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नज़रिया: जीतेंगे केजरीवाल या मोदी की ही रहेगी दिल्ली एमसीडी
- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की असाधारण जीत नहीं हुई होती तो आज आज दिल्ली नगर निगम के चुनावों का राष्ट्रीय महत्व नहीं होता.
इसी तरह हाल में अगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में असाधारण जीत नहीं मिली होती तो एमसीडी के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार सुनिश्चित मान ली जाती. एंटी इनकम्बैंसी बड़ी गहरी है.
फिर भी यहाँ पार्टी जीत गई तो इसका मतलब है कि काम नहीं मोदी का नाम बोलता है.
बीजेपी के पार्षदों के काम से जनता खुश नहीं रही. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अंदरूनी तौर पर बुरी तरह हिली हुई है. वह तो वैसे ही सिर झुकाकर हार मानने को तैयार नजर आती है.
पर पंजाब में कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद एमसीडी के चुनावों में उसकी उम्मीदें बंध गई हैं. राजौरी गार्डन की हार भी कांग्रेस को जीत जैसी खुशनुमा लगी, क्योंकि वह दूसरे नम्बर पर आ गई.
उसे अब लगता है कि आम आदमी पार्टी की घंटी बज गई है. उसका वोट अब कांग्रेस को मिलेगा.
एमसीडी में जीतने वाले के साथ-साथ दूसरे नम्बर पर रहना भी महत्वपूर्ण होगा. हो तो यह भी सकता है कि किसी को पूर्ण बहुमत न मिले?
फटाफट राजनीति
गोवा, पंजाब और राजौरी गार्डन में आम आदमी पार्टी की हार ने टी-20 क्रिकेट जैसी फटाफट राजनीति की झलक दिखाई है.
कहाँ तो सन 2015 में उम्मीद से कई गुना बड़ी जीत, और कहाँ जमानत जब्त. आम आदमी पार्टी बड़ी उम्मीदें लेकर एमसीडी चुनाव में उतरी थी, पर पहली सीढ़ी में ही धड़ाम होने का अंदेशा खड़ा हो गया है.
चुनाव दो-तरफ़ा नहीं, तीन-तरफ़ा हो गया है.
तीन कोने के चुनाव जोखिम भरे होते हैं. पार्टियों का जोड़-घटाना अपने पक्ष में पड़ने वाले वोटों से ज्यादा खिलाफ पड़ने वाले वोटों पर भी निर्भर करता है.
अरविंद केजरीवाल ने चुनाव के ठीक पहले दिल्ली के भाजपा-विरोधी वोटरों से अपील की है कि वे अपना वोट कांग्रेस को देकर उसे बरबाद न करें. यह वैसी ही अपील है जैसी उत्तर प्रदेश के मुसलमान वोटरों से की थी कि वे भाजपा को हराना चाहते हैं तो अपना वोट बँटने न दें.
केजरीवाल को यकीन है कि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई तो उन्हें एमसीडी की 272 सीटों में 200 से ज्यादा सीटें मिलेंगी.
इस उम्मीद के साथ जुड़ी शर्त, कुछ अंदेशों की ओर इशारा कर रही है. इसके पीछे केजरीवाल का भय भी बोल रहा है. राजौरी गार्डन की हार ने पार्टी के आत्मविश्वास को कहीं तो हिलाया ही है.
हालांकि, मुकाबला त्रिकोणीय है, पर दिल्ली के आकाश पर स्वराज्य पार्टी के रूप में एक नया राजनीतिक दल भी उभर कर आया है.
2 अक्टूबर 2016 को बनी यह पार्टी आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोधों की देन है. इस चुनाव में उसकी क्या भूमिका होगी, इसे लेकर अभी कयास ही लगाए जा सकते हैं.
लोकलुभावन वायदे
भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों के चुनाव घोषणापत्र लोकलुभावन राजनीति के बेहतरीन दस्तावेजों के रूप में सामने आए हैं. तीनों पार्टियाँ जनता पर टैक्स निछावर करने का वायदा लेकर सामने आईं हैं.
आम आदमी पार्टी तो दिल्ली को साफ करने के साथ-साथ हाउस टैक्स भी साफ करने का वादा कर रही है.
वहीं बीजेपी और कांग्रेस कोई नया टैक्स नहीं लगाने और जो टैक्स हैं उन्हें और कम कर देने का वादा कर रहे हैं.
हालांकि, बीजेपी की सरकार केन्द्र में लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई है, पर उसने एमसीडी के भ्रष्टाचार की निगरानी के लिए ओम्बुड्समैन (लोकपाल) की नियुक्ति का वायदा किया है.
कांग्रेस पार्टी समयबद्ध सेवाओं की गारंटी दे रही है और कहा है कि समय पर काम न करने वाले कर्मचारियों पर जुर्माना लगाया जाएगा.
राजनीतिक असंतुलन
पिछले तीन साल में दिल्ली की राजनीति में असाधारण किस्म का असंतुलन देखने को मिला है. एक तरफ यहाँ के सातों सांसद बीजेपी के हैं, वहीं विधानसभा में 70 में से 67 सदस्य आम आदमी पार्टी के जीतकर आए.
लम्बे अरसे से एमसीडी पर भाजपा का कब्जा है और पार्टी के पार्षदों पर तमाम किस्म के आरोप हैं. इसीलिए पार्टी ने पुराने पार्षदों को टिकट नहीं दिए.
पार्टी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने हाल में कहा कि हमारे पार्षद लोगों तक हमारे काम का संदेश पहुँचा नहीं पाए.
एमसीडी पर लगे आरोपों के जवाब में भाजपा दिल्ली सरकार की ओर इशारा करती है. कूड़े के ढेर इसलिए हैं, क्योंकि दिल्ली सरकार पैसा नहीं देती. पानी की सप्लाई जल बोर्ड करता है, जो दिल्ली सरकार के नियंत्रण में है. उधर दिल्ली सरकार कहती है कि हमें केंद्र सरकार काम नहीं करने देती.
बिजली और माफी के बिलों की माफी के कारण आम आदमी पार्टी को पसंद करने वाले भी हैं. स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा में भी सुधार हुआ है. पार्टी एमसीडी में भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही है.
बीजेपी ने आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोधों का लाभ लेने की रणनीति बनाई है. 'आप' के विधायकों के खिलाफ मुकदमों की झड़ी लग गई है. पार्टी के 21 विधायकों को लाभ के पद दिए जाने के मामले में चुनाव आयोग का फैसला भी अब जल्द आने वाला है.
कांग्रेस भी परेशान
कांग्रेस पार्टी भी परेशानियों से घिरी है. एमसीडी चुनाव के ठीक पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में चले गए. लवली को दिल्ली कांग्रेस का काफी समझदार नेता माना जाता था.
कांग्रेस के पुराने नेताओं का बड़ा तबका पार्टी नेतृत्व से नाराज है. एमसीडी चुनाव में टिकटों के वितरण को लेकर वरिष्ठ नेता एके वालिया ने हाल में जो गम्भीर आरोप लगाए थे, वे बगावत का संकेत है.
बीजेपी के लिए ये 'आँधी के आम' हैं. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों का कमजोर होना उसके लिए खुशखबरी है. फिलहाल इंतजार करें. बीजेपी के ख्वाब पूरे होते भी हैं या नहीं.
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