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मोदी के तीन साल: विदेश दौरे तो बहुत किए, पर मिला क्या?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
हमने बीबीसी के पाठकों से पूछा था कि वो मोदी सरकार के तीन साल होने पर कामकाज के किन पहलुओं के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहेंगे. कई पाठकों ने विदेश नीति के बारे में बात की थी जिसके बाद बीबीसी संवाददाता ने उन्हीं सवालों के जवाब में ये रिपोर्ट तैयार की है.
विदेश नीति के मामले में पिछले तीन सालों में जो मोदी सरकार की सब से बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वही सरकार की नाकामी की ओर भी इशारा करती है.
चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते, विदेशी नीति के स्तर पर सफल रहे या विफल? ये एक अहम सवाल है.
मई के महीने में इसका नज़ारा दो अलग-अलग मौक़ों पर देखने को मिला.
एक ओर जहां हेग में भारत ने पाकिस्तान को "चारो खाने चित" कर दिया, दूसरा ओर बीजिंग में जहां चीन के नेतृत्व में "वन बेल्ट, वन रोड" विशाल प्रोजेक्ट पर हुई दो दिन की बैठक, जिसका भारत ने बहिष्कार किया.
राजनयिक रहे राजीव डोगरा कहते हैं, "एक तो कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान के ख़िलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में जाना एक महत्वपूर्ण क़दम साबित हुआ और दूसरा चीन के नेतृत्व में हुई 'वन बेल्ट, वन रोड' कॉन्फ्रेंस का संप्रभुता के सवाल पर बहिष्कार करना."
डोगरा के अनुसार मोदी की नीति थोड़ी अलग है. मोदी ने भारत के हितों की सुरक्षा पर अधिक काम किया है.
जेएनयू के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह भारत और चीन के रिश्तों पर गहरी नज़र रखते हैं. उनके अनुसार चीन से रिश्ते बिगड़े हैं और इसे प्रधानमंत्री की उपलब्धियों की श्रेणी में रखना सही नहीं होगा.
वे कहते हैं, "चीन और पाकिस्तान, दोनों के साथ आप देखें, तो हमारे रिश्ते पिछले कुछ दिनों से रोलर-कोस्टर राइड की तरह से चल रहे हैं. कभी तो एक दूसरे से गले मिलते हैं, तो कभी एक दूसरे से नाराज़ हो जाते हैं."
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "पिछले डेढ़-दो साल से चीन से भी रिश्ते उलझे हुए हैं. उसमें भारत के लिए सब से बड़ा मुद्दा इसकी न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप की सदस्यता का है. मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र के टेरर लिस्ट में लाने का है. 'चीन-पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर' के पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रने पर भारत का ऐतराज़ भी एक मुद्दा है, क्योंकि भारत उसे अपना एक अटूट हिस्सा मानता है"
चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना बड़ी है. नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान समेत दर्जनों देशों ने बीजिंग की "वन बेल्ट वन रोड" सभा में शिरकत की.
कांग्रेस पार्टी के मणिशंकर अय्यर उन लोगों में से हैं, जो मोदी की पाकिस्तान और चीन की पॉलिसी को नाकाम समझते हैं. उनके अनुसार भारत अलग-थलग हो गया है.
मणिशंकर अय्यर कहते हैं, "कांफ्रेंस में 68 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इतने सारे देश इसमें शामिल हुए. हम हो गए हैं अलग-थलग, क्योंकि चीन सारी दुनिया को समेट कर ले आया है. इसे सफल कैसे कह सकते हैं?"
उपलब्धियां
राहुल मिश्रा भारत के विदेश मंत्रालय में एक सलाहकार हैं.
उनके अनुसार मोदी की उपलब्धि अमरीका और जापान से दोस्ती में मज़बूती आई है.
राहुल कहते हैं, "मुझे लगता है कि अमरीका और जापान के साथ जो हमारे सम्बंध बेहतर हुए हैं और गुणात्मक सुधार आए हैं, वो मोदी सरकार की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है."
विदेशी मामलों के जानकर अतुल भारद्वाज कहते हैं कि "स्पष्टता" मोदी सरकार की विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि है, जिसके कारण अमरीका से रिश्ते पहले से काफी मज़बूत हुए हैं.
