You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अमित शाह के करीब माने जाते हैं त्रिवेंद्र सिंह रावत
- Author, शिव जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद के लिए चुन लिया है. शपथ समारोह 18 मार्च को होगा.
उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया है और उसे 57 सीटें मिली हैं. लेकिन मुख्यमंत्री का नाम तय करने में कमोबेश कई दिन लग गए.
त्रिवेंद्र सिंह रावत के बारे में राज्य से बाहर कम ही लोग जानते होंगे.
मुख्यमंत्री की दौड़ में उनका नाम भी उस तेज़ी से नहीं उछला था जिस तरह से लोग सतपाल महाराज का नाम ले रहे थे. हालांकि अब उनके नाम की औपचारिक घोषणा हो चुकी है.
त्रिवेंद्र सिंह रावत के बारे में वो बातें जो आप जानना चाहेंगे.
त्रिवेद्र सिंह संघ के खांटी कार्यकर्ता रहे हैं. 1983 से 2002 तक वो आरएसएस के प्रचारक रहे.
रावत 2002 में प्रदेश में बीजेपी के संगठन सचिव बने.
2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में वो देहरादून की डोईवाला विधानसभा सीट से विधायक बने थे.
2007 में बीजेपी की सरकार के दौरान कृषि मंत्री रह चुके हैं. उसी दौरान बीज घोटाले में भी तत्कालीन विपक्षी कांग्रेस ने उनका नाम भी उछाला. 2012 में आई कांग्रेस सरकार लेकिन उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं जुटा पाई.
2012 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ से बाहर होना पड़ा, उस समय उन्हें झारखंड का प्रभारी बनाया गया और बीजेपी के केंद्रीय संगठन में राष्ट्रीय सचिव बने.
रावत इतिहास में एमए हैं, पत्रकारिता के डिप्लोमाधारी भी हैं लेकिन फिलवक्त उनकी सबसे बड़ी योग्यता ये भी है कि वो संघ के निष्ठावाना कार्यकर्ता माने जाते हैं. चर्चा ये भी है कि वो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के करीबी हैं.
एक दौर में वो पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी के भी करीबी माने जाते थे. लेकिन 2014 के बाद माना जाता है कि रावत तेजी से पार्टी आलाकमान खासकर अमित शाह के नजदीकी बने.
56 साल के त्रिवेंद्र सिंह रावत मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं. जाति से क्षत्रिय, रावत ने कांग्रेस के हीरासिंह बिष्ट को हराकर देहरादून की डोईवाला सीट से चुनाव जीता है. नतीजे आने के साथ ही उनका नाम सीएम पद के लिए सियासी गलियारों मे चल पड़ा था.
रावत मृदुभाषी हैं, बहुत ज़्यादा खबरों में बने रहने से बचते हैं. प्रदेश संगठन और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच उनका सम्मान है और पार्टी में हमेशा उनका एक बड़ा ग्रुप रहा है.
जिस तरह नतीजे आने के बाद से ही उनके समर्थकों ने सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक उनके समर्थन में नारेबाजी और एक तरह से अभियान ही छेड़ दिया था, उससे पता चलता है कि चुपचाप से रनहे वाले रावत की गोटियां कितनी मजबूत और निशाने पर रही हैं.
उठापटक वाला इतिहास
मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सतपाल महाराज, पूर्व मुख्य मंत्री भगतसिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक और पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत का नाम चल रहा था.
इसके अलावा पार्टी प्रवक्ता अनिल बलूनी, प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और पूर्व विधानसभा स्पीकर प्रकाश पंत भी दौड़ में शामिल माने जा रहे थे.
भारतीय जनता पार्टी ने नवंबर 2000 में उत्तराखंड में अंतरिम सरकार बनाई थी. तब नित्यानंद स्वामी मुख्यमंत्री बनाए गए थे.
लेकिन भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक खेमों ने इसका ज़बरदस्त विरोध किया था. राज्य के पहले विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले स्वामी को अपनी कुर्सी, कोश्यारी को सौंपनी पड़ी थी.
इसके बाद 2007 में भी भाजपा की सरकार बनी, जनरल बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बनाए गए थे.
रमेश पोखरियाल निशंक ने दो साल के अंदर ही उन्हें चलता कर दिया और खुद वह कुर्सी ले ली.
खंडूरी ने 2012 में ऐन चुनाव से पहले पलटवार किया और कुर्सी पर फिर से काबिज़ हुए.
यह सिलसिला 2012 में कांग्रेस ने भी दोहराया और विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने.
इस तरह, सिर्फ़ कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ही पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सके थे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)