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नज़रिया: पीएम मोदी के सामने विपक्ष इतना बेबस क्यों है?
- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को हराया.
मीरा कुमार और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि ये विपक्ष के लिए विचारधारा की लड़ाई है.
राष्ट्रपति का चुनाव इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों की वोटिंग पर निर्भर करता है इसलिए उसमें जो सीधा गणित है, वो सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के पक्ष में गया.
इसलिए विपक्ष के पास कोई जादुई फ़र्मूला नहीं था कि जिससे वो नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बड़ी कठिनाई पैदा करे.
एकजुटता की कोशिश
कांग्रेस एक पुरानी पार्टी है और लंबे समय तक सत्ता में रही है तो दूसरी तरफ़ कई ग़ैर भाजपा राजनीतिक दल हैं वो भी कांग्रेस के उतने ही विरोधी हैं जितना बीजेपी के.
ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास राष्ट्रपति चुनाव में ज़्यादा विकल्प नहीं थे. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकजुट करने की अगुवाई की थी.
माना जा रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सरकार से टक्कर लेने के लिए एक छाते के नीचे विपक्ष को इकट्ठा करने की कोशिश थी.
विपक्ष की बात करें तो इसमें 18 पार्टियां हैं और इनमें होड़ लगी है कि 2019 में (पीएम का) कौन चेहरा होगा?
गणित के आगे बेबस
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बजाय क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ये चेहरा हो सकते हैं या मायावती हो सकती हैं, इसे लेकर हर नेता नरेंद्र मोदी के सामने चेहरा बनने की कोशिश में है.
विपक्ष, महात्मा गांधी के पोते और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी को आगे करता या फिर कोई और राजनीतिक पेंच लड़ाता तो भी इलेक्टोरेल कॉलेज के गणित के आगे वो बेबस था.
उपराष्ट्रपति का चुनाव पांच अगस्त को होना है. एनडीए ने पहले ही बिहार के पूर्व राज्यपाल रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार घोषित कर दिया था. विपक्ष ने नाम बाद में घोषित किया.
लेकिन उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने पहले ही महात्मा गांधी के पोते और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी को उम्मीदवार घोषित कर दिया है.
सोनिया, मोदी में मेल नहीं
इसके बाद एनडीए ने पूर्व केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को अपना उम्मीदवार बना दिया. उपराष्ट्रपति पद के लिए भी किसी तरह के सर्वानुमति की गुंजाईश नहीं दिखती थी. राजनीतिक शिष्टाचार में बीजेपी और कांग्रेस बहुत अलग-थलग हैं.
जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी के एक दूसरे के विरोधी होने के बावजूद उनमें एक तरह की गर्मजोशी थी और रिश्तों में अपनापन था, इससे उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच ये व्यक्तिगत तौर पर मौजूद नहीं है.
कांग्रेस और बीजेपी वैचारिक दृष्टिकोण से बिल्कुल एक दूसरे के करीब नहीं आना चाहते हैं.
कांग्रेस पहले यही करती रही है
1952 के बाद से कांग्रेस की सरकारों ने अपनी मर्ज़ी का राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुना. इसे ध्यान में रखें तो इतने प्रचंड बहुमत को देखते हुए बीजेपी के हक़ में बाज़ी थी.
एनडीए की सरकार केंद्र में है लेकिन बहुमत बीजेपी के लिए है, राज्यों में भी बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन है. कांग्रेस के लिए आगे की राह कैसी होगी और उसका भविष्य क्या होगा वो आने वाले विधानसभा चुनावों पर निर्भर करता है.
हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस अपना क़िला बचा पाएगी? क्या राजस्थान और मध्यप्रदेश में होने वाले चुनावों में कांग्रेस जीत पाएगी? इस सवाल का जवाब ही कांग्रेस के भविष्य को तय करेगा.
ख़ुद को बचाने के लिए कांग्रेस को अपनी क़ामयाबी की कहानी लिखनी ही होगी.
ये इंदिरा की कांग्रेस नहीं
एक राजनीतिक दल के नाते कांग्रेस को चुनाव में अपनी भारी जीत दिखानी होगी जिसमें वो जनता का मन जीते, यहीं से कांग्रेस की वापसी की कहानी शुरू होगी.
कांग्रेस के लिए राह कठिन ज़रूर है, लेकिन अगर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव हारी थीं तो कांग्रेस ने तीन साल में वापसी की थी.
इंदिरा गांधी की कांग्रेस और आज की कांग्रेस में एक फ़र्क है और वो ये कि 1977 की कांग्रेस में एक आत्मविश्वास था और पार्टी को लगता था कि इंदिरा गांधी कांग्रेस को सत्ता में ला सकती हैं.
आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी में कांग्रेस के नेताओं को ही विश्वास नहीं है तो जनता की क्या बात की जाए.
(वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई से बीबीसी संवाददाता हरिता काण्डपाल की बातचीत पर आधारित.)
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