राहुल कहते हैं, "इस सरकार की नीति में स्पष्टता है. मोदी सरकार गुट निरपेक्षता के चक्कर में नहीं पड़ी है."
भारत के सॉफ्टर पावर को मज़बूत करने की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश में काफी काम किया है.
संयुक्त राष्ट्र से 2015 में विश्व योग दिवस की घोषणा कराना मोदी सरकार की एक उपलब्धि के तौर पर देखा गया है. भारत की छवि बेहतर करने में प्रवासी भारतीयों की मदद लेना भी मोदी की रणनीति का हिस्सा रहा है.
लेकिन कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर कहते हैं, "मोदी का नाम मिटटी में है चीन में. आमिर खान का नाम शिखर तक पहुंच चुका है. उनकी फ़िल्म दंगल ने चीन को दिखाया है कि हिंदुस्तान कर क्या सकता है."
ये भी एक अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि मई के जिस हफ्ते में चीन अपनी राजधानी में कांफ्रेंस करके और दुनिया भर के नेताओं को इकठ्ठा करके अपनी आर्थिक, कूटनीतिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था, उसी समय बॉलीवुड हिट दंगल ने चीन के लोगों का दिल जीत लिया था.
फ़िल्म की कामयाबी ये साबित कर चुकी है कि अगर चीन के पास आर्थिक पावर है, अमरीका के पास सैन्य शक्ति है, तो भारत के पास सॉफ्ट पावर है.
नाकामियां
कई विशेषज्ञों के अनुसार नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की सब से बड़ी नाकामी नेपाल से बिगड़ते रिश्ते हैं.
बीजिंग में वन बैल्ट वन रोड मुहीम को आगे बढ़ाने के चीन ने जो दो दिन की कांफ्रेंस बुलाई थी उस में नेपाल भी शामिल हुआ. नेपाल अब चीन की इस मुहीम में पूरी तरह से शामिल है.
कई विशेषज्ञों ने कहा कि अब ऐसा लगने लगा है कि नेपाल का झुकाव चीन की तरफ अधिक है जो भारत के लिए एक बड़ा झटका है.
मोदी सरकार नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ चीन के बढ़ते सम्बन्ध को केवल एक व्यापारिक सम्बन्ध मानती है.
प्रधानमंत्री मोदी ने इस महीने श्रीलंका के अपने दौरे में इस बात को उजागर किया था कि श्रीलंका के साथ भारत के रिश्ते सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक हैं जो सदयों पुराने हैं.
दोनों देशों के बीच रिश्तों को व्यापारिक रिश्तों से नहीं तोलना चाहिए. उन्होंने नेपाल के सन्दर्भ में भी ऐसे ही विचार प्रकट किये हैं.
वहीं नरेंद्र मोदी के समर्थक और विरोधी सभी इस बात पर सहमत हैं कि उनकी विदेश नीति में सब से बड़ी नाकामी पाकिस्तान और चीन से रिश्ते में सुधार लाने में नाकामी है.
आम चुनाव में भारी जीत के बाद शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ समेत पड़ोसी देश के सभी नेताओं को बुलाकर एक नया जोश पैदा किया था.
इसके बाद, एक-एक करके कई देशों का दौरा करके भारत के प्रोफ़ाइल को विश्वभर में बेहतर करने की कोशिश की थी. ऐसा लगने लगा था कि मोदी ने विदेश नीति में एक नई जान फूंक दी है.
लेकिन इसका कोई हासिल हुआ? स्वर्ण सिंह कहते हैं कि मोदी के दौरों के कुछ फ़ायदे नज़र आने वाले हैं. कुछ नज़र नहीं आने वाले हैं.
स्वर्ण सिंह कहते हैं, "मुझे लगता है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हाइपर एक्शन आया है. भारत की विजिबिलिटी बढ़ी है"
लेकिन इस जोश और इस रफ़्तार के बावजूद भारत अपने दो सब से अहम पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने में नाकाम रहा है.
मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि मोदी की विदेश नीति उस समय तक सफल नहीं कहलाएगी जब तक कि पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्ते बेहतर न हों.
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