'सतही हो चुकी है जेएनयू की भीतरी विचारधारा'

    • Author, प्रेम मिश्रा
    • पदनाम, जेएनयू के छात्र

बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यकों का होना मुश्किल है या आसान? कोई अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक धर्म, भाषा, इलाक़ा या नस्ल के आधार पर हो सकता है.

क्या अल्पसंख्यकों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है?बीबीसी हिन्दी ने इसी चीज़ को समझने की कोशिश की है. इस कड़ी में पढ़िए जेएनयू में 'वैचारिक रूप से अल्पसंख्यक छात्र' कैसा महसूस करते हैं.

जेएनयू एक विश्वविद्यालय ही नहीं, एक सोच भी है. और शायद इस देश में अकेला ऐसा संस्थान भी जहां आपको ये पढ़ाया नहीं जाता है कि अपने हक़ के लिए लड़ना किसी किताब में लिखा है.

यहां आपको ये भी नहीं सिखाया जाता है कि सहिष्णुता के मायने क्या होते हैं? न ही ये सिखाया जाता है कि लड़कियों के पहनावे और जीने के अंदाज़ पर आप टिप्पणियां करें.

ये सब आप इस संस्थान में वक़्त के साथ जीते हैं, लेकिन क्या विचारधारा जो संस्थान को ज़िंदा रखती है, वही उसके लिए ज़हर भी पैदा कर सकती है या यूं मान लें कि मुट्ठी भर लोगों के आज़ादी के नारे लगाने से जेएनयू जैसे संस्थान को छद्म राष्ट्रवाद के बहाने सरकार अपनी तमाम नाकामियां छुपाने के लिए 'एसेंशियल एविल' की तरह देख सकती है.

शायद ही दुनिया की तारीख़ में कोई मुल्क हो जो ख़ुद के सुपर पावर होने का सपना देखती हो, वहां सरकार एक संस्थान के राष्ट्र विरोधी होने के लिए मीडिया नैरेटिव को न्यायपालिका पर तरजीह दे तो वो अघोषित इमरजेंसी ही मानी जानी चाहिए!

'लेफ़्ट और राइट'

आगे अपनी बात लिखने से पहले ये बता दूं कि मैं कभी भी वामपंथी नहीं रहा और न ही दक्षिणपंथ कभी रहा हूं. इस विश्वविद्यालय में तकरीबन अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा लोग मेरे जैसे ही हैं जिनके लिए 'लेफ़्ट और राइट' से परे कोई ज़मीन हो.

और अगर हैं भी तो उनकी विचारधारा सिर्फ जातिगत ही है. चाहे ओबीसी फ़ोरम हो या बापसा. मैं इस संस्थान को तकरीबन आठ साल में अपने कई अनुभवों में जीता रहा हूं.

2009 में जब पहली बार यहां आया था, तो सुना था कि केरल, बंगाल और त्रिपुरा के बाद लेफ़्ट अगर कहीं ज़िंदा है, तो यहीं है.

लाल रंगों से सनी हुई दीवारें दुनिया भर में लेफ़्ट मूवमेंट्स को ख़ालिस बयां करती हैं. यहां दक्षिणपंथ तमाम उम्र जीने के बाद भी दीवारों में कभी ख़ुद के लिए कोई खास जग़ह नहीं बना पाया.

और शायद जब एडमिशन का दौर शुरू होता है, लेफ़्ट आपके सामने होता है. असल में काडर बनाने की पहली लड़ाई यहीं से तैयार की जाती है और विचारधारा को ज़िंदा कैसे रखा जाता है, ये भी यहीं से शुरू होता है.

सबसे पहली बार मुझे काउंसलर के लिए लड़ने का मौका लेफ्ट ने ही दिया था, जिसके लिए मैंने मना कर दिया था. मेरे अपने अनुभव में दोनों जगहों पर व्यक्तिगत सबंध ज़्यादा मायने रखते रहे हैं. इसलिए मैंने लेफ़्ट की लड़ाई में भी हिस्सा लिया है और दक्षिणपंथी दोस्तों के लिए पर्चे भी लिखे हैं.

...दक्षिणपंथ को बराबरी की नज़र से नहीं देखा

लेफ़्ट का प्रभुत्व जेएनयू का एक सच है जो गुलिस्तां कई सालों में मैंने देखा है. अगर आप लेफ़्ट से रहे हैं, तो प्रोफ़ेसर आपके लिए अलग नियम रखते हैं.

मोदी सरकार के आने से पहले दक्षिणपंथियों के लिए कोई ख़ास जगह नहीं थी, ख़ास कर सोशल साइंस में.

ऐसे कई प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने खुले तौर पर कभी भी लेफ़्ट विचारधारा को चुनौती देने की हिम्मत नहीं की. मेरे अपने अनुभव में कभी भी लेफ़्ट ने दक्षिणपंथ को बराबरी की नज़र से नहीं देखा.

अगर आप दक्षिणपंथी हैं तो आप इंटेलेक्चुअल कभी नहीं हो सकते. आप प्रोग्रेसिव नहीं हो सकते. वामपंथ ने जेएनयू को हमेशा अपने अस्तित्व के इस्तेमाल तो किया ही है.

