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'इन्हें लगता है उत्तर भारत की लड़कियों के कई बॉयफ्रेंड होते हैं'
- Author, डॉक्टर स्वाति सिंह
- पदनाम, भीमावरम डेंटल कॉलेज, आंध्र प्रदेश
बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यकों का होना मुश्किल है या आसान? कोई व्यक्ति अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक धर्म, भाषा, इलाक़े या नस्ल के आधार पर हो सकता है. क्या अल्पसंख्यकों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है?
बीबीसी हिन्दी ने इसी चीज़ को समझने की कोशिश की है. इसकी पहली कड़ी में हमने आपको बताया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ?
दूसरी कड़ी में पढ़िए दक्षिण भारत में उत्तर भारत की लड़की को कितना संघर्ष करना पड़ता है?
जब आप किसी अजनबी जगह को अपनी ज़िंदगी का ठिकाना बनाते हैं तो आपके पास दीवार कम होती है. कोई टोकने वाला नहीं होता. हम बड़े बेफ़िक्र होकर ज़िंदगी जीते हैं.
मैं मूल रूप से बिहार में आरा की हूं. मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि आरा में मेरे लिए दीवारें ज़्यादा होतीं. वहां रहकर उन्हें तोड़ने में शायद ख़ुद ही टूट जाती.
मैं शुरू से विशाखापट्टनम में अपने पापा के साथ रही. स्कूल में जब लोग टिफिन खोलते थे तो सब कुछ खट्टा-खट्टा होता था. मेरा टिफिन भी उनके लिए अजीब होता था.
किसी बिहारी को घर से टिफिन मिले और उसमें आलू की भूजिया और पराठा न हो ये कैसे हो सकता है. तो मेरा टिफिन उन्हें सूखा-सूखा लगता होगा. खट्टा और सूखा को मिलने में कॉलेज तक की यात्रा तय करनी पड़ी.
यहां पड़ोस का कोई चाचा नहीं था. कोई दूर का भाई नहीं था. मतलब मेरे ऊपर जाति, मजहब और इलाक़ाई नैतिकता का डंडा लिए कोई पहरा नहीं दे रहा था. मुझे क्या करना है इस पर मुझे फ़ैसला लेना था. मां-पापा भी यहां आकर यहां के हो गए थे.
कॉलेज पहुंचते-पहुंचते मैंने तेलुगू सीख ली. यहां एक भाषा की दीवार थी जिसे मैंने सेतु बना लिया. तेलुगू कोई शौक से नहीं सीखी. बड़ी मुश्किल भाषा है. मुंह, जीभ, होंठ, कंठ और तालु को ऐंठ देना पड़ता है.
आप समझ सकते हैं कि भोजपुरी मातृभाषा वाली लड़की तेलुगू बोलेगी तो कितना फ़नी होगा. पर मैंने यह फ़न किया. घर में मां भोजपुरी बोलती हैं. मैं बाहर तेलगू बोलती हूं, कॉलेज में अंग्रेज़ी और उत्तर भारत के दोस्तों से हिन्दी में बात करती हूं.
बिगड़ैल लड़कियां
दक्षिण भारत के लोगों को लगता है कि उत्तर भारत की लड़कियां बिगड़ैल होती हैं. मैं भीमवरम के विष्णु डेंटल कॉलेज में हूं. यहां के टीचर्स को भी लगता है कि उत्तर भारत की लड़कियां शर्माती नहीं हैं.
कैंपस में मेरी कई लड़कियां दोस्त हैं. उनसे प्यार, मोहब्बत की बात करो तो लज्जा महसूस करती हैं. शादी से पहले सेक्स तो इनके लिए पाप है. वो झट से पूछती हैं- हे राम, ये कैसे संभव है?
मुझे किससे प्यार करना है, इस पर केवल मेरा वश है. मैंने यहां प्यार भी किया और ब्रेकअप भी किया. मैं अपने मां-बाप के लिए जवान बेटी हूं पर बोझ नहीं हूं.
इतने के बावजूद सांस्कृतिक पहचान कभी न कभी सिर उठा ही देती है. आप उनकी भाषा सीख लें, उनकी खाने की आदतों को अपना लें पर उनके मन में जो उत्तर भारतीयों के प्रति छवि होती है वह सब पर भारी पड़ जाती है.
यहां की लड़कियां स्कूलों से ही लंबे बाल रखती हैं. बाल को बड़े करीने से सजाती हैं. फूल भी लगाती हैं. ये ज़्यादा धार्मिक होती हैं. मेरे बारे में इन्हें लगता है कि मेरे कई बॉयफ्रेंड होंगे.
परंपराओं का नियम की तरह पालन
मैं समंदर किनारे अकेले घंटों बैठती हूं. स्कूटी लेकर निकल जाती हूं. पीछे लड़के को भी बैठा लेती हूं. ऐसा देख इन लड़कियों को लगता है- बाबा रे, ये तो बदमाश है.
कैंपस में एक यहीं के लड़के ने मुझे प्रपोज किया. उत्तर भारतीय लड़कों और दक्षिण भारतीय लड़कों के प्रपोज करने में एक बेसिक फ़र्क होता है. यहां के लड़के ऐसा करते हुए लज्जा महसूस करते हैं पर उत्तर भारत वाले नहीं.
यहां लोग बहुत गॉसिप करते हैं. किसी से हंस के बात करो तो इन्हें लगता है कि कुछ चक्कर चल रहा है और मैं हूं कि बिना हंसे बात ही नहीं करती.
ज़्यादा ही तेवर में रहते हैं
दक्षिण भारत के लोगों को लगता है कि उत्तर भारत वाले बेमतलब के कुछ ज़्यादा ही तेवर में रहते हैं.
यहां की लड़कियां परंपराओं का नियम की तरह पालन करती हैं. मैं इसकी उम्मीद इनसे नहीं कर सकती कि ये अपने मंगेतर को अपने पहले के रिलेशनशिप के बारे में बताएं.
ज़ाहिर है अगर मैं किसी को पंसद करूं तो मुझे बताने में कोई शर्म नहीं होगी.
अब बिहार जाती हूं तो वह अजनबी दिखता है. मैं जितनी आज़ाद हूं उस आज़ादी को बिहार सहन कर पाएगा? नहीं पता.
मेरे मां-पापा को लगता है कि शादी जाति में ही करूं. बिहार का आरा उनमें ज़िंदा है पर अब उन्हें अच्छा यहीं लगता है. वो कहते हैं कि यहां के लोग शांति से रहते हैं और उन पर वे भरोसा कर सकते हैं.
(बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से बातचीत पर आधारित)
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