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50 हज़ार करोड़ के कर्ज़ में डूबी एयर इंडिया को ख़रीदार मिलेगा?
- Author, अशोक शर्मा
- पदनाम, पूर्व जनरल मैनेजर, एयर इंडिया
नरेंद्र मोदी सरकार ने सरकारी एयरलाइन्स कंपनी एयर इंडिया के विनिवेश की मंज़ूरी दे दी है.
केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को कहा कि इसके आगे की प्रक्रिया के लिए एक पैनल बनाया जाएगा.
ये बहुत ज़रूरी था, लेकिन किस शक्ल में होगा और कितनी हद तक हो पाएगा, अभी इस पर कयास ही लगाए जा रहे हैं.
नीति आयोग का कहना है कि इसको पूरी तरह बेच दिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार अगर अधिकतम शेयर अपने पास रखती है तो नहीं लगता है कि बहुत सारे ख़रीदार रुचि दिखाएं.
सबको आज़ादी चाहिए ताकि वो अपने हिसाब से कंपनी चला सकें और अगर सरकार के पास अधिकांश शेयर अभी भी रहेगा तो सरकारी हस्तक्षेप से उनकी आज़ादी बाधित होगी.
एयर इंडिया की बाज़ार हिस्सेदारी महज 17 प्रतिशत है. इस समय उसकी हालत वाकई ख़राब है.
इस हालत के लिए कंपनी के मैनेजमेंट के अलावा सरकारी दबाव और हस्तक्षेप भी एक बड़ा कारण रहा है.
एयर इंडिया को रूट आवंटित करने में लापरवाही बरती गई, जिसकी वजह से एयर इंडिया को स्वतंत्र प्रतियोगिता का अवसर नहीं मिला.
इस समय एयर इंडिया पर 50 हज़ार करोड़ का कर्ज़ है, जो कि वर्किंग कैपिटल के रूप में है. कोई भी ख़रीदार इसके साथ कंपनी ख़रीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा.
कहा जा रहा है कि टाटा ग्रुप ने इसमें रुचि दिखाई है, लेकिन इतने बड़े कर्ज़ को जबतक सरकार माफ़ नहीं कर देती है, इसका विनिवेश मुश्किल लगता है.
एयर इंडिया की जो हालत है, उस स्थिति में इसका निवेश बहुत ज़रूरी हो गया है.
अभी पिछले कार्यकाल में ही यूपीए सरकार ने 30,000 करोड़ रुपए का बेल आउट पैकेज दिया था, उसके बावजूद इसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.
ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि रूट निर्धारण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता नहीं बरती गई और पिछली सरकारों द्वारा छोड़े लंबित मुद्दों से भी कंपनी नहीं उबर पा रही है.
(बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल से बातचीत पर आधारित.)
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