क्या मोदी राज में गहरा रहा है कश्मीर संकट?

इमेज स्रोत, EPA
- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
रविवार को भारत प्रशासित कश्मीर में हुए उप चुनावों में हिंसा और बहुत कम वोटिंग से हालात काफी गंभीर नज़र आ रहे हैं.
भारत प्रशासित कश्मीर की श्रीनगर लोकसभा सीट पर रविवार को हुए उपचुनाव में सिर्फ़ 7.1 प्रतिशत वोटिंग हुई.
मतदान के दौरान हुए हिंसक प्रदर्शनों में आठ लोग मारे गए.
घाटी में चुनावों के दौरान अलगाववादी नेता बहिष्कार के आह्वान करते रहे हैं लेकिन इस बार जैसा देखने में आया है, वो भारत सरकार के लिए चिंता की बात है.

इमेज स्रोत, EPA
'मोदी सरकार से नाउम्मीदी'
घाटी में 2016 का प्रदर्शन पूरी दुनिया देख चुकी है. महीनों चले प्रदर्शनों में क़रीब 90 लोग मारे गए.
इस दौरान लंबी हड़तालें हुईं और सारा कामकाज ठप हो गया.
लेकिन इसके बाद कश्मीर मुद्दे को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई.
अगर देखें तो आजतक जो भी सरकारें दिल्ली में आईं, उन्होंने आगे बढ़ने वाले कुछ न कुछ क़दम ज़रूर उठाया, चाहे नियंत्रण रेखा पर आवागमन खोलना हो, सीमापार व्यापार की इजाज़त देनी हो या पाकिस्तान से वार्ता की बात हो.
लेकिन जब से दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, कश्मीर मुद्दे को लेकर मोदी सरकार की ओर से कोई भी पहल नहीं की गई है.
इन मुद्दों के अलावा पूरे देश में जो माहौल है उसे लेकर भी कश्मीर में लोग एक किस्म की असुरक्षा महसूस कर रहे हैं.
प्रदर्शनों में उबाल

इमेज स्रोत, AFP
उन्हें लगता है कि भारत सरकार कश्मीर के मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर रही है और कश्मीरियों की आकांक्षाओं और राजनीतिक मांगों को लेकर वो गंभीर नहीं है.
इसे लेकर कश्मीर के नौजवानों में बहुत गुस्सा है.
ये गुस्सा हमने 2016 के प्रदर्शनों में देखा, बाद में हमें लगा कि ये अब ठंडा पड़ चुका है लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
सात आठ महीने के प्रदर्शनों के बाद थोड़ी सी थकान आ गई थी लेकिन अब लगता है कि इसमें फिर से उबाल आ रहा है.
लोग एक बार फिर बाहर निकल रहे हैं, अपना गुस्सा दिखाने के लिए.
जितनी कम वोटिंग हुई है, उससे जिस भी नुमाइंदे का चुनाव होगा, वो एक किस्म का लोकतंत्र का मज़ाक ही होगा.
सात प्रतिशत लोगों ने वोट किया और 93 प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं दिया.
जम्मू कश्मीर से लेकर दिल्ली तक लोगों को सोचना होगा कि ऐसे कैसे हुआ.
बुरे दिनों जैसे हालात

इमेज स्रोत, AFP
90 के दशक में जबसे चरमपंथ की शुरुआत हुई, हमने चुनावों में और बुरे दिन देखे हैं.
1996 का चुनाव सबसे मुश्किल चुनावों में से एक था. उस वक़्त भी हिंसा हुई, कहीं ग्रेनेड फटा कहीं गोली चली.
लेकिन इस बार की हिंसा उससे अलग थी. आम लोग अपने घरों से बाहर निकल रहे थे, उनके पास कोई हथियार नहीं था.
वो चुनाव का बहिष्कार करने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे.
महज 7.1 प्रतिशत वोटिंग के बाद जो भी व्यक्ति चुन कर आएगा, उसको ये दावा करने का नैतिक हक़ नहीं होगा कि उसे लोगों ने चुना है.
आने वाले दिनों में बहुत नाउम्मीदी दिख रही है.
नौजवानों में गुस्सा

इमेज स्रोत, AFP
आशंकाओं की सबसे बड़ी वजह ये है कि किसी भी मुद्दे को लेकर कोई पहल नहीं की जा रही है.
सड़कों पर जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और मर रहे हैं वो नौजवान हैं, 17-17, 18-18 साल के. आखिर उनमें क्यों गुस्सा है?
उनके पास हथियार नहीं हैं, लेकिन वो मरने के लिए तैयार हैं. ऐसे में लगता है कि उनमें कहीं न कहीं नाराज़गी है और गुस्सा भी.
अगर वाकई कश्मीर को बचाना है तो राज्य और केंद्र की सरकार को कश्मीर के युवाओं को राजनीतिक बातचीत में शामिल करने पर गंभीरता से सोचना होगा.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












