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नज़रिया: अब अपनों के बीच अकेले दिखते हैं राजनाथ सिंह
- Author, राहुल देव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
निश्चय ही राजनाथ सिंह के लिए यह अनुभव नया रहा होगा. ऐसा अक्सर नहीं होता कि देश के गृह मंत्री के ख़िलाफ़ कोई खुलकर लिखे और हज़ारों लोग समर्थन में खड़े दिखें. वह भी वे लोग जो आम तौर पर गृह मंत्री की पार्टी के वैचारिक और राजनीतिक समर्थक माने जाते हैं.
लेकिन यह हुआ और अचानक राजनाथ सिंह ने अपने आपको एक ऐसी अजनबी जगह पाया जहां वह अब तक के अपने वैचारिक साथियों के लिए खलनायक और वैचारिक विरोधियों के लिए नायक की नई, अपरिचित भूमिका में दिख रहे थे.
भारत के वर्तमान मानस को समझने के लिए 7 अमरनाथ यात्रियों की हत्या और उस पर उनकी बेहद सुलझी हुई, संवेदनशील और समझदार टिप्पणी पर चल रहा विवाद एक अच्छा उदाहरण है.
गृह मंत्री और मोदी मंत्रिमंडल के वरिष्ठतम मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में मंत्रिमंडल बैठकों की अध्यक्षता करते हैं.
उनकी वरिष्ठता भाजपा के सक्रिय नेताओं में सर्वोच्च है. उनकी छवि एक गंभीर, ठोस, सधे हुए नेता की है जो संगठन और सरकार दोनों में अपने काम से लगभग निर्विवाद रूप से सम्मानित है.
वही राजनाथ सिंह आज अपने ही परिवार में अकेले नज़र आ रहे हैं. आमतौर पर अपनी सरकार, पार्टी, विशेषतः प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के ट्वीटों को रीट्वीट करने वाले उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी और सोशल मीडिया पर सक्रिय कार्यकर्ता तथा समर्थक राजनाथ सिंह की उस ट्वीट को अपना समर्थन देकर बढ़ाने से पीछे हट गए.
इसमें उन्होंने एक लड़की के अपशब्द और हिंसा के आह्वान से भरे ट्वीट के जवाब में एक बेहद शालीन, शांत और ज़िम्मेदार जवाब दिया था.
राजनाथ के बयान की प्रशंसा
हत्याकांड के अगले दिन 11 जुलाई को राजनाथ सिंह ने तीन ट्वीट किए थे. पहले में उन्होंने हमले की निंदा करते हुए इस बात पर संतोष जताया कि पूरा देश आतंकवाद के ख़िलाफ़ एकजुट खड़ा है. दूसरे में कहा कि कश्मीर के लोगों ने हमले की कड़ी भर्त्सना की है, और यह दिखाता है कि कश्मीरियत की भावना जीवित है.
तीसरा ट्वीट उस लड़की के जवाब में था जिसमें राजनाथ सिंह ने उसका नाम लेते हुए उसे आश्वस्त किया- "सुश्री कालरा निश्चय ही. देश के सभी भागों में शांति और समरसता सुनिश्चित करना पूरी तरह से मेरा ही काम है. सारे कश्मीरी आतंकवादी नहीं हैं."
भारत के गृह मंत्री के ये शब्द और उद्गार एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जिस पर देशवासियों की भावनाएं क्रोध और हिंसक प्रत्युत्तर की तीखी मांगों से भरी हुई उबल रही थीं, विस्फोटक हो सकती थीं.
दूसरी ओर, ठीक उतनी ही ज़िम्मेदारी, बुद्धिमत्ता और संवेदनशील गंभीरता से भरी थी जैसे एक परिपक्व लोकतांत्रिक सरकार के वरिष्ठतम मंत्री के शब्दों में होने और दिखने चाहिए.
लेकिन इनसे ट्विटर की दुनिया में हंगामा हो गया. दोस्त दुश्मन बन गए. दुश्मन प्रशंसा के पुल बांधने लगे. जिनके नाम और उपस्थिति से ही हिन्दुवादी चिढ़ जाते हैं, ऐसे जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा दिल्ली के एक पुस्तक समारोह में राजनाथ सिंह के उत्तर की तारीफ़ में गदगद हो गए.
बीजेपी समर्थकों की उम्मीद से उलट बयान
भाजपा कार्यकर्ताओं, समर्थकों और सामान्य वैचारिक सहयात्रियों को इसकी उम्मीद नहीं थी. उग्र समर्थक उनसे अपनी जैसी ही उग्रता और आक्रामक प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे थे. सरकार के कई मंत्री ऐसे अवसरों पर, ज़्यादातर पाकिस्तान-प्रेरित आतंकवादी वारदातों पर, आक्रामक प्रतिक्रियाएं देते रहे हैं.
