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नज़रिया: ऐसे बचाया जा सकेगा गंगा को?
गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए भारत की एक अदालत ने इसे क़ानूनन 'इंसान' का दर्जा देने की घोषणा की है. विज़न इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च असोसिएट श्याम कृष्णकुमार बताते हैं कि इस फ़ैसले से गंगा को बचाने में काफी मदद मिल सकती है.
भारत के 50 करोड़ लोगों के जीवनरेखा गंगा को बचाने के लिए चल रही क़ानूनी जंग में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कई अहम आदेश दिए हैं जिनमें से एक है गंगा और यमुना को 'मानव' या 'इंसान' का दर्जा दिए जाने की घोषणा.
इसके बाद हुई एक सुनवाई में कोर्ट ने गंगा और यमुना के जन्मस्थान गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियर, इन जगहों या नदियों से निकलने वाली छोटी नदियों, झरनों, झीलों, आस-पास के मैदान, जंगल, जंगल की ज़मीन को भी समान दर्जा देने की बात की है.
इस फ़ैसले के बाद अब प्रकृति को एक संपदा की तरह नहीं बल्कि एक इंसान की तरह देखा जाएगा जिसके कुछ मूल अधिकार होंगे.
कोर्ट के फ़ैसले से पहले प्रकृति को ऐसी संपदा माना गया था जिसके खुद के कोई क़ानूनी अधिकार नहीं हैं. पर्यावरण संबंधी क़ानून केवल इसके दोहन पर लगाम लगाते थे, लेकिन अब देश विदेश में प्राकृतिक संपदा के मूल अधिकारों को मान्यता देने की कोशिशें हो रही हैं.
इक्वाडोर में नए संविधान के अनुसार प्रकृति के जिंदा रहने, स्वस्थ्य रहने और संतान पैदा करने यानी बढ़ने का अधिकार है. न्यूज़ीलैंड ने हाल में माओरी लोगों के 140 सालों की क़ानूनी लड़ाई को ख़त्म करते हुए वांगानूई नदी को इंसान का दर्ज़ा दिया था.
क़ानूनी दर्जा मिलने के बाद अब इस मामले में उस संपदा की ओर से क़ानून का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है. पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में ये एक अहम कदम है.
उदाहरण के तौर पर अब कोर्ट में ये साबित करना ज़रूरी नहीं होगा कि गंगा को प्रदूषित करने से इंसानों को ख़तरा है. इसके प्रदूषण को इसके 'जीने के अधिकार' को चुनौती देने वाला मान कर कोर्ट में मामला ले जाया जा सकता है.
इसके साथ ही कोर्ट ने उत्तराखंड में नए माइनिंग लाइसेंस देने पर चार महीनों की रोक लगा दी है और हिमालय के इलाके में इससे होने वाले नुक़सान की जानकारी जुटाने के लिए एक कमिटी का गठन किया है.
उत्तरखंड सरकार इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी कर रही है.
लेकिन मामला केवल माइनिंग का नहीं है. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसमें कूड़ा फेंकने वाले होटलों, कंपनियों और आश्रमों को भी बंद करने का आदेश दिया है. इस आदेश का असर हरिद्वार और ऋशिकेष के 700 होटलों पर पड़ सकता है.
हालांकि इस आदेश में ये बातें स्पष्ट नहीं हो पाई हैं कि - एक नदी के लिए 'जीवन के अधिकार' के क्या मायने हैं? अगर इसका तात्पर्य स्वच्छंद बहने से है तो गंगा पर बने बांधों का क्या?
साथ ही इस आदेश को लागू करना भी एक बड़ा मुद्दा है. ये आदेश केवल उत्तराखंड में ही लागू होगा या पूरे भारत में इसे लागू किया जाएगा?
चूंकि नदी के विधिक संरक्षक यानी लीगल गार्जियन सरकारी कर्मचारी होंगे, तो क्या वो नहर की सफाई करने में होने वाले प्रदूषण जैसे सरकारी कदम के लिए सरकार के विरोध में खड़े करेंगे? क्या कोई नागरिक गंगा का प्रतिनिधित्व करते हुए कोर्ट में जा सकता है?
यदि इन सवालों का जवाब हां है तो, पर्यावरण सुरक्षा के लिए लोगों और समाजसेवकों के लिए ये एक महत्वपूर्ण आदेश साबित होगा.
साथ ही इस फ़ैसले को ना सिर्फ क़ानून की नज़र से देखे जाने की ज़रूरत है, बल्कि हिंदू परंपराओं के नज़रिए से देखे जाने की ज़रूरत जिसके अनुसार प्रकृति को देवी-देवता के रूप में भी देखा जाता है.
इस परंपरा के अनुसार नदी, जानवरों और पृथ्वी को एक ख़ास रूप में देखा जाता है. देवी-देवताओं को इंसान का दर्जा दिए जाने से लोग भावनात्मक तौर पर उनसे जुड़ते हैं और इससे जु़ड़ी सामाजिक रस्में निभाते हैं.
इन देवी-देवताओं की पवित्रता और ज़रूरत के बारे जानकारी कहानियों के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती हैं.
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार गंगा व्यक्ति के पाप धोती है और सैंकड़ों सालों से मानव जीवन को चलाने वाली 'गंगा माता' के रूप में पूजी जाती है. गंगा के तट पर होने वाली गंगा आरती और कुम्भ मेला इसी का उदाहरण है.
तो क्या नदियों, पेड़ों या जानवरों को देवी-देवता का दर्जा देना या उनकी पूजा करना उन्हें बचाने का रास्ता हो सकती है? कई मौकों पर ऐसा सही लगता है.
1970 के 'चिपको' आंदोलन के दौरान पेड़ों की पूजा करने वाली आदिवासी महिलाओं ने इनसे लिपटकर इन्हें कटने से रोका था.
हाल में सिक्किम भारत का पूरी तरह से ऑर्गेनिक खेती करने वाली पहला राज्य बना. 10 साल से भी कम समय में यह हो सकी क्योंकि लोगों ने पाया कि ऑर्गैनिक खेती उनकी परंपरा को ही आगे बढ़ा रही है.
गंगा आरती के ज़रिए आयोजक गंगा के प्रदूषण के बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिशें कर रहे हैं ताकि इसे साफ़ रखा जा सके.
पर्यावरण की सुरक्षा को यदि परंपरागत मायने मिल जाएं तो इससे समुदाय भी इसके साथ जुड़ जाते है. और इस तरह हाई कोर्ट का ये आदेश स्वागतयोग्य कदम है.
(श्याम कृष्णकुमार विज़न इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च असोसिएट हैं और अनादी फाउंडेशन के सदस्य हैं.)