इस्लाम में क्या होता है फ़तवा?

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- Author, फैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जाने-माने गायक सोनू निगम इन दिनों लाउडस्पीकर के ख़िलाफ़ बोलने और उसके बाद अपने बाल कटाने की वजह से चर्चा में हैं.
मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने ऐलान किया कि वो अपना सिर एक मुसलमान भाई से मुंडवा रहे हैं और फतवा देने वाले मौलवी 10 लाख रुपए तैयार रखें. इसके बाद उन्होंने अपने सिर के बाल शेव करा लिए.
लेकिन फतवा देने वाले मौलवी ने कहा कि उनकी शर्तें पूरी नहीं हुई हैं.
जबकि शेव करने वाले आलिम हाक़िम ने कहा है कि इनाम के पैसे उन्हें मिलने चाहिए और वो इसे दान कर देंगे.
कुछ दिन पहले टीवी चैनलों के रिपोर्टरों ने चीख़-चीख़कर दर्शकों को बताया कि असम के 46 मौलवियों ने एक लड़की के शो के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया है.
पुलिस ये जांच करने में जुट गई कि मामला कहीं इस्लामिक स्टेट से तो नहीं जुड़ा है, क्योंकि कथित तौर पर युवा गायिका नाहिद आफ़रीन ने हाल में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ गाना गाया था.
नाहिद के परिवार वालों से बीबीसी की बातचीत में पता चला कि ये फ़तवा नहीं था बल्कि कुछ मुसलमानों ने एक परचे के ज़रिए कहा था कि इस तरह के म्यूज़िकल प्रोग्राम का बायकॉट किया जाना चाहिए.
ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर फ़तवा है क्या?
आसान शब्दों में कहा जाए तो इस्लाम से जुड़े किसी मसले पर क़ुरान और हदीस की रोशनी में जो हुक़्म जारी किया जाए वो फ़तवा है.
पैगंबर मोहम्मद ने इस्लाम के हिसाब से जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया उसकी जो प्रामाणिक मिसालें हैं उन्हें हदीस कहते हैं.
यहां ये बात भी साफ़ कर देनी ज़रूरी है कि फ़तवा हर मौलवी या इमाम जारी नहीं कर सकता है.

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फ़तवा कोई मुफ़्ती ही जारी कर सकता है. मुफ़्ती बनने के लिए शरिया क़ानून, कुरान और हदीस का गहन अध्ययन ज़रूरी होता है.
यानी दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम बुख़ारी जो रात-दिन अख़बारों, टीवी चैनलों और ख़बरों में छाये रहते हैं उनके पास फ़तवा जारी करने का अधिकार नहीं है.
नाहिद आफ़रीन ने बताया कि उनके घर पर कुछ लोग एक लिफ़ाफ़ा पहुंचा गए थे जिसके भीतर एक परचा था.
शरिया क़ानून से चलने वाले देशों में ही फ़तवे का लोगों की ज़िंदगी पर कोई असर हो सकता है क्योंकि वहाँ इसे क़ानूनन लागू कराया जा सकता है.
चूंकि भारत जैसे मुल्क में इस्लामी क़ानून को लागू करवाने के लिए किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए फ़तवे बेमानी है, ज़्यादा से ज़्यादा किसी मुफ़्ती की राय है.
इस तरह की अफ़वाह को कई लोगों ने मुसलमानों को बदनाम करने की साज़िश के तौर पर देखा, वैसे पहले भी ऐसी अफ़वाहें फैलाई जाती रही हैं.
हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मौलवियों ने इसका ग़लत इस्तेमाल किया है जैसे एक मामले में बलात्कार हुई एक महिला को आदेश जारी कर ससुर से ही शादी करवा दी गई.
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