कर्नाटक: प्रेमी दलित, प्रेमिका मुस्लिम, प्रेमकथा का दर्दनाक अंत

कस्तूरबाई

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इमेज कैप्शन, कस्तूरबाई हत्या में इस्तेमाल किए गए पत्थरों को दिखाते हुए.
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, कर्नाटक से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

"उसके पेट में आठ महीने का बच्चा था और उन्होंने उसी पेट पर बड़े-बड़े पत्थर मारे. जब वो नहीं मरी तो वो उसे घर से बाहर खींच ले गए, पेट्रोल डाला और आग लगा दिया."

ये कर्नाटक के गांव में दलित से शादी करने के लिए ज़िंदा जला दी गई लड़की की मां के शब्द नहीं हैं. बल्कि ये उसकी सास कस्तूरीबाई के शब्द हैं जिनकी आंखों में अपनी अच्छी बहू को याद करते हुए आंसू आ गए.

कस्तूरीबाई बताती हैं कि उनकी बहू की जान उसकी सगी मां रमज़ान बी ने ही ले ली थी क्योंकि रमज़ान बी की बेटी बानू बेग़म ने कस्तूरीबाई के बेटे सायाबन्ना शरणप्पा से शादी कर ली थी.

विजयपुरा ज़िला मुख्यालय से 93 किलोमीटर दूर गुंडकनाला गांव में रहने वाली बानू और शरणप्पा बचपन से प्यार करते थे.

इस गांव में इस दर्दनाक हत्याकांड के बाद दलितों और मुसलमानों के बीच तनाव नहीं है. वहां से आने वाली एकमात्र अच्छी ख़बर यही है.

सायबन्ना

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इमेज कैप्शन, दलित युवक सायबन्ना ने एक मुसलमान लड़की से शादी की थी.

बानू और शरणप्पा का बचपन का प्यार जवानी में और फला-फूला. ये एक ख़ुशहाल कहानी हो सकती थी, लेकिन इसका अंत ऐसा हुआ कि जानने पर किसी के भी रोएँ सिहर जाएँ.

अपने आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए कस्तूरबाई बीते शनिवार की घटना को विस्तार से बताती हैं.

कस्तूरबाई अपनी छप्पर की झोपड़ी में लकड़ी के चूल्हे पर खाना बना रही थीं. शोर शराबा सुनकर वो अपने एक कमरे की छप्परवाली झोपड़ी से बाहर निकली तो देखा रमज़ान बी के बच्चे धारधार हथियार लेकर उसके बेटे का पीछा कर रहे थे.

वो दौड़कर खाली स्कूल की ओर गईं जहां उन्होंने अपनी बहू को छिपा रखा था. तब उन्हें समझ में आया कि बानू की मां की धमकी अब हकीकत बन गई है.

सड़क

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इमेज कैप्शन, बानू को यहीं जलाया गया था

"उन्होंने मेरा गला दबा दिया और मेरी बहू को खींचते हुए बाहर ले गए और इन पत्थरों से उसके पेट पर हमले किए."

ये पत्थर छोटे-से स्कूल के पास बन रहे एक मकान के निर्माण के लिए रखे गए थे. ये पत्थर के स्लैब तीन इंच मोटे और दो फ़ीट लंबे थे. गांव के घरों की दीवारें ऐसे ही पत्थरों से बनी हैं.

अपने सालों से बचकर भाग रहे सायबन्ना अपनी पत्नी को बचाने के लिए दौड़े, लेकिन तब ही उन्हें एहसास हुआ कि वे लोग उसकी जान लेने पर भी उतारू हैं.

सायबन्ना कहते हैं, "मैं बस अब अपनी गर्भवती पत्नी की मौत का बदला लेने के लिए ज़िंदा हूं."

कस्तूरबाई और सायबन्ना को कुछ गड़बड़ होने का शक़ हो जाना चाहिए था क्योंकि रमज़ानबाई के बच्चे गांव में इकट्ठा हो रहे थे, लेकिन वो स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगा पाए.

रमज़ानबी के परिजनों ने पड़ोसियों को भी दख़ल देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी.