ये प्रतिक्रियाएं आतंकवादियों और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सैनिक क़दमों के संकेतों या आतंकवादियों को उनकी ही भाषा में मज़ा चखाने के संकल्पों से भरी रहती हैं.
सरकार के दृढ़ इरादों, आतंकवाद से आरपार की लड़ाई लड़ने के संकल्प और तैयारी की अभिव्यक्ति से उबलती, प्रत्युत्तर मांगती जन भावनाओं को अपना स्वर देकर संतुष्ट करने की कोशिशें सरकार की सूचना रणनीति का अब परिचित हो चला हिस्सा रहीं हैं.
राजनाथ सिंह की सधी हुई प्रतिक्रिया
यह अलग बात है कि राजनाथ सिंह कभी इस श्रेणी में शामिल नहीं रहे हैं. उनकी प्रतिक्रियाएं अपने बहुत से पार्टी और सरकार सहयोगियों के विपरीत गंभीरता और संतुलन से भरी रही हैं.
बोलते समय उनका एक ख़ास अदा से हाथ चलाना और हमलों के जवाब में सिर्फ कड़ी निन्दा करना पहले से ही बहुत से लोगों के बीच उपहास का विषय रहे हैं.
लेकिन अमरनाथ यात्रियों की हत्या सामान्य आतंकवादी हमला नहीं था. बस गुजरात से गए तीर्थयात्रियों की थी. पहले भी अमरनाथ यात्रा पर तीन हमले हो चुके हैं. एक में तो 30 तीर्थयात्रियों की जानें गई थीं. लेकिन इन घटनाओं को 16-17 साल हो चले थे.
आम मान्यता और अनुभव यह रहा है कि इस्लामी जिहादी आतंकवादी भी हिन्दू तीर्थयात्रियों को निशाना नहीं बनाते थे. कश्मीर घाटी में हुर्रियत और अन्य अलगाववादी संगठनों का नेतृत्व भी और सामान्य कश्मीरी नागरिक भी इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि उनकी लड़ाई राजनीतिक नेतृत्व से है, और अमरनाथ देवदर्शन की पवित्र यात्रा पर आने वाले हिन्दू यात्रियों की सुरक्षा और सेवा घाटी के मुसलमान सच्ची निष्ठा से करते रहे हैं.
वह भ्रम इस बार जब टूटा तो आतंकवादी हिंसा का आदी हो चला पूरा देश और स्वयं कश्मीर का मुस्लिम समाज भी झटका खा गया. इसलिए इस पर देश में स्थिति विस्फोटक हो सकती थी.
लोग रोजमर्रा वाले राजनीतिक बयान नहीं सख्त कार्रवाई की मांग रहे थे. लेकिन यही वह समय था जब अनुभव, जिम्मेदारी और परिपक्वता सरकार से एक सधे, सुविचारित और ऐसी प्रतिक्रिया की मांग करती थी जो स्थिति को फट पड़ने से बचाए, उफनती उग्रता को शांत करे.
अलग-थलग पड़े राजनाथ सिंह?
राजनाथ सिंह ने वह परिपक्वता और गंभीरता दिखाई. यह वह समय भी था कि उनकी पार्टी का नेतृत्व और कार्यकर्ता भी इस अवसर पर उनके साथ खड़े दिखते.
हुआ उल्टा. राजनाथ अब अपनों के बीच अकेले दिखते हैं. अफ़वाहें रही हैं कि वह प्रधानमंत्री के उतने करीब नहीं जितना एक गृह मंत्री को अपने प्रधानमंत्री के होना चाहिए. वह अमित शाह के निजी वृत्त में भी शामिल नहीं हैं.
भाजपा के भीतर उनका यह अलग-थलग होना क्या रंग लाता है यह ज़ाहिर होने में समय लगेगा. वह सरकार और पार्टी के अंतःपुर में फिर से प्रवेश पाते हैं या नहीं यह अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना रहेगा.
लेकिन कम से कम एक लाभ तो यह हुआ है कि मोदी-शाह-भाजपा के परम विरोधी और आलोचक अब यह आरोप नहीं लगा सकेंगे कि यह पूरी सरकार देश में सामाजिक विभाजन को बढ़ा कर ध्रुवीकरण का गणित खेलना चाहती है. अब भाजपा के पास एक ठोस और बड़ा प्रतीक है ख़ुद को संवेदनशील, समावेशी और ज़िम्मेदार बताने के लिए.
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