'मम्मी मैं तो सीखूंगा टैंक चलाना!'

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    • Author, सुधीश पचौरी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

'जौहर इन कश्मीर (1966) फिल्म का एक गाना 'मम्मी मैं तो सीखूंगा गोली चलाना' अपने वक़्त का एक सुपर हिट गाना था.

ये गाना रेडियो में बार-बार बजा करता- बच्चे अपना जन्मदिन पर इस फ़िल्म की नक़ल पर मिलिटरी ड्रेस पहनकर परेड करते, इसे गाते. बाजारों में ऐसी बाल-मिलिटरी ड्रेसेज भरी रहतीं, लोग शौक से ख़रीदते.

तीन मिनट तक वीर रस का इंजेक्शन लगता रहता! देशभक्ति परवान चढ़ती रहती- माता-पिता हर्षित होते रहते कि देखो अपना बबलू कितना हैपी होकर वीर रस बरसा रहा है! अभी से फ़ौजी अफ़सर बनने का इरादा है- सबसे बड़ा बाल- देशभक्त है! जब तक ऐसे बाल- वीर है तब तक अपना देश सुरक्षित है!

कोई इक्यावन बरस बाद ये गाना फिर से लौटा है लेकिन इस बार किसी घर में नहीं जेएनयू में लौटा है.

सर जी को आइडिया आया कि अगर देश बचाना है राष्ट्रवाद लाना है तो जेएनयू में एक ठो टैंक रोप देना है!

और ये टैंक होगा सभी थिंकटैंकों का बाप! टैंक देवता! टैंक गुरु!

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इमेज कैप्शन, सोशल मीडिया पर लोगों ने 'जेएनयू में टैंक' को लेकर चुटकी ली

आज़ादी की बादी-बर्बादी के मारे जेएनयू के छात्र उसका प्रातः मुहूर्त में दर्शन कर उसकी चरण रज माथे धरें और उसके आगे 'मम्मी मैं तो सीखूंगा टेंक चलाना' गाया करें! दो महीने में सब अपनी-अपनी ढपली बजाना भूलकर लाइन पर न आ जाएं तब कहना!

जेएनयू में टैंक लगा तो सब ठीक हो जाएगा! वीर रस आ जाएगा कायर देशद्रोही रस बाहर हो जाएगा!

जब से सरजी के इस ग्रेट आइडिए की ख़बर पढ़ी तब से मैं उनका मुरीद हो गया! कमाल का दिमाग़ पाया है- इसे कहते हैंःविद्वत्ता! बुद्धिमत्ता! दूरदर्शिता! और लठ्ठमत्ता! यानी फोर इन वन!

जिन छात्रों ने कभी टैंक देखा तक नहीं और जब सोचा तो टैंक की जगह अपनी रेंक के बारे में सोचा ऐसे व्यक्तिवादी फटीचर करीयरिस्ट आइडियालॉजिस्ट वामपंथी विखंडनवादी ढपली बजाने वाले क्या जानें कि अपना देश क्या है? उसकी देशभक्ति क्या है? राष्ट्र क्या है? राष्ट्रवाद क्या है?

जेएनयू के वाइस चांसलर जगदेश कुमार

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टैंक है राष्ट्र! टैंक है देश! टैंक है विचार! टैंक है विमर्श!!

जिस टैंक ने पाकिस्तान को धूल चटाई उनमें से एक टैंक भी लग जाए तो सारी जेएनयूबाजी ठिकाने लग जाए!

ग़ज़ब का बिग आइडिया निकला सरजी के दिमाग़ से कि सबके छक्के छूट गए!

ज़रा एक ठो पोस्ट-टैंक सीन सोचिएः

गंगा ढाबे पर बैठ छात्र देर रात बहस कर रहे हैं- देश की सरकार की इसकी उसकी सबकी निंदा किए जा रहे हैं- सिर्फ़ सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं और तो और मास्टरलोग भी सिर्फ सवाल पूछे जा रहे हैं सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया है कि अचानक कोई कहता हैः अबे आहिस्ता बोल! टैंक देख रहा है कहीं चल गया तो यहीं ढेर हो जाओगे! सब चुप! है न टैंक का जादू!

