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ग्राउंड रिपोर्ट: जहां सांपों के साथ जुलूस निकलता है
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
'सांप को पकड़ते हैं तो मलाई जैसा लगता है ', ' सांप - नाग किसी को भी गले में डालकर फोटो खिचवा लेंगें, इसमें कौन सी बड़ी बात है', 'नानी घर आते हैं तो सांप का मेला देखने ही, बड़ा बड़ा सांप दिखता'……….सृष्टि, अंकित, चंचला, मुन्ना की आंखें सांप और नाग का नाम सुनकर चमक उठती है.
उनकी क्या, बिहार के ज़िले समस्तीपुर में विभूतिपुर प्रखंड के हर बच्चे की आंखे यूं ही चमक उठती है. न माथे पर कोई शिकन, न डर. वो बताते हैं कि इस बार मेले में उन्होंने सांप पकड़कर के फोटो खिंचाया था.
दरअसल समस्तीपुर में हर साल नागपंचमी के मौके पर सांपों का मेला लगता है. ख़ासतौर पर ज़िले के विभूतिपुर प्रखंड के सिंघिया, नरहन, डुमरिया, खदियाही, बेसरी, चकहबीब, मुस्तफापुर सहित पूरे इलाके में ये मेला छोटे या बड़े स्तर पर लगता है.
मेला लगने से एक महीने पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है. स्थानीय लोग सांप पकड़कर घरों में रखना शुरू कर देते हैं और नागपंचमी के दिन वो सांप लेकर हज़ारों की संख्या में झुंड बनाकर अहले सुबह नदी के घाट पर जाते हैं.
60 साल के महेन्द्र पासवान बीते 45 से ज़्यादा बरस से बेला (नरहन पंचायत) भगवती स्थान का काम संभाल रहे हैं. स्थानीय लोग इन्हें 'भगत' कहते हैं.
महेन्द्र को ये विरासत अपने पिता और दादा लखन पासवान से मिली है. महेन्द्र बताते हैं कि फिलहाल केरल में एक टाइल्स फैक्ट्री में काम करने वाले उनका बड़ा बेटा उनके बाद ये 'खानदानी' काम संभालेगा.
महेन्द्र बताते हैं, "नागपंचमी से एक दिन पहले रात भर जागरण होता है. सभी लोग सांप, नाग लेकर जुटते है और रात भर की पूजा अर्चना के बाद हम लोग सुबह जुलूस निकालते हुए नदी जाते हैं और स्नान करके सांप या नाग को दूध लावा खिलाकर जंगल में छोड़ देते है."
वैसा वैज्ञानिक तौर पर सांपों के दूध पीने का कोई प्रमाण नहीं मिलता. लेकिन सांपों के सामने दूध रखने का चलन काफ़ी पुराना है.
नागपंचमी के दिन ये लोग विषैले सांप और नाग हाथ में उठाकर ढोल-नगाड़ों के के साथ जुलूस निकालते हैं.
क्या बच्चे - क्या बूढ़े, सभी के हाथ में सांप खिलौने जैसा लगता है. स्थानीय निवासी सकली देवी बताती हैं, "हमारे दो पोते हैं, दोनों अभी छोटे है लेकिन वो गले में मोटे मोटे सांप लटकाए मेले में घूमते हैं, कुछ नुकसान नहीं होता."
सकली देवी जैसा दावा स्थानीय लोगों का भी है. तो क्या सांप और नाग का विष निकाल लिया जाता है? महेन्द्र भगत कहते है कि सांप का विष नहीं निकाला जाता है लेकिन स्थानीय महिलाएं बबिता देवी और प्रतिमा देवी कहती है कि सांप और नाग का 'ऑपरेशन' होता है.
खुद नरहन पंचायत में रहने वाले अरविन्द 'भगत' बताते हैं, "विष निकाल लिया जाता है. बाकी सांप को पकड़ना कोई टेक्निक नहीं है बस दिल की हिम्मत चाहिए. हम लोग तो चलते फिरते सांप पकड़ लेते है."
रोसड़ा के अनुमंडल पदाधिकारी कुंदन कुमार भी बताते है कि बीते चार साल की पोस्टिंग के दौरान मेले के दौरान किसी तरह की कोई घटना नहीं हुई है.
वो बताते हैं, "मेले में प्रशासन की भूमिका सिर्फ क़ानून व्यवस्था, जहां जहां से जुलूस निकले वहां पड़ने वाली रेलवे लाइन में रेल परिचालन की व्यवस्था और अस्पतालों में एंटी वेनम की उपलब्धता देखना है."
दिलचस्प है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी, चंदे और जातीय भेदभाव से परे आयोजित होने वाला ये मेला कितना पुराना है इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है. महेन्द्र भगत कहते है, "हमने अपने बाप दादा को ये करते देखा है, अब हम ये कर रहे है और हमारा बाल बच्चा भी करेगा."
वहीं सिंघिया घाट की 90 वर्षीय महतारी देवी कहती हैं, "मेला 100 साल से लग रहा है. मेला देखने आसपास के इलाके के, दूर दूर से लोग आते है. इतना आदमी यहां कभी और देखने को नहीं मिलता. पूरी सड़क पर सिर्फ आदमी की सिर और सांप दिखाई देता है."
स्थानीय पत्रकार चंदन राय मेले को ऐतिहासिक बताते है. बकौल चंदन, " 1600 ई. में यहां राजा हुए राय गंगा राम जिनकी रक्षा नाग ने की थी जिसके बाद से ही ये मेला नाग और सांप के सम्मान में ये मेला होने लगा."
विषहर मेला या नागपंचमी के बारे में लोगों की धार्मिक मान्यता है कि ये सभी तरह के दुखों से 'पब्लिक की रक्षा' के लिए है.
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता संजीव के मुताबिक, "धार्मिक मान्यताओं से इतर भी ये मेला प्रकृति और हमारा संबंध मज़बूत करने वाला है."
नाग मेला बड़ों के लिए धार्मिक मान्यता है, युवाओं और बच्चों के लिए रोमांच है लेकिन सातवीं में पढ़ने वाली अंशु को ये मेला अच्छा नहीं लगता.
अंशु कहती हैं, "मेला तो अच्छा है लेकिन जब सांप को परेशान कीजिएगा तो हमारा वायुमंडल भी तो ख़राब होगा."
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