पुलिस ने रमज़ानबी, सलीमा, अकबर और जिलानी को गिरफ़्तार कर लिया है. पुलिस रमज़ानबी की दो बेटियों और दो बेटों की तलाश कर रही है. अपने ही परिवार के हाथों मारी गई बानू की पांच बहनें और चार भाई हैं.

गांव में रमज़ानबी का पक्ष बताने के लिए कोई नहीं है. जो गिरफ़्तार हुए हैं वो न्यायिक हिरासत में हैं और परिवार के बाकी लोग फ़रार हैं.

विजयपुरा के पुलिस अधीक्षक कुलदीप कुमार जैन कहते हैं कि ये एक पूर्व-नियोजित हत्या थी.

रमज़ानबी और कस्तूरबाई पड़ोसी हैं. उन दोनों के घरों के बीच में सिर्फ़ तीन घर हैं.

कस्तूरबाई

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इमेज कैप्शन, अपने घर में कस्तूरबाई

कस्तूरबाई कहती हैं, "बचपन से ही बानू और मेरा बेटा साथ-साथ रहते थे. जब वो बड़ा हो रहा था तब मैंने उसे बानू से दूरी बनाने के लिए कहा क्योंकि वो दूसरे समुदाय से हैं. मैंने उसके लिए अपने ही समुदाय की एक लड़की देख भी ली थी, लेकिन उसने मुझसे कह दिया था कि वो सिर्फ़ बानू से ही शादी करेगा."

पेशे से ड्राइवर सायबन्ना और बानू घर से गोवा भाग गए थे. दोनों ने वहीं शादी की थी. वो दो साल बाद जब गांव लौटे तो उन्होंने सोचा था कि उनका स्वागत किया जाएगा.

बानू और सायबन्ना ने अपनी शादी का पंजीकरण भी कराया था, लेकिन उनके परिवार ने इसका कोई समारोह नहीं किया था. सायबन्ना के मुताबिक बानू का परिवार उन्हें अकसर धमकी दिया करता था.

कस्तूरबाई कहती हैं कि दोनों ही समुदायों का कोई भी पड़ोसी बानू को बचाने के लिए मदद करने आगे नहीं आया. कस्तूरबाई के पड़ोसी तो रमज़ानबी के बेटों की धमकी के बाद घर ही छोड़कर चले गए थे.

गुंडकला अपने आप में अलग गांव हैं. यहां दलितों की बस्ती गांव के कोने पर नहीं हैं. यहां ऊंची जाति के रेड्डी, दलित और मुसलमान सभी मिले-जुले घरों में रहते हैं.

गांव

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इस गांव में अरहर दाल, कपास और ज्वार की खेती सबसे ज़्यादा होती है. गांव के एक किसान शांतना गौड़ा कहते हैं कि "ये दो समुदायों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मामला है. एक परिवार दलित है और एक मुसलमान इससे क्या फ़र्क पड़ता है."

पेशे से मज़दूर सैयद कहते हैं, "दोनों ने शादी करने का फ़ैसला किया था. ये उनका निजी मामला है इसमें हमें कुछ नहीं कहना. वहां ना ही दलित गए और ना ही हमारे समुदाय के लोग क्योंकि ये दो परिवारों के बीच का झगड़ा था. इससे दोनों समुदायों के रिश्तों पर असर नहीं होगा."

कस्तूरबाई कहती हैं, "हम बहुत ग़रीब हैं. इसलिए हमारे साथ ऐसा हो गया. अगर कोई अमीर होता तो उसे आसपास से मदद ज़रूर मिल जाती. हम हार गए."

सायबन्ना कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि इस गांव में दलितों और मुसलमानों के बीच शादी नहीं हुई हो. मेरे चचेरे भाई ने मेरी पत्नी की बड़ी बहन से शादी की थी. वो कलबुर्गी ज़िले के सोरपुर में रहते हैं. वो नमाज़ पढ़ता है. हमने अपनी शादी का पंजीकरण करा लिया था, शायद इस वजह से ऐसा हुआ हो."

सायबन्ना कहते हैं, "मुझे अपने गांव लौटकर आने का बहुत दुख है."

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