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'मनहूस' सीएम हाउस में एक और मुख्यमंत्री
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत 28 तारीख को देहरादून स्थित मुख्यमंत्री आवास में शिफ़्ट हो गए.
ख़ास बात ये है कि इस सीएम हाउस को राजनीतिक हलकों में 'मनहूस' माना जाता है.
पुराने सर्किट हाउस के स्थान पर मुख्यमंत्री का ये नया बंगला 2008 के अंत में तैयार हुआ था और राज्य के चौथे मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी 2009 की शुरुआत में इसमें रहने आ गए थे.
लेकिन इसमें शिफ़्ट होने के कुछ ही महीनों बाद करीब ढाई साल के कार्यकाल के बाद उनकी जगह डॉ रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों में सत्ता आ गयी.
मुख्यमंत्री बनने के बाद निशंक ने भी इसी बंगले को अपना ठिकाना बनाया लेकिन वह भी दो साल से अधिक पद पर नहीं रह पाए. चुनाव से छह महीने पहले फिर खंडूड़ी मुख्यमंत्री बन गए.
इसके बाद हुए चुनाव में बीजेपी की हार हुई और कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा.
बहुगुणा भी इसी बंगले में रहे लेकिन दो साल में ही आपदा राहत घोटाले के बाद उन्हें भी अपनी सीट खाली करनी पड़ी.
उसके बाद मुख्यमंत्री बने हरीश रावत कभी इस बंगले में शिफ़्ट ही नहीं हुए. करीब तीन साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल में हरीश रावत बीजापुर गेस्ट-हाउस में ही रहे.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास की वजह से वह बंगले में शिफ़्ट नहीं हुए.
हरीश रावत कहते हैं, "अगर वह बंगला खाली होता तो मैं उसी में शिफ़्ट हो जाता लेकिन विजय बहुगुणा जी उसमें रह रहे थे और उन्हें खाली करने के लिए कहना ठीक नहीं लगा. फिर केदारनाथ आपदा राहत को लेकर एक सवाल के जवाब में मैंने कह दिया था कि जब तक वह सुचारू नहीं हो जाती, मैं यहीं (बीजापुर गेस्ट हाउस में) रहूंगा. और यात्रा सुचारु होने में उम्मीद से ज़्यादा समय लग गया."
केदारनाथ यात्रा 2016 में सुचारू होने के बाद भी रावत सीएम हाउस में शिफ़्ट नहीं हुए और इससे उन अफ़वाहों को बल मिला कि ये बंगला मनहूस है.
लेकिन नए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस 'मनहूस' बंगले से कोई डर नहीं लगा. बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्हें धर्म पर विश्वास तो है लेकिन अंधविश्वास नहीं.
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा, "अंधविश्वास पर यकीन नहीं करते हम लोग. जो होना होता है, जो प्रभु की इच्छा होती है वही होता है."
हालांकि सरकार के दो मंत्री अपना पदभार संभालने के दस और ग्यारह दिन बाद क्रमशः नवरात्र के पहले और दूसरे दिन पूजा-अर्चना के बाद अपनी कुर्सी पर बैठे थे. मुख्यमंत्री ने भी गृह प्रवेश के लिए नवरात्र का ही पहला दिन चुना.
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान की विभागाध्यक्ष अनुसूया नौटियाल कहती हैं कि बंगले की मनहूसियस से मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पूरा न होने का कोई संबंध नहीं है. वह कहती हैं कि प्रचंड बहुमत वाली सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जनता और पार्टी दोनों को साधना होगा.
वह कहती हैं, "मुख्यमंत्री तो वह बन गए हैं अब उन्हें काम करके दिखाना होगा. काम नहीं करेंगे तो बीजेपी के अंदर से ही उन्हें चुनौती मिल सकती है क्योंकि पार्टी में बहुत से महत्वाकांक्षी नेता हैं."
नौटियाल ये भी याद दिलाती हैं कि मुख्यमंत्री बदलना भाजपा की कार्यशैली है. राज्य बनने के बाद पहले सवा एक साल में ही पार्टी ने मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को कुर्सी पर बैठा दिया था. और फिर अगली बार सत्ता में आने पर खंडूड़ी की जगह निशंक और फिर निशंक की जगह खंडूड़ी को बैठाया गया था.
त्रिवेंद्र रावत से पहले राज्य के आठ मुख्यमंत्रियों (खंडूड़ी एक ही विधानसभा कार्यकाल में दो बार बने थे) में से सिर्फ़ नारायण दत्त तिवारी ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाए थे.
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