू यादव के आश्वासन के बावजूद दोबारा चुने जाने को लेकर वो आश्वस्त नहीं थीं.
इसलिए, इस्तीफ़ा देने का मन तो वो पहले ही बना चुकी थीं, आज उनको बहाना मिल गया. और बहाना भी ऐसा कि सुनकर हँसने का मन करता है.
ध्वस्त हो चुकी है पार्टी
मेरी नज़र में वो इस्तीफ़ा देने की पेशकश करके अपनी राजनीतिक विफलताओं को शहादत का जामा पहनाने की कोशिश कर रही हैं.
वो हर मोर्चे पर विफल हुई हैं, पार्टी का जो संगठानिक ढांचा कांशीराम ने खड़ा किया था, वह बिखरा ही नहीं, समाप्त भी हो गया है. दलितों, पिछडों, और अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर जो उसकी राजनीतिक जमीन थी, वह ध्वस्त हो चुकी है.
उनकी तथाकथित सोशल इंजिनियरिंग, जिसका वह ढिंढोरा पीटती थीं, विधानसभा के चुनावों में कहीं दिखाई नहीं दी. दलितों के जरूरी मुद्दों तक पर उनका जुझारूपन दिखाई नहीं दिया.
सहारनपुर कांड पर उनकी पूरी राजनीति भाजपा के पक्ष में रही. भीम आर्मी के नाम पर सरकार ने निर्दोष नौजवानों को जेल भेजा, उन पर 'रासुका' लगाई, और मायावती ने उसका कोई प्रतिरोध नहीं किया.
आदित्यनाथ योगी की जिस हिन्दू युवा वाहिनी ने सहारनपुर कांड को अंजाम दिया था, उसके ख़िलाफ़ मायावती ने न सदन में और न सदन के बाहर आवाज उठाई.
उन्होंने हमेशा सुरक्षित और सुविधाभोगी राजनीति की. इसलिए गुजरात कांड पर खामोश रहीं.
ऊना में दलितों को पीट-पीट कर मारने वाले गोरक्षक-गुंडों के ख़िलाफ़ पूरे गुजरात में दलितों का इतना बड़ा आन्दोलन हुआ कि मुख्यमंत्री आनंदी बेन को इस्तीफ़ा देना पड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात में जाकर दलितों के लिए आंसू बहाने पड़े.
उस आन्दोलन की देशव्यापी गूँज हुई, पर मायावती के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. वह चाहतीं, तो उस मुद्दे पर आरएसएस और भाजपा के हिन्दू एजेंडे के ख़िलाफ़ अपनी पार्टी का धारदार आन्दोलन चला सकती थीं. पर वो मौन धारण कर राज्यसभा की सुविधाओं का उपभोग करती रहीं.
सुविधावादी राजनीति
रोहित वेमुला की आत्महत्या पर, जहां पूरे देश में सामाजिक संगठनों ने आन्दोलन किए, देश के चोटि के विपक्षी नेताओं ने वहाँ जाकर छात्रों के प्रतिरोध का समर्थन किया, वहाँ मायावती ने रोहित वेमुला की जाति पर शर्मनाक कटाक्ष किया.
यही शर्मनाक रवैया उन्होंने पूरे देश में भारत माता और राष्ट्रवाद के नाम पर चल रहे फासीवाद के प्रति अपनाया. इसके राजनीतिक शिकार बनाए गए जेएनयू छात्र कन्हैया कुमार के प्रति भी मायावती ने उत्तरप्रदेश में भाजपाई राष्ट्रवाद के खिलाफ माहौल बनाने के बजाय, कन्हैया कुमार की जाति को लेकर अशोभनीय टिप्पणी की.
क्या यह दलित या बहुजन राजनीति के लक्षण हैं?
ऐसी निष्क्रिय मायावती अगर राज्यसभा से इस्तीफ़ा देती हैं, तो दलितों पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है. यह अंत ही उनकी परिणति है.
वही किया जो भाजपा ने कहा
कोई माने, या न माने, पर यह सच है कि मायावती ने अपनी राजनीति को अपनी निजी सम्पत्ति पैदा करने का साधन बनाने का काम किया था.
उस वक्त वह उत्थान पर थीं, और भाजपा को उनकी जरूरत थी. सो वे हर स्रोत से अकूत धन इकठ्ठा करने में लग गयीं.
भाजपा जानबूझ कर आँखें मूंदे रही, क्योंकि वह उसके भ्रष्टाचार के सहारे ही, अपनी अगली मंजिल तय कर सकती थी. इसी भ्रष्टाचार के बल पर जब भाजपा ने अपना शिकंजा कसा, तो मायावती वही करती रहीं, जो भाजपा कहती रही.
उन्होंने भाजपा के कहने पर सपा को कमजोर करने का खेल खेला और विधानसभा चुनावों में सौ मुसलमानों को टिकट दिए. दूसरे शब्दों में उन्होंने भाजपा को थाल में रखकर सौ सीटें सौंप दीं.
भारतीय राजनीति के इतिहास में मायावती के सिवा शायद ही कोई दूसरा नेता होगा, जिसने अपने वैचारिक शत्रु को मजबूत करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी हो.
अब क्या वो जनता के बीच जाएंगी?
अब जब भाजपा ने उन्हें राजनीतिक रूप से पूरी तरह समाप्त कर दिया है, तो वे राज्यसभा में अपना गुस्सा निकाल रही हैं.
मुझे लगता है कि सब कुछ खोने के बाद अब शायद उन्हें होश आया है कि भाजपा ने उनको बरबाद कर दिया है.
अब वे राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर अपनी उंगली काटकर शहीद बनना चाहती हैं. लेकिन उन्हें शहीद बनने की जरूरत नहीं है.
वे राज्यसभा छोड़कर पूरे देश की जनता के बीच जा सकती हैं.
अगर उन्हें, अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करना है, तो वे अब भी सामाजिक मुद्दों पर, दलित उत्पीड़न पर और आरएसएस के फासीवाद पर देशव्यापी आन्दोलन चला सकती हैं.
मगर भ्रष्टाचार में फंसी हुई नेता से यह उम्मीद शायद ही की जा सकती है.
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