You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'अस्तित्व ख़तरे में देख मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड लाया हलफ़नामा'
- Author, निखिल रंजन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तीन तलाक़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद और फ़ैसला सुनाए जाने के पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक हलफ़नामा दायर किया है. हलफ़नामे में पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि निकाहनामे में इस बात का ज़िक्र किया जाएगा कि तीन तलाक़ ना दिया जाए और सभी क़ाज़ियों को इसके लिए ज़रूरी निर्देश दिए जाएंगे.
अदालत में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने की मांग कर रहे संगठनों में शामिल भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ज़किया सोमन ने सीधे बोर्ड पर सवाल उठाया और कहा कि उसे इस मामले में हलफ़नामा देने का कोई हक़ नहीं है.
'हम खैरात नहीं मांग रहे'
ज़किया सोमन का कहना है, "हम कोई ख़ैरात नहीं मांग रहे हैं हम कोर्ट से अपना अधिकार मांग रहे हैं, संसद से अधिकार मांग रहे हैं. बोर्ड एक प्राइवेट इदारा है और इन्हें ये जताने की ज़रूरत नहीं कि भारत के सभी मुस्लिमों के रहनुमा यही हैं और सारे क़ाज़ी इनके ताबे (इनका आदेश मानने वाले) हैं. दूसरी बात ये है कि ज़्यादातर महिलाओँ के पास तो निकाहनामे की कॉपी भी नहीं होती."
ज़किया कहती हैं कि निकाहनामे में तो नाम पते के अलावा और कोई जानकारी नहीं रहती और फिर सारे क़ाज़ी बोर्ड की बात मानेंगे इसकी क्या गारंटी है?
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का ये भी कहना है कि अपना अस्तित्व ख़तरे में देख पर्सनल लॉ बोर्ड ये हलफ़नामा ले कर आया है. ज़किया सोमन का कहना है कि भारत में मुसलमानों के लिए भी दूसरे धर्मों की तरह ही शादी ब्याह के क़ानून बनाए जाने चाहिए.
संसद का दायित्व
उन्होंने कहा, "हमारे देश में जैसे हिंदू मैरिज एक्ट है, क्रिश्चियन मैरिज एंड सक्सेशन एक्ट है, उसी तर्ज़ पर मुसलमानों का भी एक फैमिली लॉ होना चाहिए, ये पार्लियामेंट का दायित्व है कि वो ये क़ानून पास करे."
उधर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि हलफ़नामे में कोई नई बात नहीं कही गई है इसका प्रावधान पहले से ही मौजूद था. बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारुक़ी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि कोर्ट से कोई बात कहने का यही एक तरीक़ा है इसलिए हलफ़नामा दिया गया. उनका ये भी कहना है कि पर्सनल लॉ बोर्ड ख़ुद ही इस बारे में क़दम बढ़ा रहा है और अदालत को इसमें दख़ल नहीं देना चाहिए.
कमाल फ़ारुक़ी का कहना है, "हमने पहले ही ये बात उठाई है. कोर्ट ने हमसे हमारी कार्रवाई का दस्तावेज़ी सबूत मांगा तो हमने उसे हलफ़नामे की शक्ल में उसका उर्दू और अंग्रेज़ी तर्जुमा कोर्ट में दाख़िल किया है. कोई नई बात नहीं की."
कमाल फ़ारुक़ी ने इस बात से भी इनकार किया कि बोर्ड इस मामले में अलग थलग पड़ गया है और उसे मुसलमानों का समर्थन हासिल नहीं है.
उन्होंने याद दिलाया कि बोर्ड की एक आवाज़ पर चार करोड़ से ज़्यादा लोगों ने दस्तख़त कर शरीया के प्रति आस्था जताई और इसमें दख़लंदाज़ी का विरोध किया. फ़ारुक़ी ने कहा, "मुझे तो समझ में नहीं आता कि किनारे कौन है?"
हलफ़नामा क्यों?
सुप्रीम कोर्ट के वकील सैफ़ महमूद भी मानते हैं कि हलफ़नामा भले ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिया गया हो लेकिन बोर्ड ने ये क़दम इस मुद्दे पर मचे बवाल को देख कर ही उठाया है.
सैफ़ महमूद ने बीबीसी से कहा, "अगर इस क़दर हंगामा ना होता और संविधान पीठ इस पर छुट्टियों में सुनवाई ना कर रही होती तो मुझे नहीं लगता कि बोर्ड ये हलफ़नामा देता. इससे साफ़ लगता है कि उनकी स्थिति कमज़ोर है."
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ख़ुद भी ये मान चुका है कि तीन तलाक़ की प्रथा उचित नहीं कही जा सकती और इस पर अमल करने वालों का सामाजिक बहिष्कार करने की सलाह देता है. सैफ़ महमूद सवाल उठाते हैं कि अगर इस पर अदालत क़ानून के ज़रिए रोक लगाती है तो बोर्ड इसका समर्थन क्यों नहीं करता.
सैफ़ महमूद ने कहा, "ये तो सत्तर बरस से सुन रहे हैं कि मुस्लिम बोर्ड कुछ कर रही है लेकिन हमें तो अब तक नज़र नहीं आया. मुझे ये समझ में नहीं आता कि अगर बोर्ड ख़ुद उसे ग़ैरइस्लामी मानता है, उसके ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास करता है, हलफ़नामा देता है तो फिर कोर्ट अगर उसे असंवैधानिक क़रार दे दे तो उसमें आपको समस्या क्या है?"
मुस्लिम महिलाएँ, सुप्रीम कोर्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इन सबका लक्ष्य तो एक ही है कि महिलाओँ के साथ ज़्यादाती ना हो. रिवाजों में सुधार के तरीक़ों पर सहमति शायद इस तकलीफ़ से महिलाओँ को निजात दिला सके.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)