गांधी के पोते गोपाल कृष्ण वाइस प्रेसीडेंट की दौड़ में

राजनीतिक गलियारों में लिबरल और विद्वान विचारक के रूप में पहचाने जाने वाले गोपाल कृष्ण गांधी का जन्म 22 अप्रैल 1945 को हुआ.

उनकी एक पहचान महात्मा गांधी के पोते के रूप में भी है.

उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए किया और फिर 1968 में वे सिविल सेवा में आ गए.

1992 में उन्होंने स्वेच्छा से यह सेवा छोड़ दी. आईएएस अधिकारी रहते हुए गोपाल कृष्ण 1985 से 1987 तक उपराष्ट्रपति के सचिव रहे, उसके बाद 1987 से 1992 तक वे राष्ट्रपति के संयुक्त सचिव भी रहे.

राज्यपाल के तौर पर गोपाल कृष्ण

गोपाल कृष्ण साल 2004 से 2009 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहें. इस दौरान सत्ता प्रशासन के सामने भी वे अपने विचार खुलकर रखते रहे. नंदीग्राम में हुए किसान आंदोलन के वक्त उन्होंने 30 साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज़ लेफ्ट सरकार को आड़े हाथों लिया.

उस वक्त उन्होंने कहा, मै अपनी शपथ के प्रति इतना ढीला रवैया नहीं अपना सकता, मै अपना दुख और पीड़ा और अधिक नहीं छिपा सकता.'

गोपाल कृष्ण कई विवादास्तपद मुद्दों पर भी अपनी राय रखने के लिए जाने जाते रहे हैं. वे राजनीति में हमेशा नैतिकता और पारदर्शिता की बात करते रहे. एक बार वे सीबीआई को 'सरकारी कुल्हाड़ी' की संज्ञा भी दे चुके हैं.

कई बड़े पदों की संभाल चुके हैं जिम्मेदारी

बंगाल का राज्यपाल बनने से पहले 71 वर्षीय गोपाल कृष्ण कई बड़ी जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं.

वे दक्षिण अफ्रीका और लेसोथो में भारत के राजनायिक रह चुके हैं, साथ ही नॉर्वे और आइसलैंड में वे भारत के राजदूत का पद संभाल चुके हैं. 1997 में वे राष्ट्रपति के सचिव भी रह चुके हैं.

समसामयिक मुद्दों पर मुखर हैं गांधी

गोपाल कृष्ण गांधी वर्तमान में अशोक यूनिवर्सिटी में इतिहास और राजनीति के प्रोफेसर हैं. वे देश में चल रहे सभी मुद्दों पर मुखर रहते हैं.

साल 2015 में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्या को किसी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. वे आक्रामक राष्ट्रवादी राजनीति के भी आलोचक हैं.

वे लोकपाल पर सरकार के लचर व्यवहार पर कई बार सवाल उठा चुके हैं. साथ ही व्हिसलब्लोअर एक्ट के भी पैरोकार रहे हैं.

गोपाल कृष्ण ने विक्रम सेठ की किताब 'ए सूटेबल ब्वाय' का हिंदी ट्रांसलेशन किया है. इसके साथ ही वे श्रीलंका में तमिल श्रमिकों पर भी एक उपन्यास लिख चुके हैं.

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