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यूपी: सीएम की रेस में एक चेहरा इनका भी
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पाटी की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री की तलाश तेज़ हो गई है.
इस पद के लिए जिन प्रमुख नामों की चर्चा चल रही है, उनमें केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा और सतीश महाना तथा सुरेंद्र खन्ना के नाम शामिल हैं.
इस दौड़ में एक और नाम है जिसे बाकी दावेदारों के मुक़ाबले लोग थोड़ा कम जानते हैं लेकिन लखनऊ में उनका नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है.
लखनऊ के मेयर प्रोफ़ेसर दिनेश शर्मा प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भी पसंदीदा माने जाते हैं.
पार्टी का पुरस्कार
लखनऊ विश्वविद्यालय में वाणिज्य के प्रोफ़ेसर दिनेश शर्मा लगातार दो बार से लखनऊ के मेयर हैं.
साल 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद पार्टी ने उन्हें न सिर्फ़ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया बल्कि गुजरात का प्रभार भी सौंपा.
कहा जाता है कि दिनेश शर्मा उन कुछ लोगों में शामिल हैं, जिन्हें पार्टी के 'अच्छे दिनों' में सबसे ज़्यादा पुरस्कार मिला.
नवंबर 2014 में उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय सदस्यता प्रभारी बनाया गया. उस समय बीजेपी के सदस्यों की एक करोड़ हुआ करती थी, अब यह संख्या 11 करोड़ पार कर गई है.
दिग्गज़ों के क़रीबी
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार श्रवण शुक्ल ने बीबीसी से कहा, "दिनेश शर्मा साफ़ सुथरी छवि के अलावा बेहद मिलनसार हैं. नरेंद्र मोदी के इतने क़रीबी होने के बावजूद लोगों को कभी इसका एहसास तक नहीं होने देते."
मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के सवाल को दिनेश शर्मा पार्टी और संसदीय बोर्ड पर टालते रहे. पिछले दो दिन से उनके नाम की चर्चा काफी तेज़ हो गई है और उन्हें दिल्ली भी बुलाया गया है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि शर्मा की छवि पार्टी के अंदर जैसी है, बाहर भी वैसी ही है.
श्रवण शुक्ल बताते हैं, "साल 2014 में उन्हें लखनऊ संसदीय सीट से टिकट मिलना तय हो गया था, लेकिन राजनाथ सिंह की यहां से लड़ने की इच्छा को देखते हुए उन्होंने अपनी दावेदारी ख़ुद ही वापस ले ली थी."
यही नहीं, दिनेश शर्मा को कलराज मिश्र और कल्याण सिंह जैसे दिग्गज नेताओं का भी काफी क़रीबी बताया जाता है.
मज़बूत पक्ष
- पार्टी का ब्राह्मण चेहरा, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पसंद, बेदाग़ और सरल छवि.
- पार्टी के भीतर किसी तरह का फ़िलहाल विरोध नहीं.
- मेयर के तौर पर प्रशासनिक अनुभव.
कमज़ोर पक्ष
- जनाधार नहीं है. पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बावजूद चुनाव में उनकी बड़ी भूमिका नहीं रही.
- संघ और एबीवीपी की पृष्ठभूमि के बावजूद राजनीति का ज़्यादा अनुभव नहीं है. महज़ दो साल पहले ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए.
- दिनेश शर्मा को मुख्यमंत्री नामित करना पार्टी के न सिर्फ़ तमाम बड़े नेताओं की उपेक्षा करना होगा. यह लोकसभा और विधान सभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं की भूमिका को भी ख़ारिज करना होगा.