कार्टून

न रहेगा विचार न रहेगी ढपली! रहेगा अपना टैंक! सब थिकटैंकों का टैंक! अपना टैंक विचार की टंकी है- वीर रस से लेकर शांत रस सब इसी से बहा करते हैं.

फ़िल्म 'हम'में एक जनरल 'लाठी' होता है जो टैंकों का बिज़नेस ही करता है मुझे लगता है वह इस अवसर पर बड़े काम आएगा!

लेकिन सर जी को मेरा एक सुझाव है कि जिस तरह का जेएनयू का कैंपस का फैलाव है उसमें एक टैंक से क्या होगा? सैकड़ों एकड़ में फैला जेएनयू केंपस!

अरावली की पहाडियों मे बिखरा कैंपस ! इतने सेंटर इतने हॉस्टल इतने विचार इतनी बहसें इतने विमर्श इतने प्रदर्शन इतनी यूनियन बाजी और सिर्फ़ एक टैंक? ये तो ऊंट के मुंह में जीरा तक नहीं लगता!

जेएनयू

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मेरी राय में कम से कम दो दर्जन टैंक तो चाहिए ही-हर हॉस्टल के गेट पर एक एक रहे-हर सेंटर पर एक एक रहे-यूनियन दफ़्तर के आगे दो दो लगें- फिर कुछ गश्ती भी रहें! क्या ख़याल है?

और इतने टैंक तुरंत तो मिलने से रहे-फिर, कौन से चाहिए? अमरीका वाले कि इसराइल वाले कि रूस वाले कि अपने वाले? कंडेम हुए वाले चाहिए कि ड्यूटी में लगे? हज़ार लफड़े हैं सरजी!

करगिल दिवस

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इसलिए जब तक आपके मनमाफिक टैंक सप्लाइ न हो जाएं तब तक कैंपस को वीर रस का इजेंक्शन देने के लिए, छात्र-अध्यापकों में देशभक्ति की भावना पैदा करने के लिए मेरा यह आइडिया कबूल फरमाएं नहीं तो कन्हैया फिर से अपनी ढपली बजाने लगेगा!

मेरा प्रस्ताव है कि जब तक असली टैंक न आ जाएं तब तक खिलौना टैंक यानी 'टॉय टैंक' से काम चलाइए! टॉय शाप्स में ये सभी साइजों में और सही दामों पर उपलब्ध हैं! चाहें तो 'पॉकेट साइज टॉय टैंक' बनवाने का आर्डर भी दे सकते हैं!

जब तक असली टैंक आएं तब तक हर छात्र 'पाकेट साइज टॉय टैंक' को अपनी जेब में रखे-यही उसका आइकार्ड हो-जब क्लास में आएं तो मेज पर रखकर बैठे-जब मेस में खाना खाए तो थाली के पास रखे- जब हॉस्टल के कमरे में सोए तो अपने सिरहाने रखकर सोए! वीर रस से सराबोर नींद न आए तो कहना!

जेएनयू

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सत्संग की महिमा अनंत है-कहा ही है कि 'जैसी संगति बैठिए तेसोई फल दीन' यानी जिस तरह की संगति होती है उसी तरह का फल मिलता है-विचार की संगति हेागी तो बिचारे बनोगे- टैंक की संगति होगी तो टैंक की तरह बनोगे!

चौबीस बाई सात टैंक का साथ रहेगा तो वीरता जागेगी ही जागेगी-सेना के प्रति आदर का भाव पैदा होगा ही और 'जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी' वाला गीत मन में गूंजता रहेगा! राष्ट्र के प्रति आदर का भाव इसी तरह बढेगा!

जब तक असली न मिले तब ऐसे ही टाय टेंकों से काम चलाइए! जेएनयू को टेंक-मय बनाइए और वीर रस बरसाइए-उसमें नहाइए और 'मम्मी मैं तो सीखूंगा टेंक चलाना' गाइए!

आज गोएब्ल्स की आत्मा अपनी क़ब्र में पड़ी सिसक रही होगी कि आप तो उससे भी तेज निकले सर जी! वो कहता था कि जब कोई कल्चर की बात करता है तो उसका हाथ अपनी पिस्तौल पर पहुंच जाता है, आपका तो सीधे टैंक पर ही पहुंच गया! ग्रेट!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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