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शिया-सु्न्नी मोहब्बत देखनी है तो कश्मीर आएं!
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर के बडगाम इलाके में स्थानीय शिया और सुन्नी लोगों ने एक ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का फैसला किया है.
सऊदी अरब और ईरान के बीच ताज़ा तनाव के बारे में भारत प्रशासित कश्मीर में सुन्नी और शिया, दोनों संवेदनशील हैं.
दोनों समुदायों के धार्मिक नेता आज कल दोनों समुदायों की एकता को और मजबूत करने में जुटे हुए हैं.
ज़िला बडगाम के मागाम इलाके के लोगों ने नमाज़ पढ़ने के लिए एक ही मस्जिद को चुनकर इस भाईचारे की शानदार मिसाल पेश की है.
मागाम में शिया और सुन्नी समुदायों से संबंध रखने वाले सभी लोगों ने एक ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का इंतजाम किया.
एक साथ नमाज़...
यहां के लोग कहते हैं कि ये कदम उन्होंने दुनिया में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच बढ़ रहे तनाव के बाद इसलिए उठाया है कि कश्मीर की शिया और सुन्नी आबादी नफ़रत का शिकार न हो.
मागाम के आलीशान तीन मंज़िला जामा मस्जिद में शिया, सुन्नी और अन्य समुदायों से जुड़े सभी मुसलमान न सिर्फ एक साथ नमाज़ पढ़ते हैं, बल्कि आज कल एक साथ इफ्तार भी करते हैं.
स्थानीय शिया धर्म गुरु हामिद हुसैन मूसवी कहते हैं, 'ज़ाहिर है कश्मीर छोटी जगह है. हम नहीं कहते हैं कि हमने कोई बड़ा काम किया है. लेकिन एकता और भाईचारा का ये प्रदर्शन हमें बाहर से आने वाले नफ़रत के माहौल से सुरक्षित रख सकता है.'
इलाके के सुन्नी इमाम सैयद रियाज़ शिराज़ी का कहना है, 'अगर ये छोटी सी कोशिश केवल कश्मीर में ही शिया-सुन्नी एकता सुनिश्चित कर सके, तो यह मस्जिद पूरी दुनिया के लिए भाईचारे की मिसाल बन जाएगी.'
शिया आबादी...
स्थानीय लोग भी इस भाईचारे से खुश हैं.
मागाम के रहने वाले जावेद अब्बास कहते हैं कि उन्हें एहसास है कि मध्य पूर्व में जो कुछ हो रहा है, वह निकट भविष्य में कोई बड़ा तूफ़ान पैदा करने वाला है.
वे कहते हैं, 'हम नहीं चाहते कि यहाँ के लोग इस तूफ़ान का शिकार होकर एक दूसरे की गर्दनें काटें.'
जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर और जम्मू के कुछ इलाकों में शिया आबादी का अनुपात कुल मिलाकर दस फ़ीसदी है.
लेकिन जानकार कहते हैं कि शिया धर्म गुरुओं और प्रचारकों का कश्मीर के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
लद्दाख, करगिल और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर गिलगित, बाल्तिस्तान इलाके में शिया बहुमत में हैं.
एकता और भाईचारे का संदेश...
शिया नेता मौलाना अब्बास अंसारी और आग़ा हसन बडगामी अलगाववादी आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओं में से हैं.
गौरतलब है कि पिछले सत्ताईस साल से कश्मीर में मुहर्रम के जुलूस पर पाबंदी है और जब भी शिया लोग जुलूस निकालने की कोशिश करते हैं, तो पुलिस उन पर लाठीचार्ज करती है.
सुन्नी नेता यासीन मलिक शियाओं की महफ़िलों में हर साल शरीक होते हैं.
जानकारों का कहना है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनीतिक तनाव के कारण शिया-सुन्नी समुदायों के बीच जो तनाव बढ़ा है, मागाम की मस्जिद में होने वाला ये अनोखा प्रदर्शन इस तनाव के ख़िलाफ़ एकता और भाईचारे का संदेश देता है.
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