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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हलफ़नामा, दूल्हों को तलाक़ ना देने की नसीहत
तीन तलाक़ के मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में नया हलफ़नामा दायर किया है.
ग़ौरतलब है कि 6 दिनों की सुनवाई के बाद 18 मई को तीन तलाक़ के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ख़त्म हुई थी. कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है.
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए 13 पन्ने के हलफ़नामे में बोर्ड ने बताया कि तीन तलाक़ की प्रथा को रोकने की कोशिश की जाएगी.
इस हलफ़नामे में बोर्ड ने कहा है कि वह अपनी वेबसाइट, विभिन्न प्रकाशनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए लोगों को एडवाइज़री जारी करेगा जिसमें निकाह कराने वालों को तीन तालक़ से संबंधित सुझाव दिए जाएंगे.
निकाह के वक़्त दूल्हे को सुझाव
हलफ़नामे में कहा गया है कि निकाह के वक़्त काज़ी दूल्हे को सुझाव देगा कि किसी तरह के मतभेद की सूरत में एक बार में तीन तलाक़ देने से बचा जाए क्योंकि शरीयत में इस प्रथा को पसंद नहीं किया जाता है.
साथ ही निकाह के समय काज़ी दूल्हा और दुल्हन को सुझाव देगा कि निकाहनामे में तीन बार बोलकर तलाक़ ना देने की शर्त रखी जाए.
हलफनामे में बोर्ड की 15 और 16 अप्रैल को हुई मीटिंग का हवाला देते हुए लिखा है कि बोर्ड की कार्यसमिति ने उस बैठक में कुछ प्रस्तावों को पारित किया था. जिसमें एक बार में तीन तलाक़ देने से बचने को कहा गया था.
पुराने हलफ़नामे का दिया हवाला
15 और 16 अप्रैल को लखनऊ में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यसमिति की बैठक में तलाक़ के मुद्दे को लेकर कुछ प्रस्ताव पास किए गए थे.
इस प्रस्ताव में कहा गया था, "तलाक़ को लेकर शरीयत का रुख़ एकदम साफ़ है. बिना किसी कारण तलाक़ देना और तीन बार तलाक़ बोलना तलाक़ देने का सही तरीक़ा नहीं है. इस तरह की प्रथा की शरीयत में घोर निंदा की गई है. इसके लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक बड़ा सार्वजनिक आंदोलन शुरू करेगा."
प्रस्ताव में आगे कहा गया था, "मुसलमानों के सभी तबकों ख़ासतौर से ग़रीब लोगों के बीच इस बारे में जागरूकता लाई जाएगी और मस्जिदों के इमामों और वार्ताकारों से इस मामले में मदद के लिए कहा जाएगा."
कार्यसमीति ने ये भी तय किया था कि वो लोग जिनके तीन तलाक़ देने से आगे समस्याएं खड़ी होती हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए. इस तरह का सामाजिक बहिष्कार से तलाक़ के मामले कम करने में मददगार होगा.
इसमें पति-पत्नी के लिए आचार संहिता जारी की गई थी जिसमें शरीयत के सिद्धांतो को ध्यान में रखते हुए इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि पति पत्नी के बीच विवाद परस्पर बातचीत से हल किया जाना चाहिए.
यदि आपस में बातचीत कर विवाद हल नहीं होता तो दोनों परिवार के बड़े सदस्यों को विवाद सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए. तब भी विवाद हल ना हो तो तलाक़ का सहारा लिया जाना चाहिए.
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