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#pehlaperiod: आल्ता तब ही लगाया करो जब महीना हुआ करे...
हमनें औरतों से उनकी पहली माहवारी यानी #pehlaperiod के अनुभव साझा करने को कहा था. आज की किस्त में हम पेश कर रहे हैं राजबंशी देवी और ललिता की कहानी.
दोनों उस पीढ़ी की हैं जब पीरियड्स आते ही लड़कियों के लिए लड़के की तलाश शुरू हो जाती थी क्योंकि मान लिया जाता था कि अब वो जवान हो गई हैं और बच्चा पैदा कर सकती हैं.
राजबंशी देवी, उम्र 85 साल
हमारी सास बहुत तेज़ दिमाग थीं. नई-नई दुल्हन थे तो पैर में आल्ता लगाकर रखते थे. एक दिन बोलीं, बहुरिया आल्ता तब ही लगाया करो जब महीना हुआ करे, इससे बाबू को पता चल जाएगा कि अभी अछूत हो. बाबू पैर देख लेंगे तो समझ जाएंगे कि अभी तुम ठीक नहीं हो.
राजबंशी देवी ये बताते समय थोड़ा मुस्कुराती हैं लेकिन सास के लिए भरपूर आदर भी जताती हैं, जो उन्हें ऐसी सलाह दी.
आंगन में अम्मा के साथ बैठे थे. उम्र 13-14 रही होगी. उठकर गए तो अम्मा ने देख लिया कि कपड़ा लाल हो रखा है. दौड़कर आईं, हाथ पकड़कर कमरे में लेती गईं. बोलीं, देह का ख़्याल है कुछ...कुर्ता ख़राब हो रखा है और इधर-उधर मटक रही हो. समझ नहीं आया कि किए क्या हैं जो अम्मा चीख रही हैं.
पलट कर कुर्ता देखे तो दो-तीन धब्बे थे. अम्मा बोलीं अब जवान हो गई हो. देह-कपड़ा का ख्याल करना सीखो. अच्छा हुआ कोई और नहीं देखा, वरना तुम्हारे साथ-साथ हमको भी बेशर्म कहता कि बिटिया को कोई ढंग नही सिखाए. अम्मा अपनी चोर पेटी से एक कपड़ा निकालीं. बोलीं, इसको लगा लो और जाओ अभी के अभी अपना कपड़ा धोकर डालो.
हिदायत भी मिली, अब अचार मत छूना. बाबूजी से थोड़ा दूर रहना और पूजा घर के पास मत जाना. जब महीना खत्म हो जाए तो बाल धोकर नहाना.
अम्मा ने बताया था कि जिन औरतों को महीना होता है वो ही मां बनती हैं. मुझे ये जानकर बहुत खुशी हुई थी और मैंने इसे भगवान का किया धरा माना था. अब मेरी पोती सैनिटरी पैड पर पैसे खर्च करती है तो मैं टोकती हूं कि गंदे खून पर भी कोई इतना खर्च करता है..हमें तो पुरानी साड़ी को फाड़कर बनाए गए 'सैनिटरी पैड' ही मिलते थे, वो भी गिनकर.
ललिता, उम्र 55 साल
मुझे पीरियड थोड़ा लेट हुए. मां इस बात को लेकर बहुत परेशान रहती थीं. मैंने सारी 'स्त्रियों की सहेली' कही जाने वाली घुट्टियां पी हैं.
एक दिन स्कूल गई और तीसरी पीरियड के बाद कुछ गीला-गीला लगा, हाथ से छूकर देखा तो खून लग गया. मेरी सांस रुक गई कि खून... पूरी क्लास में चीख पड़ी, टीचर खून. टीचर दौड़ी-दौड़ी आई और मुझे आगे करके, मेरे साथ चिपककर स्टाफ रूम में ले गईं.
बस इतना समझ आया कि कुछ गड़बड़ हुई है क्योंकि खून बोलने के बाद से ही क्लास में कुछ खुसफुसाहट होने लगी थी.
स्टाफ रूम में ले जाकर उन्होंने कहा, सीधे घर जाना. उन्होंने ही क्लास रूम से बैग लाकर दिया. रिक्शा बुलवाया और घर भेज दिया. मां को समझ नहीं आया कि मैं जल्दी क्यों आ गई लेकिन जब मेरी स्कर्ट पर नज़र पड़ी तो उनके मुंह से निकली बात मुझे आज तक नहीं भूली. बोलीं, चलो आ गया. मेरी एक चिंता तो दूर हो गई. उसके बाद मां ने समझाया.
हालांकि पैड लेकर जाना हमेशा बुरा लगा, खासकर रबड़ वाले. एक बार तो पैड गिर गया था और पता भी नहीं चला था. घर आकर देखा तो सिर्फ इलास्टिक ही कमर में रह गई थी.
मां को बताया तो, उनको इस बात की चिंता हो गई कि कोई मुझ पर जादू-टोना न कर दे. आज सोचती हूं तो हंसी आती है कि यूज़्ड पैड देखकर कोई किसी की पहचान कैसे कर सकता है.
(राजबंशी और ललिता देवी से बीबीसी संवाददाता भूमिका राय की बातचीत पर आधारित)
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