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जीएसटी से महंगी होंगी जीवन रक्षक दवाएं
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक जुलाई से पूरे देश में एक समान वाले वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू होने से सरकार द्वारा क़ीमत नियंत्रण के अंतर्गत आने वाली दवाएं महंगी हो जाएंगी.
इंडियन ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडीएमए) के महासचिव दारा पटेल का कहना है कि नियंत्रित क़ीमत वाली दवाएं क़रीब 2.3 प्रतिशत महंगी हो जाएंगी.
ऐसी दवाओं में कई जीवनरक्षक दवाएं भी शामिल हैं, हालांकि इनमें से कुछ पर सरकार ने टैक्स घटा कर पांच प्रतिशत कर दिया है और वो सस्ती हो जाएंगी.
कंपनियों उठाएंगी भार
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जीएसटी के लिए फ़ार्मा इंडस्ट्री तैयार है और दवाओं की वैसी कोई किल्लत नहीं होने वाली है जैसा कि आशंका जताई जा रही है.
हालांकि अभी डिस्ट्रीब्यूटर के बाद की कड़ी में आने वाले स्टॉकिस्ट पूरी तरह जीएसटी के लिए खुद पंजीकृत नहीं हो पाए हैं.
दारा पटेल का कहना है, "इसलिए आईडीएमए ने फैसला किया है नियंत्रण से बाहर वाली दवाओं पर पड़ने वाले बढ़े टैक्स का भार फ़ार्मा कंपनियां उठाएंगी. दवा निर्माता कंपनियों में इस बात पर सहमति बनी है."
फ़ार्मा कंपनियों ने बढ़े टैक्स के आधार पर एमआरपी बढ़ाने की सरकार से मांग भी की थी. लेकिन सरकार ने केवल नियंत्रित दामों वाली दवाओं पर ही इसकी इजाज़त दी है.
अभी दवाओं पर क़रीब 9 प्रतिशत टैक्स लगता है जोकि जीएसटी लागू होने के बाद 12 प्रतिशत हो जाएगा.
छोटे शहरों में हो सकती है किल्लत
राजस्थान फ़ार्मास्यूटिकल मैन्यूफ़ैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव सुभाष मल्होत्रा कहते हैं, "चूंकि फ़ार्मा कंपनियां को दवाओं के दाम बढ़ाने की सरकार ने इजाज़त नहीं दी है इसलिए क़ीमतों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा."
ऐसी भी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि खुदरा बाज़ार में दवाओं की क़िल्लत हो सकती है.
सुभाष मल्होत्रा के मुताबिक, 'छोटे शहरों और कस्बों में वो स्टॉकिस्ट खुदरा दुकानदारों को दवाएं नहीं दे पाएंगे, जबतक जीएसटी के अंतर्गत पंजीकृत नहीं हो जाते. ऐसे स्टाॉकिस्टों की संख्या दूर दराज़ के इलाकों में अभी भी काफ़ी है.'
उनके अनुसार, सरकार ने अधिसूचित जिन दवाओं पर टैक्स को पांच प्रतिशत तक सीमित कर दिया है, उनकी बहुत थोड़ी ही संख्या है, "फिर इन दवाओं के दामों में चार प्रतिशत तक की कमी तो आएगी ही."
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