एम.फिल के शुरुआत में कई क्लास न करने पर मुझे नोटिस थमाया गया जबकि मेरी एक साथी जो लेफ़्ट से थीं, शायद ही कभी उन्होंने क्लास का रुख किया हो. उनके लिए नियम अलग थे. अपने मज़बूत काडर और प्रोफ़ेसरों से नजदीकियों की वजह से लेफ़्ट पार्टियों ने कभी भी किसी और विचारधारा को बढ़ने का मौका नहीं दिया.

कैसे बनी जेएनयू की साख

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर ये संस्थान दुनिया भर में अपनी साख बनाने में कामयाब रहा है तो लेफ़्ट का उसमे बहुत योगदान है. और यह भी कि किसी स्टूडेंट को लेफ़्ट विरोधी विचारधारा की वजह से कभी किसी को जेएनयू नहीं छोड़ना पड़ा.

असल में जेएनयू ने हमेशा हर सरकार की नीतियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई. चाहे वो पुरानी सरकारें रही हों या वर्तमान में मोदी सरकार.

लेकिन 16 मई 2014 के बाद से जेएनयू काफी बदला है. कहते हैं की निज़ाम बदलता है, तो हर चीज़ ख़ुद बदलने लगती है.

मोदी सरकार के आने के बाद से दक्षिणपंथी संगठनों को उभरने का मौका मिला है, उनके काडर बढ़े हैं, साथ ही सबसे ज्यादा फ़र्क यहां के कई ऐसे प्रोफ़ेसरों, जो कि वामपंथी विचाधारा का विरोध नहीं कर पाते थे, वो खुलकर सामने आने लगे हैं. और इन सबके पीछे दक्षिण पंथ की विचारधारा कम और व्यक्तिगत फ़ायदे ज़्यादा हैं.

दोनों विचारधाराओं में एक फ़र्क जो मैंने देखा है वो यह कि लेफ़्ट वाले अपनी विचारधारा को जॉब का ज़रिया नहीं मानते है, लेकिन दक्षिणपंथी इसे एक प्लेटफार्म के इतर कभी नहीं देखते. यही वजह है कि दक्षिणपंथ अपनी साख नहीं बना पाया है, न ही स्टूडेंट्स के बीच, न ही स्टाफ़ के बीच और न ही कैंपस के बाहर.

कहां-कहां हैं गढ़

स्कूलों और ढाबों की राजनीति से परे अगर असल विचारधारा की लड़ाई कहीं होती है, तो वो मैंने देखा है पेरियार हॉस्टल में. ये शायद अजीब सा लगे लेकिन विचारधारा की दीवार इतनी पक्की है कि आज भी दोनों पंथी साथ खाना मुनासिब नहीं समझते.

पेरियार और माही-मांडवी, ये दो हॉस्टल दक्षिणपंथी संगठनों का गढ़ रहे हैं इसलिए लेफ़्ट की हमेशा ये कोशिश रही है कि इसे कैसे खत्म किया जाए.

लेफ़्ट के लोग ईद की दावत में मज़बूती से शरीक होते हैं, लेकिन दुर्गा पूजा कम से कम कैंपस में नहीं मनाते. इसलिए भी कि इन सब आयोजनों के पीछे भी काडर ही होते हैं.

9 फ़रवरी का दिन जेएनयू के इतिहास में सबसे मनहूस दिन रहा है. इस दिन के बाद से विचारधारा व्यक्तिगत होने लगी है. अगर आप लेफ़्ट के स्वर नहीं बोल रहे, तो आप संघी हो जाते हैं और अगर आप सरकार की किसी भी नीति का विरोध करते हैं तो आपको वामपंथी क़रार दिया जाता है.

मेरे एक प्रोफ़ेसर जो दक्षिणपंथी हैं, उन्होंने एक बार मुझे बुलाकर ये कहा कि फ़ेसबुक पर विरोध कम करो नहीं तो तुम्हारे आने वाले कल के लिए मुसीबत हो सकती है.

ये सच भी था क्योंकि कुछ ही रोज़ पहले सरकार की मुखालफ़त करने की वजह से मैंने एक रिसर्च अस्सिटेंट का पद गवां दिया था.

विचारधारा और अंधभक्ति

विचारधारा अंधभक्ति के बिना चल नहीं सकती और शायद ये दौर अंधभक्ति का ही है.

जेएनयू शायद अपने अस्तित्व के लिए भी लड़ रहा है. हमारा मुल्क शायद अनोखा मुल्क ही होगा जहां रिसर्च करने वाले स्टूडेंट की सीटें अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा ख़त्म कर दी जाती है क्योंकि सरकार ये मान कर चल रही है कि जेएनयू को सबक सीखाना जरूरी है.

वैसे संस्थान के भीतर भी विचारधारा इतनी सतही हो चुकी है कि यहां खुद जेएनयू को अपने फ़ायदे के लिए दक्षिणपंथी प्रोफ़ेसर्स इसे बंद कराने तक की बात कर देते हैं, लेकिन जो संस्थान सोच बदलने की क्षमता रखता है वो किसी भी विचारधारा से बड़ा है.

शायद हम जैसे लोगों के लिए जेएनयू के यही मायने हैं और अंधभक्ति चाहे राष्ट्र की क्यों न हो मानवीय मूल्यों से बड़ी नहीं होनी चाहिए.

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