दादी कर रही है मॉडलिंग......

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- Author, गीता पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारतीय आर्टिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता जास्मीन पाथेजा को हमेशा से फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहती थीं.
इसलिए सालों पहले जब उनकी दादी इंद्रजीत कौर ने बताया कि वो एक एक्टर बनना चाहती थीं, तो दोनों ने एक दूसरे के सपने पूरा करने का फैसला किया.
और नतीजे के रूप में तस्वीरों का एक शानदार पोर्टफ़ोलियो 'इंद्री और मैं सामने' आया, जिसमें 85 साल की एक बुज़ुर्ग सुंदर कॉस्ट्यूम में दिखाई देती हैं.

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पाथेजा ने बीबीसी को बताया, "मैं ठीक ठीक तो नहीं बता सकती कि ये प्रोजेक्ट कब शुरू हुआ. शायद मैं तीन साल की रही होउंगी, तब शुरू हुआ होगा."
वो बचपन के उन दिनों की याद करती हैं जब तपती गर्मियों में वो स्कूल से कोलकाता घर वापस आती थीं.
वो बताती हैं, "हम एक बड़े संयुक्त परिवार में रहते थे. मेरी दादी दोपहर को कभी नहीं सोती थीं, इसलिए मैं उनके साथ खेलती हुई बड़ी हुई. मैं ये सुनते हुए बड़ी हुई कि वो एक डॉक्टर, एक नर्स, एक स्कूल टीचर या प्रधानमंत्री तक बन सकती थीं. और हर दोपहरी मैं इन किरदारों में एक हो जाया करती थी."
वो आगे जोड़ती हैं कि इस तरह उन्हें 'सपने देखने को बढ़ावा मिला.'

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इंद्रजीत कौर हाउसवाइफ़ थीं और द्वितीय विश्वयुद्ध की अनिश्चितता के चलते उनकी पढ़ाई छूट गई.
उनका जन्म बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था. जब जापान ने ब्रिटिश शासित भारत पर हमला किया तो नौ साल की उम्र में वो अपने परिवार के साथ लाहौर, जो कि अब पाकिस्तान में है, चली आईं.
पाथेजा के अनुसार, "वो कहतीं, काश! मुझे और पढ़ने का मौका मिलता. उन्हें और पढ़ाई का मौका न मिलने का अफ़सोस था. लेकिन उन्होंने इस कमी को पूरा किया क्योंकि उनमें बहुत जिज्ञासा और सीखने की ललक थी."

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पाथेजा कहती हैं, तस्वीरें ख़िंचवाने में उन्हें खुशी होती थी और कैमरे के सामने वो बेहद स्वाभाविक दिखती थीं.
पाथेजा के अनुसार, "कुछ साल पहले, एक दिन उन्होंने कहा, 'काश मैं एक एक्टर होती', मैंने कहा, ठीक है आप अभिनय करें और मैं आपकी तस्वीरें लूंगी."
और इस तरह 'इंद्री, द एक्टर' का जन्म हुआ.

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इंद्री जो जो बनने के सपने देखा करती थीं, उन किरदारों की योजना दादी पोती मिलकर बनाने लगीं.
पाथेजा कहती हैं, "इंद्री द एक्टर ने ड्रेस पहनने में तरह तरह के प्रयोग करने शुरू कर दिए."
हालांकि पाथेजा ने बताया, "एक चीज जो मुझे बिल्कुल साफ़ थी, वो ये कि मैं उन्हें अस्वभाविक नहीं बनाना चाहती थी."

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सालों से पाथेजा अपनी दादी को एक राजनीतिज्ञ, एक महारानी, एक परी, एक वैज्ञानिक और ऐसे ही दर्जनों क़िरदारों में बदलते देखा था.
वो बताती हैं कि इस 'कलेक्शन की पहली तस्वीर 2004 या 2005 में किसी समय ली गई थी और हज़ारों तस्वीरों के बाद अभी भी काम जारी है.'

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एक स्तर पर ये तस्वीरें दादी और पोती के बीच के संबंधों की बहुत निजी दास्तान हैं, ऐसी दो महिलाओं के संबंधों की दास्तान जो एक दूसरे के सपनों को साझा करना चाहती थीं.
लेकिन दूसरी तरफ़, ये बु़ढ़ापे और इच्छाओं की कहानी भी है, जो बुज़ुर्ग लोगों के एकाकी जीवन को चुनौती देती है और सवाल खड़े करती है.
पाथेजा कहती हैं, "हर कोई बूढ़ा हो रहा है, बुढ़ापा आना ही है. लेकिन मुद्दा, बुढ़ापा और एकाकीपन बनाम बुढ़ापा और कुछ कर गुजरने की चाहत के बीच का है."
उनके अनुसार, "हमें बुढ़ापा और इसके भविष्य, हमारे भविष्य के बारे में सोचने और इससे आगे देखने की ज़रूरत है. हमारा शरीर बदल जाएगा और हम उम्र के हाथों मज़बूर हो जाएंगे. इसलिए एक समाज के रूप में हमें ऐसा माहौल बनाने की ज़रूरत है जो हमारे बुजुर्ग होते शरीर को सक्षम बनाए न कि एकाकी होने के मज़बूर करे."

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वो कहती हैं कि इस प्रोजेक्ट को मिली प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक रही.
पाथेजा बताती हैं, "इसे अप्रैल की शुरुआत में प्रकाशित करने के बाद से बहुत सारी खासकर बुज़ुर्ग महिलाओं ने तारीफ़ में मुझे चिट्ठी लिखी. उन महिलाओं ने भी बहुत सराहना की जिन्हें अपने दादियों या पोतियों से बहुत लगाव हैं."
जब मैंने पाथेजा से इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के समय के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "यह तब तक चलेगा जबतक उनमें अभिनय करने की इच्छा रहेगी और मुझे तस्वीरें लेने की."












