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क्या है कि नारद स्टिंग मसला जिससे बढ़ेंगी ममता की मुश्किलें?
- Author, पीएम तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
बीते साल विधानसभा चुनावों से एक पखवाड़े पहले सामने आया नारद न्यूज़ का स्टिंग वीडियो पश्चिम बंगाल सरकार और तृणमूल कांग्रेस के लिए गले की फांस बन सकता है. राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है.
हाईकोर्ट ने बीते शुक्रवार को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था.
तब अदालत ने उसे 72 घंटे की भीतर प्राथमिक जांच रिपोर्ट जमा करने और जरूरी होने पर प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश भी दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह समयसीमा बढ़ा कर 30 दिन कर दी है.
सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की फौज खड़ी करने के बावजूद कामयाबी नहीं मिलने के बाद, अब राज्य सरकार और पार्टी इस मुद्दे से निपटने की नई रणनीति बनाने में जुट गई है. हाईकोर्ट के फैसले को पक्षपातपूर्ण बताने के लिए राज्य सरकार को माफी भी मांगनी पड़ सकती है.
यह महज़ संयोग है कि उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों के चुनावों में भाजपा की भारी जीत के बाद साल भर पुराने इस मामले की सीबीआई जांच का फैसला आया है. अब तक राज्य पुलिस का ख़ुफ़िया विभाग इसकी जांच कर रहा था.
यह बात अलग है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी इसे महज़ संयोग नहीं मानते. ममता शुरू से ही इस स्टिंग आपरेशन को एक राजनीतिक साज़िश करार देती रही हैं. उनका आरोप है कि इस स्टिंग वीडियो को भाजपा के दफ्तर से जारी किया गया था.
क्या है मामला?
बीते साल मार्च में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले नारद न्यूज़ के सीईओ मैथ्यू सैमुएल ने एक स्टिंग वीडियो जारी कर बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी थी. इस वीडियो में वे एक कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर तृणमूल कांग्रेस के सात सांसदों, तीन मंत्रियों और कोलकाता नगर निगम के मेयर शोभन चटर्जी को काम कराने के एवज़ में मोटी रकम देते नज़र आ रहे थे.
इस स्टिंग वीडियो ने जहां विपक्ष को ममता बनर्जी और उनकी सरकार के ख़िलाफ़ एक मज़बूत हथियार सौंप दिया वहीं ममता और उनकी पार्टी इसे राजनीतिक साज़िश करार देती रही. तब उनकी आवाज़ ऊंची थी. लेकिन अब हाईकोर्ट के सीबीआई से जांच के फैसले और फिर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर मुहर लगाने के बाद सरकार और तृणमूल कांग्रेस के स्वर नरम हो गए हैं.
एक दर्जन सांसदो और मंत्रियों से मुलाक़ात
इस स्टिंग ऑपरेशन के लिए मैथ्यू सैमुएल एक कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर तृणमूल कांग्रेस के एक दर्जन सांसदों, नेताओं और मंत्रियों से मुलाक़ात कर उनको काम कराने के एवज़ में पैसे दिए.
वीडियो में नज़र आने वाले नेताओं में मुकुल राय, सुब्रत मुखर्जी, सुल्तान अहमद, शुभेंदु अधिकारी, काकोली घोष दस्तीदार, प्रसून बनर्जी, शोभन चटर्जी, मदन मित्र, इक़बाल अहमद और फिरहाद हकीम शामिल थे. उनके अलावा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एम.एच. अहदम मिर्ज़ा को भी पैसे लेते दिखाया गया था.
विपक्ष ने चुनावों में इसे बड़ा मुद्दा बनाया था. बावजूद इसके तृणमूल कांग्रेस को भारी कामयाबी मिली थी. दूसरी ओर, वीडियो को फ़र्ज़ी और इस पूरे मामले को साज़िश करार देने वाली ममता सरकार ने उल्टे मैथ्यू के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कर उनको पूछताछ के लिए समन भेज दिया.
बाद में कोलकाता हाईकोर्ट से मैथ्यू को राहत मिली. फोरेंसिक जांच में उस वीडियो को सही पाया गया था. अब साल भर बाद अचानक अदालती फैसले से जिन्न बोतल से बाहर निकल आया है. अब वीडियो में नजर आने वाले तमाम नेताओं ने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है. सब एक स्वर में कहते हैं कि इस मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व ही टिप्पणी करेगा.
क्या होगा असर?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस मामले ने ऐसे समय में ज़ोर पकड़ा है जब लोकसभा चुनाव अभी दो साल दूर हैं. ऐसे में विपक्ष के पास इस मुद्दे को भुनाने के लिए पर्याप्त समय है. उधर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तृणमूल कांग्रेस बचाव की नई रणनीति बनाने में जुटी है. रोज़ वैली चिटफंड घोटाले में पार्टी के दो सांसद पहले से ही जेल में हैं. अब इस स्टिंग ऑपरेशन मामले में कई और सांसदों पर पूछताछ और गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी है.
तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों पर ध्यान नहीं देने को कहा है. इसके साथ ही प्राथमिकी दर्ज होने के बाद उसे निचली अदालत में चुनौती देने का रास्ता भी खुला है
वैसे, ममता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यहां कहा, 'फैसला बढ़िया और सकारात्मक है. कम से कम एक महीने का समय तो मिल गया. पहले तो समय ही नहीं था.' लेकिन दूसरी ओर वे तृणमूल के नेताओं को बचाने के लिए सरकार की ओर से दायर याचिका ख़ारिज होने की वजह से हुए नुकसान की भरपाई में जुट गई हैं.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, 'सीबीआई की जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. अगर किसी ने कोई ग़लत काम नहीं किया है तो उसे डरने की क्या जरूरत है ?' प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सांसद अधीर चौधरी कहते हैं, 'राज्य पुलिस की ओर से निष्पक्ष जांच संभव नहीं थी. हम तो पहले से ही सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे. अब हक़ीक़त सामने आ जाएगी.'
सीबीआई जांच का नतीजा क्या निकलेगा यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा. लेकिन फिलहाल अदालती फैसले ने राज्य की राजनीति में उबाल तो ला ही दिया है.
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