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नज़रिया: दयाशंकर का निलंबन वापस लेना मायावती का अपमान
- Author, प्रोफ़ेसर विवेक कुमार
- पदनाम, समाजशास्त्री
बीजेपी ने मायावती पर अश्लील टिप्पणी करने वाले अपने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दया शंकर सिंह का निलंबन वापस ले लिया है. बसपा अध्यक्ष और प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने के लिए निलंबित किए गए दयाशंकर का बहाल किया जाना दुखद और निराशाजनक है.
प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के एक दिन बाद बीजेपी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने दया शंकर सिंह को बहाल किया है. उनका निलंबन वापस लेते हुए मौर्य ने 2019 में प्रधानमंत्री मोदी को फिर से जिताने के लिए मदद भी मांगी है.
ग़ौरतलब है कि मायावती के राज्यसभा में अपने लिए की गई टिप्पणी का मुद्दा ज़ोरदार तरीके से उठाने के बाद ही दयाशंकर सिंह पर कार्रवाई की गई थी. अन्यथा किसी ने इस पर ग़ौर तक नहीं किया था. हालांकि मायावती के मुद्दा उठाने के बाद समूचे विपक्ष ने उनका समर्थन किया था.
शर्मसार हुई बीजेपी ने राज्यसभा में अपने नेता अरुण जेटली के ज़रिए मायावती को संसद में जवाब दिया था. जेटली ने संसद में दयाशंकर सिंह की टिप्पणी के लिए खेद प्रकट किया.
जेटली के आश्वासन के बावजूद बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में बड़ा धरना दिया था जिसके बाद यूपी पुलिस ने दयाशंकर सिंह पर एससी/एसटी एक्ट के तहत जुलाई 2016 में एफ़आईआर दर्ज की थी.
एफ़आईआर दर्ज होने के कई दिन बाद तक दयाशंकर सिंह पुलिस की पकड़ से दूर रहे. पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करके जेल भेजा और बीजेपी ने जुलाई 2016 में उन्हें छह साल तक के लिए निलंबित कर दिया.
बीजेपी ने दयाशंकर सिंह को तो पार्टी से निकाल दिया लेकिन उनकी पत्नी को न सिर्फ पार्टी में शामिल किया बल्कि उन्हें महिला शाखा का अध्यक्ष भी बना दिया.
दयाशंकर सिंह की पत्नी को लखनऊ के सरोजनी नगर से टिकट दिया गया और वो अब चुनाव जीतकर विधायक बन गई हैं.
बीजेपी ने ऐसा करके एक तीर से दो निशाने मार दिए. एक ओर पार्टी ने दयाशंकर सिंह के क्षत्रिय समुदाय को ये संदेश दिया कि एक क्षत्रिय परिवार को हुए नुक़सान की पूरी भरपाई कर दी गई है.
यूपी में क्षत्रियों की जनसंख्या क़रीब आठ फ़ीसदी है. दूसरी ओर दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को पार्टी में शामिल कर और चुनाव लड़ाकर बीजेपी ने न सिर्फ मायावती बल्कि समूचे बहुजन समाज को शर्मिंदा किया.
पार्टी ने ये संकेत दिया कि दयाशंकर सिंह की विवादित टिप्पणी और उनके पार्टी से निकाले जाने का कोई असर पार्टी पर नहीं हुआ है.
निलंबन के आठ महीने के भीतर और प्रदेश में भारी बहुमत हासिल करने के एक दिन बाद दयाशंकर सिंह को दोबारा पार्टी में लिया जाना बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल करता है.
इससे पार्टी की महिलाओं को न्याय दिलाने की मुहिम और मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ से बचाने के अभियान की हवा निकलती और साबित हो जाता है कि ये सब राजनीतिक स्टंट भर था.
यदि एक पूर्व मुख्यमंत्री, राज्यसभा सांसद और एक प्रमुख पार्टी की महिला अध्यक्ष को अपमानित करके बीजेपी के शीर्ष नेता बच जाते हैं और बदले में ईनाम भी पाते हैं तो सोचिए कि आम महिलाओं का हाल क्या होगा.
रोहित वेमुला की मां एक स्पष्ट उदाहरण हैं. जब उन्होंने अपने बेटे के लिए न्याय की आवाज़ बुलंद की तब एक सदस्य जांच आयोग ने अपने अधिकारों से परे जाते हुए उनकी जातिगत और सामाजिक पृष्ठभूमि पर सवाल उठाए. ये रोहित वेमुला की मां के चरित्रहरण जैसा था.
इसी तरह, नाबालिग दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल के बलात्कार और हत्या के मामले का रहस्य अभी तक नहीं खुला है.
डेल्टा मेघवाल एक प्रतिभावान पेंटर भी थीं. राजस्थान के बीकानेर के इस मामले में राज्य की भाजपा सरकार सवालों में है. सरकार ने कथित हत्या को आत्महत्या बताया है.
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने डेल्टा मेघवाल के मामले की सीबीआई जांच की मांग भी की है. डेल्टा मेघवाल के पिता रोहित वेमुला की मां और मायावती की तरह ही न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं.
इस संदर्भ में दयाशंकर सिंह को दोबारा पार्टी में शामिल किया जाना भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के महिलाओं और उनके मानवाधिकारों के प्रति नज़रिए पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
क्या भाजपा के पास अपने कार्यकर्ताओं को नियंत्रित करने की कोई योजना है. इस समय ये सवाल उठाना ज़रूरी है क्योंकि ऊपर बताए गए मामले दर्शाते हैं कि दलित महिलाओं के अपमान और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में न्याय मिलने में देरी शोषण करने वालों को ही मज़बूत करती है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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