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नज़रिया: रामदेव सलवार सूट से राष्ट्रवादी बर्गर तक
- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दिलफरेब समय है. औद्योगिक घरानों के उत्पाद ख़रीदने के लिए प्रेरित करने वाले पंचलाइन आध्यात्मिक हो चले हैं.
योग गुरु बाबा रामदेव ने उद्योग में योग की खोज कर ली है. योग वहीं उद्योग के आख़िरी छोर में जाने कब से छिपा हुआ था कोई देख नहीं पा रहा था.
मुक्ति से ज़रूरी माया
वो महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के ज़रिए अपनी मुक्ति का रास्ता खोजने चले थे. रास्ते में उन्हें लगा कि मुक्ति से ज़रूरी माया है जिसके सही इस्तेमाल से एक पूरे देश को ग़रीबी से मुक्त किया जा सकता है.
मेड इन भारत
इसके लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता बस अपने उत्पादों पर "मेड इन भारत" लिखना होता है. अतः उन्होंने महर्षि को एक ब्रैंड में बदल दिया, फैक्ट्रियां लगा लीं और अब माया का टर्नओवर इतना हो चुका है कि वह पांच साल में मल्टीनेशनल कंपनियों को भारतभूमि से भगा देने का उद्घोष करते देखते हुए रेस्त्रां और स्कूल खोलने जा रहे हैं.
बाबा की आध्यात्मिक पहेली
जब आप ख़ुद बर्गर से लेकर ज्ञान और गोमूत्र तक का व्यापार करते हुए ख़ुद मल्टीनेशनल होना चाहते हैं फिर मल्टीनेशनल कंपनियों को भगाना क्यों चाहते हैं यह एक आध्यात्मिक पहेली है. विदेशी कंपनियां ऐसा क्या कर रहीं हैं जो देशी वाली नहीं करतीं?
आख़िर देशी कंपनियों की मिलावटखोरी और मक्कारी ने ही बाबा रामदेव को बनाया है. उन्होंने कम मिलावट और कुछ सस्ता से ही तो उपभोक्ताओं में विश्वसनीयता बनाई है.
तड़का योग
माया की यह चमत्कारिक तरक्की एक नए तरह के योग के अविष्कार के कारण संभव हो पाई है जिसे तड़का-योग कहा जाता है. राजनीति में मोदी युग से पहले तड़का भ्रष्टाचार का था जिसे रोमांचकारी बनाने के लिए वे दिल्ली के रामलीला मैदान में सलवार सूट पहने दिखाई दिए थे.
पीएम मोदी को राष्ट्रऋषि की उपाधि
इस बार तड़का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रऋषि की उपाधि देकर उन्होंने आध्यात्मिक परंपरा में लगाया है.
ऋषियों ने वसुधैव कुटुंबकम माना था, उनका चिंतन एक देश की हदबंदी में नहीं समाता था, वे समाज के बाहर जंगल में गए ही इसलिए थे कि ब्रह्मांड के साथ अपनी एकरूपता को महसूस कर सकें.
ऐसी ही राजर्षि की उपाधि बनारस के पंडितों ने एक और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को दी थी जो उनके पिछड़ों के लिए आरक्षण का क़ानून लागू करते ही गंगा में गिरने वाले किसी गंदे नाले में बह गई.
इस योग में अपनी दृष्टि चालू राजनीतिक मुहावरों पर स्थिर रखनी पड़ती है और उनका इस्तेमाल अपने व्यापार को दूसरों से पवित्र और महान बताने के लिए करना होता है.
हिन्दू राष्ट्र और गोमाता की हवा
बाक़ी चीज़ें गोल कर दी जाती हैं. जैसे इन दिनों हिंदू, राष्ट्र, गोमाता, सेना की हवा है तो व्यापार मुनाफ़े के लिए नहीं, इन सबकी सेवा के लिए किया जाएगा.
बाबा गर्व से बता रहे हैं कि वह सैनिक स्कूल खोलने वाले हैं जिसमें देश की रक्षा में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा दी जाएगी, इसका ज़िक्र नहीं होगा कि जीवित सैनिकों और सामान्य लोगों के बच्चों को शिक्षा किस भाव मिलेगी.
बाबा अपने व्यापार के विस्तार करके राष्ट्र को आर्थिक रूप से सबल बनाना चाहते हैं और उसके मुनाफ़े का एक हिस्सा गो-संवर्धन में खर्च किया जाएगा. अब जबकि बैलों का इस्तेमाल खेती में होना बंद हो चुका है, उनका क्या किया जाएगा इसका ज़िक्र नहीं होगा.
प्रतीकात्मक राजनीति
अगर बाक़ियों को पॉलीथिन खाने के लिए छोड़कर सिर्फ सौ पचास गायों का संवर्धन हुआ तो पुष्ट बैलों का इस्तेमाल गोरक्षकों के आगे नुमाइश के लिए किया जा सकता है जो प्रतीकात्मक राजनीति में बड़े काम आएगा.
इस व्यापार में सबसे काम का वह हिंदू कलर का भजन है जो बाबा ने उपाधि देते समय प्रधानमंत्री के आगे गाकर सुनाया. उसके बोल थे, "भगवान आर्यों को ऐसी लगन लगा दे. देश और धर्म की ख़ातिर मिटना इन्हें सिखा दे."
यह नहीं बताया कि अनार्यों, द्रविड़ों, म्लेच्छों के साथ घुलमिल कर कोई और नस्ल बन चुकी भारत की विशाल आबादी के साथ भगवान आख़िर क्या करें कि उनमें ऐसी लगन पैदा हो.
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